ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों में महीने भर की हड़ताल क्‍या ट्रेड यूनियनों का अनुष्‍ठान भर है



कल से देश की रक्षा सामान बनाने वाली ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों के मजदूर एक माह की हड़ताल पर चले गए हैं। हड़ताल का आह्वान करने वाली ट्रेड यूनियनों के मुताबिक आयुध कारखानों के निजीकरण के खिलाफ़ यह हड़ताल की जा रही है और देश भर के 41 कारखानों में उत्‍पादन ठप कर दिया गया है। ट्रेड यूनियनों ने संयुक्‍त बयान जारी करते हुए कहा है कि इस हड़ताल में करीब सवा लाख मजदूर भाग ले रहे हैं। बताया गया है कि सरकार और मजदूर यूनियनों के बीच बातचीत विफल हो गयी है हालांकि एक दौर की बातचीत आज और होनी है। इस मसले पर उत्‍तराखण्‍ड से पुराने मजदूर नेता उमेश चंदोला ने एक टिप्‍पणी मीडियाविजिल को भेजी है। (संपादक)


तीस साल से हड़ताल के नाम पर एक दिन का अनुष्ठान करने वाली हमारी ट्रेड यूनियनों का इन आंदोलनों को चलाना एक खास रणनीति के तहत लगता है।

इसी वर्ष 8 जनवरी की हड़ताल में 5 से 10 करोड़ लोगों के शामिल होने का झूठा आंकड़ा पेश किया गया। अगर इतनी  मजदूर जनता सड़कों पर होती तो पूरे भारत में पूरे दो दिन तक कोई साइकिल भी चलनी असंभव थी। देश में बीएसएनएल,रोडवेज, बिजली आदि तमाम पब्लिक सेक्टर को निजीकरण के रास्ते पर धकेलने के लिए निगम बना दिया गया है। 2004 से पुरानी पेंशन योजना बंद है। रेलवे का निजीकरण सुपरफास्ट गति से चालू है। कश्मीर, पुलवामा, पाकिस्तान के रास्ते पूंजीपति वर्ग  की घोर प्रतिक्रियावादी पार्टी भाजपा देश में अंधराष्ट्रवाद भड़का रही है।

ऐसे में हमारी कांग्रेस ही नहीं, चुनावबाज कम्युनिस्टों के साथ जुड़ी  ट्रेड यूनियन फेडरेशनो ने  भी शासक वर्ग से हाथ मिला कर एक खास रणनीति के तहत डिफेंस सेक्टर को चुना है ताकि एस्मा आदि लगाकर इन्हें गिरफ्तारी और नौकरी जाने का भय दिखाकर वापस काम पर धकेला जा सके।

2003 में तमिलनाडु में एस्मा लगा कर दो लाख सरकारी कर्मचारियों को जेल भेज दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने ही उन्हें वापस नौकरी पर रखवाया था लेकिन हड़ताल करने को असंवैधानिक भी करार दिया था। एक ओर हमारा रक्षा क्षेत्र का अभिजात्य मजदूर है जिसे लड़ाई का क ख ग भी नहीं आता, दूसरी ओर पूरी जनता की देशभक्ति में गोदी मीडिया के चूल्हे उबाल ला रहे हैं।

ऐसे में रक्षा क्षेत्र की हड़ताल का अंत निश्चित ही पराजय में होगा। यह अपनी बारी में सरकारी क्षेत्र के तमाम अभिजात्य मजदूरों को लड़ाई लड़ने से रोकता है। यही नहीं, ठेका मजदूर भी डरेगा।


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