अर्थव्यवस्था का चेहरा भी बदलेगा 11 दिसबंर के बाद !


बीजेपी कहीं ज्यादा कारपोरेट प्रेमी हो गई और काग्रेस भारत के जमीनी ढांचे को समझते हुये बदल गई ।




पुण्य प्रसून वाजपेयी

ये पहली बार होगा कि तीन राज्यो के चुनाव परिणाम देश की राजनीति पर ही नहीं बल्कि देश के इकोनॉमिक मॉडल पर भी असर डालेगें। जिस तरह किसान-मजदूर के मुद्दे राजनीतिक प्रचार के केन्द्र में आये और ग्रामीण भारत के मुद्दों को अभी तक वोट के लिये इस्तेमाल करने वाली राजनीति ने पहली बार अर्थव्यवस्था से किसानो के मुद्दों को जोड़ा, वह बाजार अर्थव्यवस्था से अलग जाने को मजबूर होगी, इस समझने के लिये किसी राकेट साइंस की जरुरत नहीं है।

ध्यान दें तो काग्रेस ने अपने घोषणापत्र मे जिन मुद्दो को उठाया उसे लागू करना उसकी मजबूरी भी है और देश की जरुरत भी । क्योकि मोदी सत्ता ने जिस तरह कारपोरेट की पूंजी पर सियासत की और सत्ता पाने के बाद कारपोरेट मित्रो के मुनाफे के लिये रास्ते खोले, वह किसी से छुपा हुआ नहीं है। और 1991 में आर्थिक सुधार के रास्ते, कारपोरेट के जरीये कांग्रेस ने ही बनाये ये भी किसी से छुपा नहीं है। लेकिन ढाई दशक के आर्थिक सुधार के बाद देश की हथेली पर भूख-गरीबी और असमानता जिस तरह बढ़ी और उसमें राजनीतिक सत्ता का ही जितना योगदान रहा उसमें अब राहुल गांधी के सामने ये चुनौती है कि वह अगर तीन राज्य जीतते हैं तो वैकल्पिक अर्थव्यवस्था की लकीर खींचें। और शायद ये लकीर खींचना उनकी जरुरत भी है जो भारतीय इकोनॉमिक माडल के चेहरे को खुद ब खुद बदल देगी। इसके लिये काँग्रेस को अर्थशास्त्री नहीं बल्कि राजनीतिक क्षमता चाहिये। क्योंकि चुनावी घोषणापत्र के मुताबिक दस दिनों में किसानों की कर्ज माफी होगी। न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों को मिलेगा। मनरेगा मजदूरो को काम-दाम दोनो मिलेगा। छोटे-मझोले उद्योगों को राहत भी मिलेगी और उनके लिये इन्फ्रास्ट्क्चर भी खड़ा होगा!

अब सवाल है कि जब ये सब होगा तो किसी भी राज्य का बजट तो उतना ही होगा, तब कौन सा रुपया किस मद से निकलेगा। जाहिर है कारपोरेट को मिलने वाली राहत राज्यो के बजट से बाहर होगी। और उसी मद का रुपया ग्रामिण इकोनॉमी को संभालेगा। क्योंकि किसान मजदूर या छोटे-मझोले उद्योगों  के हालात में सुधार का एक मतलब ये भी है कि उनकी खरीद क्षमता में बढ़ोतरी होगी । कारपोरेट युग में जिस तरह की असमानता बढ़ी, उसमें ग्रामीण भारत की पहचान उपभोक्ता के तौर पर कभी हो ही नहीं पायी। फिर जब दुनिया भर में भारत का डंका पीटा जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की पांचवी सबसे बडी इकोनॉमी हो चुकी है तो अगला सवाल कोई भी कर सकता है कि जब इतनी बडी इकोनॉमी है तो फिर भारतीय कारपोरेट अपने पैरों पर क्यो नहीं खड़ा हो पा रहा है। और उसे सरकार से राहत क्यो चाहिये। फिर एनपीए की सूची बतलाती है कि कैसे दस लाख करोड़ से ज्यादा की रकम कारपोरेट ही डकार गये और उनसे वसूली की जगह मोदी सत्ता ने की खेप में राहत देनी शुरु कर दी। और इसी कतार में आम जनता का बैंकों में जमा रुपया भी कारपोरेट सत्ता से करीबी दिखा कर फरार हो गया। जिन्हे भगोड़ा कहकर वापस भारत लाने का शिगूफा राजनीतिक तौर पर मोदी सत्ता ने बार बार कही। लेकिन सवाल ये नहीं है कि जो भगोडे़ हैं उन्हे सत्ता वापस कब लायेगी, बल्कि बडा सवाल ये है कि क्या वाकई मोदी सत्ता के पास कारपोरेट से इतर कोई आर्थिक ढांचा ही नहीं है। जाहिर है, यहीं से भारतीय राजनीति के बदलते स्वरुप को समझा जा सकता है। क्योंकि जनवरी में मोदी सरकार आर्थिक समीक्षा पेश करेगी और अपने पांच बरस की सत्ता के आखरी बरस में चुनाव से चार महीने पहले अंतरिम बजट पेश करेगी । और दूसरी तरफ काग्रेस अपने जीते हुये राज्यो में कारपोरेट से इतर ग्रामिण इकोनॉमी पर ध्यान देगी । यानी राज्य बनाम केन्द्र या कहें काग्रेस बनाम बीजेपी का आर्थिक माडल टकराते हुये नजर आयेगा। और अगर ऐसा होता है तो फिर पहली नजर में कोई भी कहेगा कि जिस आर्थिक माडल का जिक्र स्वदेशी के जरीये संघ करता रहा और एक वक्त बीजेपी भी आर्थिक सुधार को बाजार की हवा बताकर कहती रही, उसमें बीजेपी  कहीं ज्यादा कारपोरेट प्रेमी हो गई और काग्रेस भारत के जमीनी ढांचे को समझते हुये बदल गई । 

