पूंजीवादी सत्ता के दौर में पत्रकारिता का अर्थ क्या है ?



मोदी सरकार जब पिछली बार जीत कर आई थी, अपनी जीत का जश्न उसने प्रगतिशीलों, बुद्धिजीवियों पर हमले से किया था। इस बार की जीत के जश्न की शुरूआत भी उसी प्रकार की गई। झारखंड में एक स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह की गिरफ्तारी द्वारा। पत्रकार रूपेश कुमार सिंह जिसे पुलिस ने 4 जून को उनके रिश्तेदार व वकील मित्र मिथलेश और ड्राइवर मोहम्मद कलाम के साथ हजारीबाग से आगे पद्मा नामक स्थान पर सफर के दौरान रास्ते से उठा लिया। रूपेश कुमार सिंह को उनकी लेखनी को लेकर टार्चर करते हुए लेखनी छोड़ देने की धमकी दी गयी, जान से मारने की धमकी दी गयी, पैसों की लालच दी गयी पर किसी भी सूरत पर अपनी लेखनी से समझौते नहीं करने पर उनकी गाड़ी में पुलिस द्वारा विस्फोटक रखवाकर दो दिनों बाद 6 जून को विस्फोटक के साथ उनकी गिरफ्तारी दिखाकर सार्वजनिक किया गया।

उनके इस झूठ को देश की चर्चित दैनिक अखबारों प्रभात खबर, हिन्दुस्तान, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण से लेकर अन्य कई अखबारों ने तथा न्यूज चैनलों ने खूब प्रचारित प्रसारित किया। ‘भारी विस्फोटक के साथ हार्डकोर नक्सली सहित तीन गिरफ्तार’ जैसे शीर्षकों को खूब मसाले के साथ प्रस्तुत करते वक्त इनमें से किसी पत्रकार ने एक पत्रकार होते हुए भी एक पत्रकार के खिलाफ ऐसे झूठे षड्यंत्र की थोड़ी भी जांच-पड़ताल करने की जरूरत महसूस नहीं की। पत्रकार केवल उनके घर के बाहर गये, तस्वीरें खींची और प्रशासन ने जो बताया उस पर खबर बना डाली, जबकि वे पत्रकार यह जानते हैं कि इस तरह के कितने झूठे मुकदमे देश में बनाए जाते हैं, बावजूद इसके इन पत्रकारों ने अपने साथी पत्रकार रूपेश के पक्ष को जानने की जहमत नहीं उठाई। रूपेश कुमार सिंह  2014 से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े रहे हैं।

बावजूद प्रशासन का झूठ पूरे धरल्ले से चला।कुछ अखबारें को छोड़कर जिसमें दैनिक भास्कर (जिसने परिवार वालों से बात कर सच को जाना था) के एक एडिशन ने कुछ हद तक सच को प्रकाशित भी किया और कई दिनों के बाद जुलाई में रांची प्रेस कांफ्रेंस के बाद ही सही प्रभात खबर ने भी षंडयत्र की खबरें प्रकाशित की, मगर इक्के-दुक्के इन अखबार व चैनलों को छोड़कर किसी ने शायद अपनी गलती को सुधारना जरूरी नहीं समझा। जबकि रूपेश कुमार सिंह बेव पोर्टल जनचैक, हस्तक्षेप, जनज्वार, मीडिया विजिल, भड़ास फोर मीडिया,द वायर आदि सहित कई पत्र-पत्रिकाओं दस्तक, समयांतर, बिरसा भूमि, क्रॉस फायर, तलाश, और ऐसे अन्य वेबसाइट और पत्रिकाओं में देश के संवेदनशील मुद्दों के साथ झारखंड के जमीनी मुद्दों पर बहुत बारिकी से लेख लिखा हैं।

