बांसवाड़ा परमाणु बिजलीघर: भाजपा नेता की बिल्डिंग में NPCIL लिख रहा है तबाही की इबारत



 

फुकुशिमा हादसे के बाद पूरी दुनिया परमाणु ऊर्जा से पीछे हट रही है वहीं भारत इस रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। पिछले माह मोदी सरकार ने 10 परमाणु रिएक्टरों के निर्माण का आदेश दिया है। इन रिएक्टरों का निर्माण बांसवाड़ा (राजस्थान), चुटका (मध्य प्रदेश), कैगा (कर्नाटक) और गोरखपुर (हरियाणा) में किया जायेगा। विकास की इस अंधी दौड़ में भारतीय शासक वर्ग इतने भारी पैमाने पर परमाणु संयंत्रों की स्थापना कर अपनी जनता की बलि देने के लिए तैयार है। ऐसा ही एक उदाहरण हमें राजस्थान के बांसवाड़ा शहर से महज 17 किमी. दूर स्थापित हो रहे परमाणु संयंत्र के मामले में देखने को मिला। हम यहां पर आपके साथ जितेंद्र चाहर की इस परमाणु संयंत्र पर एक विस्तृत रिपोर्ट साझा कर रहे हैं। जितेंद्र हाल ही में बांसवाड़ा के प्रभावित क्षेत्र का दौरा करके लौटे हैं


जितेंद्र चाहर

 

करीब 1 लाख से भी ज्यादा आबादी वाले बांसवाड़ा शहर से महज 17 कि.मी. की दूरी पर किसी परमाणु संयंत्र की स्थापना की कल्पना ही सिहरन पैदा कर देती है। यह योजना अब जमीनी हकीकत की शक्ल अख्तियार करती जा रही है। बारी गांव राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में स्थित है और यह बांसवाड़ा से रतलाम (पुराने हाईवे की दूरी के हिसाब से) पर महज 17 कि.मी. (सीधी रेखा में 14 से भी कम कि.मी.) की दूरी पर स्थित हैं। प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र परियोजना में 700 मेगावाट क्षमता के 4 रिएक्टर होगें जो कि भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम (एनपीसीआईएल) द्वारा विकसित देशी डिजाइन पर आधारित होगें। अब तक भारत में इतना बड़ा परमाणु ऊर्जा संयंत्र निर्मित नहीं हुआ है। वैसे महाराष्ट्र स्थित जैतापुर में प्रस्तावित संयंत्र इससे भी विशाल है। परमाणु संयंत्र हेतु कुल 3104.16 बीघा जमीन का अधिग्रहण हो गया है। इसमें से 662 बीघा आड़ीभीत गांव से, 946 बीघा बारी गाँव से, 150 बीघा कटुम्बी गाँव से, 455 बीघा रेल गाँव से, 160 बीघा सजवानिया गाँव से और खान्डिया देव गांव से 300 बीघा जमीन का अधिग्रहण किया गया है। इसके आलावा वन विभाग की 420 बीघा जमीन का अधिग्रहण अभी नहीं हुआ है।

राजस्थान के बारी, आड़ीभीत, कटुम्बी, रेल, सजवानिया गांव में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र इस बात का उदाहरण है कि किस तरह हमारे नीति निर्माता स्थानीय आबादी को खतरे में डालकर और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा कर अपनी नीतियां या कार्यक्रम लागू करना चाहते हैं।

अपने ही नियमों, कानूनों का उल्लंघन सरकार की न बदल सकने वाली आदत बन गयी है। परमाणु ऊर्जा नियंत्रण बोर्ड के मानकों जैसे- पांच किलोमीटर तक प्राकृतिक जंगल होना, 6.6 किलोमीटर तक 10 हज़ार की आबादी का होना तथा 30 किलोमीटर तक 1 लाख की जनसंख्या होना आदि का भी इस परियोजना में उल्लंघन हुआ है। यह परमाणु संयंत्र जिस जगह प्रस्तावित है उसके 5 किलोमीटर के दायरे में 31 से ज्यादा गाँवों की 50 हजार से भी अधिक आबादी निवास कर रही है और खान्डिया देव गांव के पास ही रिजर्व फारेस्ट है जंहा पर तेंदुआ देखने का पॉइंट भी है।

