राम-रहीम मामले में एलीट मीडिया भी एकतरफ़ा और ख़ुदगर्ज़ ही है ! 



विकास नारायण राय

एलीट मीडिया, राम-रहीम मामले में निहित बड़े-बड़े मुद्दे रेखांकित तो कर रहा है लेकिन यह सब करने में उसकी अपनी खुदगर्जी छिप नहीं पा रही. समाज में धर्म और धर्म गुरुओं की परजीवी स्थिति, कानून व्यवस्था और न्याय व्यवस्था की खामियां और यहाँ तक कि सत्ता राजनीति का उपेक्षा भरा रवैया भी उसके निशाने पर रहे हैं. लेकिन, सीमित वर्ग बोध से बंधी उसकी दृष्टि में नहीं शामिल है तो उसका यह स्वीकारना कि अपने दायरे में सिमट जाना ही उसकी नियति रही है.

स्वाभाविक था कि बलात्कार मामलों में राम-रहीम को सजा मिलते ही वह व्यावसायिक-अश्लील मीडिया में छा गया. इस प्रकरण को जम कर दुहने के क्रम में इस ब्रांड का मीडिया, अधिकांश मीडिया इसी ब्रांड का है, आवेशित-आक्रोशित समूहों को भटका भी रहा है और सहला भी. स्वयं की जवाबदेही को लेकर ही नहीं, सत्ता राजनीति के तमाम प्रमुख किरदारों की कारगुजारियों के सन्दर्भ में भी!

इसके समानांतर, सजे-धजे रवीश कुमार नजर आये एनडीटीवी के लिए यूथ समिट के एंकर के रूप में, कंगना रानौत के साथ महिला सशक्तीकरण को शर्मा-शर्मी अंदाज में निभाते हुये. योगेन्द्र यादव ने सत्ता संस्थानों की विफलता के मद्देनजर, सजा देने वाले जज को रूटीन काम अंजाम देने के लिए हीरो बना दिए जाने पर सवाल खड़े किये.

अपने हीरो या एक कल्ट फिगर को दयनीय देखना किसे अच्छा लगता है. वह भी जब राम-रहीम से चिढ़ी जनता के दम पर आप हर नंगे को नंगा कह सकने की स्थिति में हों. अपने मालिक प्रनोय रॉय के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘यूथ समिट’ की कवायद में दुम हिलाते रवीश कुमार को ‘एक छोटे शहर से बड़े शहर में आने का अनुभव’ कंगना से बाँटने से अधिक कृत्रिम क्षण टीवी के परदे पर कम ही मिलेंगे.

एलीट नजरिये से बोध की सीमा वह होती है जो एलीट लेखनी तय करे. केकी दारूवाला के लिए राम-रहीम प्रसंग, भाजपा सत्ताधारियों और उनके पोषित असारामों और श्री रविशंकरों जैसे देव पुरुषों की स्वेच्छाचारिता में सिमटी परिघटना है. मानो पहले न कोई चंद्रास्वामी हुए, न सत्य श्री साईं बाबा और न धीरेन्द्र ब्रम्हचारी. यहाँ तक कि रामदेव भी उनके राडार से गायब हैं.

योगेन्द्र यादव और केकी दारूवाला, रवीश की तरह आइकॉन नहीं हैं. इन दोनों सम्मानित बुद्धिजीवियों की टिप्पणियों को मैंने इस लिए चुना क्योंकि दोनों ने चंडीगढ़ के पंजाब-हरियाणा के वस्तुगत रिपोर्टिंग के लिए मशहूर अंग्रेजी अखबार ‘द ट्रिब्यून’ में लिखा है. राम-रहीम अपराध गाथा को इस अखबार ने लगातार अपनी रिपोर्टिंग से निशाने पर रखने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है.

आज सक्रिय राजनीति भी कर रहे योगेन्द्र यादव से मेरा निवेदन है कि वे सोचें, मौजूदा सिस्टम में वे रूटीन राजनीति भी कहाँ तक कर पा रहे हैं जो सीबीआई जज के ‘रूटीन’ साहस पर फैसले दे रहे हैं? दारूवाला तो कांग्रेस के ज़माने में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य रहे. कितनी छानबीन कर पाए होंगे उस दौर में राम-रहीमों को लेकर?

एनडीटीवी के प्रनोय रॉय की यूथ समिट को इसलिए भी चुना मैंने क्योंकि ज्यादा अर्सा नहीं हुआ जब उनके ठिकानों पर मोदी सरकार के शत्रुतापूर्ण नियोजित छापों को लेकर दिल्ली में बुद्धिजीवियों ने एक बहुप्रचारित विरोध बैठक की थी. सिरसा के छत्रपति को यह सुविधा नसीब नहीं थी और उन्हें राम-रहीम के भेजे गुंडों ने क़त्ल कर दिया. हरियाणा के हर शहर में मैं किसी न किसी छत्रपति को जानता हूँ और यह भी कि उनके लिए कोई प्रनोय रॉय विरोध बैठक करने के लिए आगे नहीं आने जा रहा. कोई छत्रपति रॉय की यूथ समिट में जगह नहीं पायेगा.

रवीश कुमार, योगेन्द्र यादव और केकी दारूवाला जैसा एलीट नजरिया एक अन्य मीडिया बिम्ब के जरिये से भी बेहतर समझा जा सकता है. बाढ़ से घिरे हताश लोगों को खाने के पैकेट गिराते हेलिकॉप्टर से लिए गये फोटो सभी ने देखे होंगे. कितने संतोष से तमाम राष्ट्रीय अखबार इस तरह के फोटो प्रमुखता से छापते हैं और तमाम राष्ट्रीय टीवी चैनल इन्हें सारा-सारा दिन दिखाते रहते हैं.

आश्चर्य नहीं कि एलीट लेखन में उन बलात्कार पीड़ितों की छवि नदारद है जिनके माँ-बाप ही उन्हें राम-रहीमों की पितृसत्ता में छोड़ने को अभिशप्त हैं. उस सत्ता राजनीति के चेहरे भी नंगे नहीं होते जिनके लिए धर्म गुरुओं की दलाली अनिवार्य है. सबसे बढ़कर, व्यवस्था से जूझते स्थानीय रिपोर्टरों की अनदेखी में, शार्क मीडिया घरों की अपनी कलुषित भूमिका भी छिपी रह जाती है.

राम-रहीम को उसके अंजाम तक पहुँचाने वाले युवा पैरोकारों, सीबीआई जांचकर्ताओं और सजा देने वाले जज के प्रति देशवासियों के आज कृतज्ञ होने का मतलब भी यही है.

 

(अवकाश प्राप्त आईपीएस, विकास नारायण राय हरियाणा के डीजीपी और नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद के निदेशक रह चुके हैं। )

 



 


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