जिसमें भूमि अधिग्रहण अध्यादेश, विस्थापितों के बारे में, ललपनिया खदान हादसा में मरे मजदूरों के बारे में, डोली मजदूर की हत्या पर, मजदूर नेताओं पर राजकीय दमन पर, कश्मीरी जनता पर प्रशासनिक हमले पर, देशद्रोह का टैग लगाकर प्रगतिशीलों पर हमले पर, छात्र आंदोलनों पर खुलकर लेख लिखा है जिससे सरकार की कारपोरेट के साथ जनता की लूट की कहानी स्पष्ट होती है। जबकि वेब पोटर्लों में खूब तेजी से स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार के प्रशासनिक षड्यंत्र के शिकार होने की खबर प्रकाशित होती रही। सोशल मीडिया पर उनके जुझारू लेखनी और बेवाकी के कारण सत्ता के षड्यंत्र के शिकार होने की खबर चली। पर इन बातों का बड़े हिस्से वाली मीडिया जगत में कोई असर नहीं रहा। आज जहां पूरी व्यवस्था को भ्रष्ट कर बर्बाद किया जा रहा है। जहां समाज बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, पूंजीपतियों की लूटेरी नीति, निजीकरण जैसी समस्याओं की चपेट में है और रोजी-रोटी के लिए लगभग इंसान अपने ईमान से समझौता कर इस व्यवस्था की लूट का हिस्सा बनने को मजबूर है, बहुत कम इंसान है, जो इसे टक्कर देने की हिम्मत रखते हैं, सच को सच, झूठ को झूठ कहने की हिम्मत रखते हैं। ऐसे इंसान सरकार और कारपोरेट लूट के रास्ते का रोड़ा बनते हैं जिसे हटाने के लिए सरकार किसी भी हद तक का षड्यंत्र रच लेती है। इसके लिए एक आसान तरीका नक्सल का आरोप है क्योंकि ऐसे आरोप लगने पर बिना किसी सबूत के समाज में लोग इसे स्वीकार कर लेते हैं, उनसे दरकिनार हो जाते हैं, या स्वीकार न भी करे तो इस आरोप का विरोध करने की हिम्मत नहीं करते।

पिछले पांच सालों से यह एक ट्रेंड के रूप में चला हुआ है कि जनपक्षधरों को नक्सल लिंक के नाम पर गिरफ्तार करो। नक्सल लिंक के पीछे का सच पिछली बार मोदी सरकार के हत्थे जो लोग चढ़े उनमें प्रोफेसर साईं बाबा, संस्कृतकर्मी व छात्र हेम मिश्रा, एक्टिविस्ट रोना विल्सन, वकील सुरेंद्र गाडलिंग, प्रोफेसर शोमा सेन, दलित एक्टिविस्ट सुधीर ढावले, विस्थापन विरोधी नेता महेश राउत, डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन तेलंगाना राज्य अध्यक्ष कंचरला बद्री, राज्य कारकारिणी सदस्य सुधीर एंव उस्मानिया यूनिवर्सिटी मेम्बर रंजीत ,बंदी दुर्गा प्रसाद, वकील सुधा भरद्वाज, कवि वरवरा राव, जैसे कई प्रतिष्ठित लोगों थे। जिनपर भीमा कारेगांव हिंसा, प्रधानमंत्री की हत्या के लिए नक्सल को पत्र जैसी अलग-अलग मामले बनाकर अर्बन नक्सल का टैग लगाकर गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा मजदूरों की आवाज बनी मजदूर संगठन समिति को बैन कर और उनके महासचिव बच्चा सिंह, विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक समिति सदस्य-दामोदर तूरी और मसंस के बहुत से शीर्ष नेताओं से लेकर सदस्य तक की गिरफ्तारी नक्सल लिंक के नाम पर की गई थी।