बांसवाड़ा जिले की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है इस इलाके में रोजगार का मुख्य साधन कृषि होने के कारण इन खातेदारों के साथ उनका पूरा परिवार भी प्रभावित होगा जिनमें बारी, आड़ीभीत, कटुम्बी, रेल, सजवानिया और खान्डिया देव गांवों के 11 हजार से अधिक लोग विस्थापित होंगे। खेती में बच्चों से लेकर औरतों तक सभी का श्रम लगा रहता है। प्लांट लगने के कारण यह लोग रोजगारविहीन हो जायेंगे और उनकी जीविकोपार्जन का कोई अन्य साधन है नहीं। इन सब लोगों को विस्थापित होना पड़ेगा, जहां पर इनके लिए न रोजगार की कोई व्यवस्था है और न ही जीवन के लिए अन्य जरूरी साधन उपलब्ध हैं।

जैसा कि फुकुशिमा परमाणु विध्वंस में हमें नाटकीय तौर पर दिखाया जाता रहा है कि परमाणु रिएक्टर को लगातार ठंडा रखना आवश्यक है। प्रस्तावित परमाणु संयंत्र पूर्णतया माही बांध के पानी पर ही निर्भर रहेगा। राज्य सरकार ने पूर्व में ही परमाणु संयंत्र को 4000 मिलियन क्यूबिक पानी की गारंटी दे दी है। इससे क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा और कृषि पर निर्भर हजारों लोग भी प्रभावित होंगे। बारी गाँव में निवास कर रहे पूर्व सहकारिता राज्यमंत्री दलीचंद मईड़ा बताते है कि अभी माही बांध से 1.25 लाख हैक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई हो रही है। बांसवाड़ा शहर सहित 100 से ज्यादा गाँव और कस्बों में पीने के पानी की सप्लाई हो रही है तथा नॉन कमांड क्षेत्र के गांवों में पेयजल योजना के तहत पानी की टंकी और पाईप लाईन डालने का कार्य जोर शोर से चल रहा है। अब यदि 4 हजार मिलीयन क्यूबिक पानी परमाणु संयंत्र को दे दिया जायेगा तो इससे बांध  के किनारे बसे सैकड़ों गांव और बांसवाडा शहर जलाभाव से प्रभावित होंगे। मानव जीवन के लिए बिजली से अधिक उपयोगी पानी है। माही बांध में पानी के घट जाने से पर्यावरणीय संकट उत्पन्न होगा, तथा विकिरणयुक्त इस जल का दुष्प्रभाव बासंवाडा सहित बांध के किनारे बसे अनेक शहर और गांव वासियों पर पड़ेगा क्योंकि वहां की जल आपूर्ति माही बांध से ही होती है।

परियोजना से विस्थापित और प्रभावित होने वाले सभी गांव संविधान की पांचवीं अनुसूची के अन्तर्गत आते हैं। पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम-1996 (पेसा कानून) में विस्थापन के पूर्व ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य है। यह भील आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है। पांचवीं अनुसूची वाले गाँव बारी की ग्रामसभा द्वारा परियोजना पर अभी तक प्रस्ताव पारित नहीं किया है। वन अधिकार मान्यता कानून, 2006 के अन्तर्गत परियोजना से प्रभावित होने वाले लोगों के द्वारा लगाये गये दावों का निराकरण अभी तक नहीं हुआ है तथा लोगों को व्यक्तिगत एवं सामुदायिक अधिकार प्राप्त नहीं हुआ है।