दरअसल पहली बार राजनीतिक हालात ही ऐसे बने है कि कांग्रेस के लिये कोई भी राजनीतिक प्रयोग करना आसान है और बीजेपी समेत किसी भी क्षत्रप के लिये मुश्किल है। क्योंकि राहुल गांधी के कंधे पर पुराना कोई बोझ नहीं है। कांग्रेस को अपनी पुरानी जमीन को पकड़ने की चुनौती भी है और मोदी के कारपोरेटीकरण के सामानांतर नई राजनीति और वैकल्पिक इकोनॉमी खड़ा करना मजबूरी है। मोदी सत्ता इस दिशा में बढ़ नहीं सकती क्योंकि बीते चार बरस में उसने जो खुद के लिये जाल तैयार किया उस जाल को अगले दो महीने में तोड़ना उसके लिये संभव नहीं है। हालाँकि तीन राज्यो के जनादेश का इंतजार करती बीजेपी ये कहने से नहीं चूक रही है कि मोदी वहाँ से शुरू करते हैं जहाँं काँग्रेस या विपक्ष की सोच खत्म हो जाती है। तो ऐसे में ये समझना भी जरुरी है कि चुनाव के जो आंकडे़ उभर रहे हैं उसमें बीजेपी से दस फीसदी तक एससी-एसटी वोट खिसके हैं । किसान-मजदूरो के वोट कम हुये हैं। बेरोजगार युवा और पहली बार वोट डालने वालो ने भी बीजेपी की तुलना में कांग्रेस को करीब दस फीसदी तक ज्यादा वोट दिये हैं। और अगर अगले दो तीन महीनों में मोदी उन्हे दोबारा अपने साथ लाने के लिये आर्थिक राहत देते हैं तो तीन सवाल तुरंत उठेगें । पहला , राज्यो के जनादेश में हार की वजह से ये कदम उठाया गया। दूसरा, कांग्रेस की नकल की जा रही है। तीसरा, चुनाव नजदीक आ गये तो राहत देने के कदम उठाये जा रहे हैं । फिर सच तो यह भी है सरकारी खजाना खाली हो चला है तभी रिजर्व बैक से एक लाख करोड़ रुपया बाजार में लाने के लिये रिजर्व बैंक के बोर्ड आफ डायरेक्टर्स पर दवाब बनाया जा रहा है । फिर चुनाव जब चंद फर्लांग की दूरी पर हो तो कारपोरेट मित्रों से पूंजी की जरुरत मोदी सत्ता को पडेगी ही। और कारपोरेट मित्रों को अगर ये एहसास होता् है कि मोदी सत्ता जा रही है तो वह ज्यादा दांव मोदी पर ही लगायेंगे। क्योंकि कांग्रेस तब मोदी के कारपोरेट मित्रों की पूंजी से बचना चाहेगी । पिर एक सच ये भी है कि पहली बार कांग्रेस ने राजनीतिक तौर पर मोदी के कारपोरेट मित्रों का नाम खुले तौर पर अपने चुनावी प्रचार में ना सिर्फ लिया बल्कि भ्रष्ट्रचार के मुद्दों को उठाते हुये क्रोनी कैपटलिज्म का कच्चा-चिट्टा भी खोला । 

तो चुनावी दांव के बदलते हालात में आखरी सवाल ये भी होगा कि तीन राज्यों की जीत के बाद काग्रेस महज महागढबंधन में एक साझीदार के दौर पर दिखायी नहीं देगी, बल्कि कांग्रेस के ही इर्द -गिर्द समूचे विपक्ष की एकजूटता दिखायी देगी। और इसका बडा असर यूपी में नजर आयेगा जहाँ काँग्रेस अकेले चुनाव लड़ने की दिशा में बढेगी। क्योकि काँग्रेस अब इस हकीकत को समझ रही है कि जब मायावती को तीन राज्यो के दलितो ने कांग्रेस की तुलना में कम वोट दिया तो यूपी में उसे गंठबंधन के साथ जाने पर कोई लाभ नहीं होगा। क्योकि काग्रेस के पारंपरिक वोट बैक सिर्फ किसान तक सीमित नहीं रहे हैं बल्कि दलित, आदिवासी, ओबीसी और ब्रहमण भी यूपी में साथ रहे हैं। इसीलिये कांग्रेस के लिये दिल्ली की सत्ता हमेशा यूपी के रास्ते निकली है। तो जिस परिवर्तन की राह पर कांग्रेस खड़ी है उसमें तीन राज्यों के जनादेश पहली बार राजनीतिक तौर तरीके भी बदल रहे हैं और देश का इकोनॉमिक माडल भी ।


लेखक वरिष्ठ टी.वी.पत्रकार हैं।


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