इनमें से जिन भी लोगों को नक्सल लिंक के नाम पर गिरफ्तार किया गया उनमें से कई बेल पर बाहर है तो कई आज भी जेलों में बंद। इस साल की शुरूआत एक पत्रकार की गिरफ्तारी से हुई जिसके एक महीने बाद 8 जुलाई को उत्तर प्रदेश के देवरिया खुखुंदू से मजदूर किसान एकता मंच के बृजेश और सावित्री बाई फुले संघर्ष समिति की प्रभा जो दोनों पति-पत्नी है को सुबह 4:30 बजे घर से प्रशासन द्वारा उठा लिया गया। ठीक उसी दिन फासीवादी विरोधी मोर्चा के ई.सी. सदस्य और मानवाधिकार संगठन एन.सी.आर.ओ की पूर्वी उत्तरप्रदेश ईकाईं के सदस्य कृपाशंकर और पत्नी वृंदा जो प्राईवेट स्कूल में अध्यापिका है को भी पुलिस ने उठा लिया। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समाजिक कार्यकर्ता मनीष और अमिता श्रीवास्तव को नक्सली लिंक के नाम पर भोपाल से एटीएस की टीम द्वारा उठा लिया गया। (बृजेश, प्रभा, कृपाशंकर और वृंदा को 8 जुलाई की रात 10:30 बजे छोड़ दिया गया). इसके अलावा झारखंड में स्टेन स्वामी के घर पर छापेमारी हुई। 20 लोगों को देशद्रोह के मुकदमे में दोषी बताया गया। जिसपर आगे कारवाई होगी। इस तरह हम देखें तो इस बार की शुरूआत और भी बढ़चढ़ कर हुई है।

इनकी मनगढ़ंत कहानियों की कल्पनाशीलता नयी जीत के साथ और भी नयी हो गयी है। कानून का हवाला देकर गैरकानूनी रवैये अपनाकर सरकार अपने मनसूबे पूरी कर ही है। एक महीने के भीतर इतने लोगों को नक्सल लिंक के नाम पर गिफ्तार कराना सामान्य बात नहीं है। कैसे लोग हो रहे हैं नक्सल लिंक के नाम पर शिकार यहां अगर हम पृष्ठभूमि की बात करें, तो जिसे भाजपा के पिछली शासनकाल में गिरफ्तार किया गया हो चाहे इस साल, एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं हैं जिसका समाजिक कोई सरोकार न हो। कोई वकील है, कोई पत्रकार, कोई टीचर, कोई  एक्टिविस्ट, कोई कवि, लेखक तो कोई प्रोफेसर है। यानी जितने भी व्यक्ति के उपर नक्सल लिंक व देशद्रोह का आरोप लगाया गया है, सभी जनता की समस्याओं से मूल रूप से जुड़े हुए है। क्या जनता की समस्या के बारे में सोचना अपराध है? आखिर यह कैसा लोकतंत्र है जहां जनपक्षधरों पर जनता के लिए आवाज उठाने के कारण देशद्रोह का मुकदमा थोपा जाता है? जब बार-बार पुलिस नक्सल के नाम पर ऐसे ही लोगों को गिरफ्तार कर रही है, तो यह जानने की भी जरूरत पैदा होती है कि आखिर पुलिस नक्सल कहती किसको है, किसे उससे लिंक का आधार मानती है?इतना तो शायद हर कोई जानता है, नक्सलबाड़ी की जमीन से उपजा गरीब किसानो का आंदोलन जो अपने हक के लिए जमींदारों-सामंतो के खिलाफ उठाया गया था, जिसमें अपने हिस्से की भीख न मांगकर अपने पारंपरिक हथियारों को ही लेकर लड़ाई लड़ी गयी थी।

यह किसानों का व्यवस्था से एक विद्रोह था, शोषकों के खिलाफ शोषित जनता का आंदोलन, एक बराबरी के समाज के स्वप्न को लेकर कम्युनिस्ट विचारधारा से लैस गरीब जनता का आंदोलन और यही नक्सलबाड़ी आंदोलन से आगे चलकर भेद-मतभेद के आधार पर कई कम्युनिस्ट पार्टिंयां निकली जिसमें किसी ने चुनाव प्रक्रिया पर विश्वास किया तो किसी ने उसका विरोध मगर इससे निकली सारी पार्टियों में कम्युनिस्ट विचारधारा का पुट रहा, जिसे किसी भी हालत में विचारहीन नहीं कहा जा सकता। चाहे वह चुनाव में भाग लेने वाली वामपंथी पार्टियां हो चाहे गांव-कस्बों में जाकर व्यवस्था के विरूद्ध खड़ी होने वाली पार्टी। इसमें वैचारिक मतभेद के बावजूद मूल आधार पर सारी वामपंथी पार्टियो की विचारधारा बहुत हद तक एक जैसी रहेगी। यह बात भी सभी जानते हैं कि कम्युनिस्ट विचारधारा कोई आतंकी विचारधारा नहीं है, मनुवाद, सामंतवाद से ऊपर सभी की समानता की भावना से लैस विचारधारा जिसके आधार पर रूस व चीन जैसे देशों में क्रांति हुई। आज का नक्सलवाद भी इसी विचारधारा की एक कड़ी है।