माही बांध से विस्थापित मछुआरों के 40 परिवारों को सरकार ने बांध के 50 साल बाद 2001 में बारी गाँव में मछुआरा कालोनी में बसाया था। अब सरकार यहाँ परमाणु सयंत्र स्थापित करेगी तो इन 40 मछुआरा परिवारों को फिर से विस्थापित होना पड़ेगा और इस बार इनको सरकार मुआवजा भी नहीं देगी क्योंकि यह सरकारी कालोनी में रहे थे लिहाजा मुआवजा सरकार का होगा। मछुआरों ने मुआवजे पाने के लिए 2015 में हाईकोर्ट में मुकदमा दायर किया, जिसमे अभी तक सुनवाई भी शुरू नहीं हो पाई है।

संयंत्र को ठण्डा करके जो पानी वापस माही बांध में छोड़ा जाएगा वह रेडियोधर्मी विकिरण युक्त होगा। रेडियोधर्मी पानी से जलाशय की मछलियां और वनस्पति प्रदूषित होंगे। उन्हें खाने वाले लोगों कैंसर, विकलांगता और अन्य बीमारियों का खतरा रहेगा। विकिरण से प्रदूषित माही बांध का जल पीने और बांध   की मछलियों को खाने वालों में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न होंगी। माही संयंत्र से बाहर निकलने वाले पानी का तापमान जलाशय के तापमान से 5 डिग्री अधिक होगा। यह बहुत ज्याद तापमान है, क्योंकि जलाशय के तापमान से 0.5 डिग्री की अधिकता भी बांध में मौजूद जीव-जंतुओं का खात्मा कर सकती है। यही पानी वापस जलस्त्रोत में जाएगा।

परियोजना स्थल के बहुत दूर तक मत्स्याखेट पर प्रतिबंध लगने से हजारों मछुआरों की आजीविका का संकट उत्पन्न होगा। इस समय माही बांध में मछुआरों की 8 समितियां मछलियों का शिकार कर आजीविका चला रही है ।

प्रस्तावित क्षेत्र में विस्थापन के नाम पर सरकार की कोई ठोस नीति नहीं है और लोगों को विश्वास नहीं है कि जो विस्थापित किये जा रहे है उनके जीवन को फिर से सरकार स्थापित कर सकेगी। यहां पर 1960 में बने माही बांध से विस्थापित आदिवासी भी है जिनका दुबारा से विस्थापन हो रहा है। इनके लिये आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। यानी आदिवासियों को साफ दिखाई दे रहा है कि उनकी भूमि के अधिग्रहण के बाद बेहतर जीवन की कोई संभावनाएं मौजूद नहीं है। वे सोचते हैं कि चाहे जो भी हो उनके हितों का ध्यान नहीं रखा जायेगा। बारी के रंगलाल कहते है कि 6 गांवों से विस्थापित हो रहे 11 हजार से ज्यादा लोगों को पुन: बसाने के लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं। अभी तक पुनर्वास कालोनी के लिए जगह तक निर्धारित नहीं की गई है। हाल ही में कलेक्टर ने राज्य सरकार को जो प्रस्ताव भेजा भी है वह भी कटुम्बी गाँव की पहाड़ी जमीन है। जिसकी दूरी प्लांट से 1 कि.मी. से भी कम है। सरकार की उदासीनता के चलते लोग पुनर्वास के लिए घर के बजाए नकद मुआवजा लेने के लिए विवश हैं।

जनता का विरोध और नेतृत्व का निजी स्वार्थ

2011 में जब परमाणु संयंत्र के लिए भूमि अधिग्रहण का अवार्ड घोषित किया गया तो स्थानीय भील आदिवासियों ने इस योजना को नकारते हुए विरोध शुरू कर दिया था। आदिवासियों का मानना था कि इससे उनके जीवन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। चार साल तक पुलिस-प्रशासन को क्षेत्र में नहीं घुसने दिया गया। ग्रामीण आदिवासियों ने अपनी जमीन बचाने के ‘आदिवासी किसान संघर्ष समिति’ का गठन किया और लोगों ने सामूहिक रूप से इस समिति के बैनर तले संघर्ष करना तय किया। समिति की अगुवाई में आंदोलन की रूपरेखा बनी लोग इस समिति के नेतृत्व में धरने-प्रदर्शन, बंद, बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक इतियादी कार्यवाहियां आयोजित करने लग गए। क्षेत्र की 18 ग्राम पंचायतों के आदिवासी इस संघर्ष में जुड़ गए। लोग इस संघर्ष को अपनी आजीविका बचाने के संघर्ष के रूप में देख रहे थे।

1 जुलाई 2012 को परमाणु बिजलीघर का विरोध कर रहे ग्रामीणों ने बांसवाड़ा विधायक अर्जुन सिंह बामनिया को कटुम्बी में बंधक बना लिया। विधायक ने बैठकर बात करने को कहा, लेकिन ग्रामीण नहीं माने। इसी दौरान बारी सरपंच कांतिलाल मईड़ा भी वहां आ गए और विधायक को अपने साथ अपने पिता व पूर्व राज्यमंत्री दलीचंद मईड़ा के घर ले जाकर बैठा दिया। ग्रामीणों की भीड़ वहां भी पहुंच गई और उन्होंने मईड़ा के घर को चारों ओर से घेर कर विधायक को बंधक बना लिया। जिला प्रशासन की मौजूदगी में विधायक ने पॉवर  प्लांट न लगने का आश्वासन दिया तब जा कर देर रात में विधायक को छोड़ा गया। धनराज मईड़ा बताते है कि विधायक ने हमारे लोगों पर मुकदमा कर दिया जिसकी तारीखों पर आज भी 8-10 लोग कोर्ट के चक्कर काट रहे है।

7 दिन का अनशन और 21 सूत्री मांगे

12 मई 2013 से यहां के लोग ‘आदिवासी किसान संघर्ष समिति’ के नेतृत्व में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए। जब लोगों ने धरना प्रारम्भ किया तो उसका नेतृत्व दलीचंद मईड़ा ने किया। मईड़ा भी इसी दिन आमरण अनशन पर बैठ गये और उनका अनशन लगातार सात (18 मई 2013) दिनों तक चला, जिसकी जानकारी राजनीतिक तबकों तक भी पहुंची। तब मुख्यमंत्री (अशोक गहलोत) स्तर पर इस मुद्दे को लेकर बातचीत के आश्वासन पर माईड़ा ने आमरण अनशन तोड़ा।

2014 में राजस्थान में विधान सभा चुनाव हुए जिसमें भारतीय जनता पार्टी शासन में आई। पूर्व मंत्री दलीचंद मईड़ा को भाजपा से टिकट नहीं मिला तो वह इन चुनावों में निर्दलीय खड़े हुए लेकिन जीत नहीं सके। इधर भूमि अधिग्रहण के अवार्ड को पांच साल होने को आ रहे थे तो सितबंर 2014 में राजस्थान सरकार के गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया बारी गाँव में आते है। मईड़ा को 21 सूत्रीय मांगों पर मना लेते है और आश्वासन देते है कि आपके साथ अन्याय नहीं होने देंगे । इस वार्ता के बाद समिति के पदाधिकारी आंदोलन खत्म कर अपने ही लोगों की जमीनों के सौदों में लग जाते है। यह मांगें थीं;