स्पष्ट है नक्सलवाद एक विचारहीन आतंकी संगठन नहीं है। इस बात को इसलिए रख रहे हैं क्योंकि इसी कारण प्रगतिशील, बुद्धिजीवियों, व समाज के बारे में सोचने वाले लोगों के विचार से इनकी समानता पाई जाती है। उसी विचारधारा को आधार बनाकर इन समाजिक सरोकार रखने वाले लोगेां को गिरफ्तार किया जाता है। जाहिर सी बात है कम्युनिज्म को मानने वाले चाहे वे जंगलों में लड़ाई लड़ने वाले हो, चाहे शहरों में रहने वाले हो के विचारधरा में समानता होगी, या कम्यूनिज्म को नहीं जानने वाले मगर समाज के हर तबके के प्रति बराबर का नजरिया रखने वाले, जनता के दुख-दर्द को समझने वाले के भी विचार में बहुत हद तक समानता तो रहेगी ही। माक्र्स, एंगेल्स, लेनिन, स्टालिन, माओ सभी कम्युनिस्ट दबे-कुचली जनता के ही तो नेता थे। ऐसे में विचारधारा को आधार बनाकर जो इन जनपक्षधरों को नक्सली लिंक के नाम पर गिरफ्तार किया जा रहा है, मुकदमा चलाया जा रहा है क्या यह एक विडंबना नहीं है। निशाना बनाने का कारण एक बात जो स्पष्ट है इन न्यायपसंद लोगों को निशाना इसलिए बनाया जा रहा है क्योंकि जनता का पक्ष लेते हुए ये लोग सरकार और कारपोरेट लूट को कहीं न कहीं नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसा नहीं है कि शिकंजे सिर्फ इन्ही लोगों पर कसे जा रहे हैं, जो समाजिक सरोकार रखते हैं। हमें यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि हमले सिर्फ प्रगतिशील जनपक्षधरीय मानसिकता वालों पर ही हो रही है।

आज जो भी जिस भी माध्यम से थोड़ी भी जनपक्षीय बातें कर रहे हैं सरकार उन्हें जरा भी बर्दाश्त नहीं कर रही। हर क्षेत्र में हमारे अधिकार को सीमित कर रही है। पत्रकारिता पर पहरास़्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह की गिरफ्तारी, उस पर मीडिया वालों की चुप्पी इस बात को स्पष्ट करता है कि आज पत्रकारिता की स्वतंत्रा कितने खतरे में है। बड़े तौर पर सरकार और कारपोरेट लूट के खिलाफ बेवाकी से कलम चलाने वाले पत्रकार के अलावा सरकार उन पत्रकारों पर भी हमले कर रही है जो थोड़ी भी सरकार की खिलाफत कर रहे हैं। पिछले एक महीने के भीतर पत्रकारों पर जगह-जगह हमले इसके सबूत है-बिजली गुल होने की खबर छापने पर पत्रकार दिलीप शर्मा को पुलिस हवालात में आधी रात को उठा ले जाकर टार्चर किया जाता है।