  1. प्रति बीघा जमीन का 50 लाख रूपये।
  2. प्रति किसान को जमीन के बदले जमीन दी जाए।
  3. प्रति गांव के समस्त प्रभावित किसानों को एक ही जगह पर कृषि योग्य भूमि उपलब्ध करवाई जाए।
  4. प्रत्येक परिवार के 18 वर्ष से उपर के सदस्यों को कम्पनी नौकरी दे।
  5. प्रत्येक किसान एवम् परिवार के विवाहित पुत्रों को बांसवाड़ा के नगर परिषद् परिसर में 1600 वर्गफीट पर मकान बनाकर दे।
  6. प्रभावित परिवारों को 20-25 वर्ष के पूर्व से खेती कर रहे किसानों को राजस्व भूमि, चारागाह भूमि, नाला भूमि, वन विभाग आदि और विलेनियम सीमेंट, फैक्ट्री में काश्तकार खेती कर रहे किसानों को मुआवजा दिया जायें।
  7. भूमिहिन किसानों को नौकरी, जमीन व सभी सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएं।
  8. परमाणु बिजलीघर से उत्पादित मुनाफे का 20 प्रतिशत राशि किसानों को 100 साल तक दी जाए।
  9. प्रभावित परिवार के सदस्य महिला, पुरूष 60 वर्ष के उपर प्रत्येक को प्रतिमाह 25000/- रूपए पेंशन दे और प्रति वर्ष मंहगाई भत्ता बढ़ाया जाए।
  10. प्रभावित बेरोजगार युवा जो कक्षा 12 पास है उनको कंप्‍यूटर का प्रशिक्षण दिया जाए तथा उसके बाद कम्पनी में नौकरी दी जाए।
  11. कक्षा दंसवी से कम पढे लिखे युवा बेरोगारों को कम्पनी तकनीकी शिक्षा का प्रशिक्षण करवाकर कम्पनी में रोजगार दे।
  12. परमाणु बिजलीघर का मुख्य द्वार बारी गांव के उत्तर दिशा में रखा जाए।
  13. मुख्य द्वार के सामने मार्केटिंग बाजार, बिग बाजार (कॉम्पलेक्स) बनवाये जाए जिसमें सभी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाए।
  14. बारी गांव से परमाणु बिजलीघर में होता हुआ नापला मेन हाईवे रोड पर बांसवाड़ा जाने हेतु पक्की सड़क बनाई जाए।
  15. परमाणु बिजली घर के विरोध में चल रहे आंदोलन के दौरान किसानों पर दर्ज हुए मुकदमे सरकार द्वारा वापस लिया जाए।
  16. गांव बारी आडीभीत, रेल कटुम्बी, सजवानिया एवम खंडियादेव के विस्थापित किसानों को जिन इलाकों में बसाया जाएगा वहां शिक्षा हेतु कक्षा 1 से 12 तक का विद्यालय तथा चिकित्सालय खोला जाए, इलाके को मुख्य सड़क मार्ग से जोड़ा जाए, हर घर को निःशुल्क विद्युत तथा पेयजल उपलब्ध कराया जाए।
  17. ऐसे किसान जिनकी आयु 40 से 60 वर्ष के बीच की है उनको 20 साल तक क्षतिपूर्ति राशि का भुगतान किया जाए।
  18. प्रभावित किसानों के मकान, ट्यूबवेल, कुआं, पेड़-पौधों को नई दर से 10 गुना मुआवजा दिया जाए।
  19. प्रभावित किसानों को पुर्नवास हेतु एक-एक बीघा गाय, भैस, बकरियां, बैल एंव भेड़ों के घास-फूस आदि रखने हेतु जमीन उपलब्ध करवाई जाए।
  20. परमाणु बिजलीघर निर्माण के विस्थापित आवाप्त ग्रामों के पास प्रभावित गांवो के 7 किमी. दूर तक निवासरत काश्तकारों के प्रत्येक परिवार के दो सदस्यों को नौकरी दिलाई जाए।
  21. खंडियादेव में प्रस्तावित आवासीय कॉलोनी को परमाणु बिजलीघर के समीप के किसी गांव में स्थापित किया जाए।

उपरोक्त मांगों को अगर ध्यान से पढ़ा जाए तो यह साफ दिखता है कि यह मांगें आंदोलन को खत्म करने तथा पांच पदाधिकारियों के निजी स्वार्थ पर टिकी थीं। यह पांच पदाधिकारी पूर्व राज्य मंत्री दलीचंद मईड़ा (भाजपा सरकार 1993-1998), (अध्यक्ष), नापला के पूर्व सरपंच जनक (उपाध्यक्ष),  बारी के पूर्व सरपंच धनराज मईड़ा (महासचिव), नापला के सेवानिवृत्त आरएएस धीरज मल डिंडोर (वरिष्ठ महासचिव), बारी निवासी नरसिंह (सचिव) थे। इसका प्रमाण इसमें मिलता है कि वार्ता के पश्चात उपाध्यक्ष जनक को कंपनी में नौकरी मिल गई तथा सभी पदाधिकारियों की जमीन अधिग्रहण क्षेत्र से बाहर कर दी गई।

परमाणु बिजलीघर के मुख्य द्वार का बारी गांव के उत्तर दिशा में रखा जाने; मुख्य द्वार के सामने मार्केटिंग बाजार, बिग बाजार (कॉम्पलेक्स) बनवाये जाने; बारी गांव से परमाणु बिजलीघर में होता हुआ नापला मेन हाईवे रोड पर बांसवाड़ा जाने हेतु पक्की सड़क बनाए जाने से संबंधित मांगे दिखाती हैं कि प्लांट से मिलने वाली सभी सुविधाएं दलीचंद मईड़ा तथा धनराज मईड़ा सिर्फ अपने लिए चाहते हैं। जबकि कानूनन प्लांट का डेढ़ किलोमीटर का क्षेत्र मानवरहित होना चाहिए। उनकी यह मांगें किसी भी सामान्य आदमी के समझ से परे हैं।

समिति के पदाधिकारियों और दलालों ने मिल कर पूरे क्षेत्र में 50 लाख प्रति बीघे जमीन के मुआवजे के नाम पर माहौल बना दिया। लोग अपनी जमीनों के सौदे के लिए तैयार हो गए। अगस्त 2015 में जब मुआवजे का वितरण होने लगा तब ग्रामीणों को जमीन का मुआवजा 7.68 लाख प्रति बीघा मिला।

गांव के लोगों को अब तक 75 प्रतिशत मुआवजा मिल चुका है केवल पुनर्वास का 25 प्रतिशत मुआवजा बाकी है। लोग अभी भी अपनी जमीनों पर काबिज है तथा अपने खेतों में खेती कर रहे हैं। कंपनी ने अभी तक किसी भी तरह की तारबंदी का कोई काम शुरु नहीं किया है। विस्थापित होने वाले गांवों में ढाबे खुल गए है जिससे लोगों के बीच शराबखोरी की लत बढ़ी है। लोगों ने मुआवजे के पैसे का अंधाधुंध इस्तेमाल करते हुए बड़े पैमाने पर मोटरसाइकिलें तथा कारें खरीद रहे हैं। हम यदि सिर्फ बारी गांव का उदाहरण लें तो वहां पर 250 मोटरसाइकिलें, 25 ट्रैक्टर, 10 कार और 6 टैम्पू खरीदे जा चुके हैं। यही हाल कमोबेश सभी गांवों का है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि विस्‍थापन के बाद इन लोगों के पास इन संसाधनों को खड़ा करने के लिए भी जमीन नहीं है। पुनर्वास के लिए भी लोग जमीनें या घर के बजाय पुनर्वास के लिए मिलने वाले दो लाख नकद की मांग कर रहे हैं।

घोटाले दर घोटाले

परमाणु बिजलीघर के लिए शुरुआती प्रयासों में जमीनें अधिग्रहण करने और मुआवजा लेने की कतार में खड़े होने में भी राजनीतिक प्रभाव का जमकर इस्तेमाल हुआ है। मुआवजे के लिए अपनी जमीनें-कुएं-पेड़ बताकर सूचियों में नाम लिखवा दिए गए। बिजलीघर के प्रस्तावित क्षेत्रों में कुछ सरपंच और प्रशासनिक व्यवस्था में पैठ रखने वाले रसूखदारों ने अधिकारियों से मिलीभगत करने में भी कसर नहीं छोड़ी और फर्जी तरीके से बिना खाते अपनी जमीन बताकर सरकारी राशि स्वीकृत करवा दी, जिसका अवार्ड तक पारित हो गया। पंचायत समिति छोटी सरवन के रेलगांव में बिजलीघर की भूमि अवाप्ति में मौके पर कोई घर नहीं, लेकिन करोड़ों का सरकारी अवार्ड तक पारित हो गया। इसकी जानकारी ग्रामीणों को तब पता चली, जब अवार्ड की सूची में ऐसे-ऐसे फर्जी नाम सामने आए, जिनका इलाके में कोई अस्तित्व नहीं, कोई मकान नहीं, कुछ भी नहीं। इस पर ग्रामीणों ने आपत्ति जतानी शुरू कर दी। जिसकी शिकायत जिला कलेक्टर तक पहुंचने पर आपत्तियों पर छोटी सरवन के तहसीलदार को जांच का आदेश दिया।