समाजिक राजनीतिक मुद्दों पर लिखने वाले अजय सरोज को जान से मारने की धमकी दी जाती है। शामली में न्यूज 24 के पत्रकार अमित शर्मा को जीआरपी एसएचओ राकेश कुमार द्वारा अमानवीय हद तक प्रताड़ित कर उन्हें नंगा कर मुंह में पेशाब किया जाता है। इसके अलावा दिल्ली के प्रशांत कनौजिया, इशिता सिंह, अनुज शुक्ला, गोरखपुर के पीर मोहम्मद, धमेंद्र भारती, डॉक्टर आरपी यादव, बस्ती के अखलाख अहमद, विनय कुमार यादव पानीपथ के उमेश त्यागी पर प्रशासनिक हमले होते हैं। यह हमले यह बताता है कि आपका गहरे जनपक्षीय सवाल तो दूर थोड़ी भी अभिव्यक्ति की आजादी जिसमें सरकार का हल्का भी बाल बांका हो, तो वह उसे सहन नहीं करेगी।सरकार की नीति के खिलाफ हमारा विरोध सरकार दर्ज नहीं कर सकती। लेकिन सरकार अपने आकाओं कारपोरेटरों के लिए हर रोज नये-नये स्कीम लाएगी, जो फिर आपके अधिकारों का हनन करेगा। यह हनन भूमि अधिग्रहण, महंगाई, निजीकरण, खाद-बीज महंगे से लेकर अपनी समस्याओं पर किसी भी प्रकार के आंदोलन के दमन के रूप में करेगा।

अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा हमारे बोलने से ज्यादा हमारी चुप्पी पर है। एक तरफ यदि रूपेश कुमार सिंह जैसे बेवाक बोलने वाले पत्रकार पर प्रशासनिक षडयंत्र रचा जाता है, उसे सलाखें दी जाती है, तो दूसरे तरफ उसके लिए चुप्पी साधकर तमाम समाचार पत्रों और टीवी चैनलों का दुष्प्रचार फैलानी वाली खबर चलाना इसी बात की ओर इंगित करता है कि किस तरह मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकार नीतियों के नीचे दबा हुआ है। सवाल है, आखिर क्यों पत्रकारों का यह बड़ा हिस्सा सिर्फ सरकार के पक्ष की बातों को रख रहा है, जनपक्षीय उन बातों को जो सरकार के विरूद्ध है, रखने से डर रहा है। रूपेश कुमार सिंह की गिरफ्तारी के सिलसिले में ही एक बड़े चैनल के पत्रकार से बातचीत के दौरान कुछ बातें सामने आई जिससे पत्रकारिता के ऊपर खतरा का स्पष्ट प्रमाण मिला। उन्होंने यह स्वीकार करते हुए कहा कि ‘‘बहुत सारे केस में वे जानते हैं कि मामले झूठे हैं, प्रशासन एक ही हथियार को कई प्रेस कांफ्रेंस में रखकर दिखाती है जिससे साफ पता चलता है कि हथियार के साथ पकड़ाया व्यक्ति कोई मासूम ही होगा, उसे पकड़कर अंदर कर देती है। यह सच जानते हुए भी हमें चुप रहना पड़ता है, क्योंकि यह सिस्टम का हिस्सा बन गया है।’’

यह समझौते इस पत्रकारिता को कहां तक ले जाएगी यह आप हम सोच भी नहीं सकते, क्योंकि सच तो यही है न कारपोरेटरों की लालच की कोई सीमा है, न सरकार की लूट का। यह दमन जनता पर दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाएगा, हमारे आपकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा का और हिस्सा छीना जाता रहेगा और आज जो समझौते कर के बैठें हुए हैं, कल खुद उनसे भी समझौते कर पाना मुश्किल हो जाएगा। हमें चाहिए कि हम अपनी अभिव्यक्ति की आजादी पर इस हमले के खिलाफ आवाज उठाएं। अपनी पत्रकारिता को किसी कूड़े के ढेर में लीन करने के बजाए उसे उपर उठाएं। लोकतंत्र के इस चैथे स्तंभ की स्वतंत्रता को कोई दमनकारी सरकार या कारपोरेटर नियंत्रित नहीं कर सकते, क्योंकि न्यूज चैनल या अखबार उनकी बदौलत नहीं चलते बल्कि लाखों मेहनत करने वाले पत्रकारों की मेहनत से चलती है।


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