नापला गाँव के धीरज मल डिंडोर बताते है कि पॉवर प्लांट के मुआवजे की सूची में दबाव की राजनीति के चलते सर्वे के बाद 100 नए नाम जुड़वाये गए। एक अनुमान के मुताबिक 8 से 10 करोड़ के लगभग फर्जी लोगों को मुआवजा दिया गया है। अभी दो दिन से अखबारों में भी यह घपला छाया हुआ है। जिला प्रशासन ने 80 लाख के घोटाले को स्वीकार कर लिया है। डिंडोर आगे बताते है कि मुआवजा राशि लेने के लालच में माफिया भी हावी हुए है प्रस्तावित क्षेत्र में लगभग 200 लोग ऐसे हैं, जिन्होंने परियोजना का पता चलते ही आदिवासियों की जमीने औने-पौने दामो में खरीद ली थी, बाद में सरकार से कई गुना मुआवजा ले लिया। ऐसे लोगों की भी जाँच होनी चाहिए।

भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम ने कार्यालय के लिए हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी, बांसवाड़ा में भाजपा के स्थानीय नेता पूर्व राज्य मंत्री भवानी सिंह जोशी (भाजपा सरकार 1993-1998) की एक तिमंजिला इमारत किराए पर ले रखा है। ऑफिस में घुसते ही एक मेज-कुर्सी दिखती है जिस पर कमलेश मईड़ा (26) मिले। कमलेश निगम कार्यालय में 2014 से कार्यरत हैं। कमलेश खुद भी बारी गांव से विस्थापित परिवारों में से हैं। उनकी 15 बीघा जमीन अधिग्रहण में गई है। कमलेश के पिताजी रंगा मइड़ा पटवारी के निजी सहायक हैं। इस मेज कुर्सी के पीछे दीवार पर एक 24 लोगों की सूची टंगी है। यह 24 लोग इस कार्यालय में कार्यरत हैं। इन 24 लोगों में 5 लोग सिक्यूरिटी गार्ड हैं जिनमें कमलेश भी शामिल हैं। कमलेश को छोड़कर बाकी 4 गार्ड अधिग्रहण क्षेत्र में घूम-घूम कर लोगों को इस बात के लिए राजी कर रहे हैं कि वह पुनर्वास के लिए घर मांगने के बजाए दो लाख रुपए नकद ले लें।

कार्यालय में कमलेश के अलावा और कोई नहीं था। मुख्य अधिशासी अभियंता मयूर गुप्ता जयपुर किसी बैठक के लिए गए हुए थे। उनसे फोन पर बात करके जब प्रोजेक्ट की डीपीआर मांगी तो उन्होंने कहा कि वह मेल पर भेज देंगे। कार्यालय में प्रोजेक्ट संबंधी जानकारी देने के लिए और कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति नहीं मिला। मयूर गुप्ता ने कहा कि कमलेश एक आदिवासी हैं और उसे प्रोजेक्ट संबंधी सामग्री कहां रखी है उस का पता नहीं है। हालांकि कार्यालय की दीवार पर परियोजना का एक मानचित्र टंगा है किंतु उसके बारे में विस्तार से जानकारी देने के लिए कार्यालय में कोई भी नहीं है।


जितेंद्र चाहर सामाजिक कार्यकर्ता हैं और जन संघर्षों पर रिपोर्ट करने वाली वेबसाइट www.sangharshsamvad.org के मॉडरेटर हैं


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