पाकिस्तान को कोसिए,लेकिन कश्मीरियों के ग़ुस्से को दरकिनार करना भयानक होगा


बुरहान वानी परिघटना के बाद से माहौल फिर से विस्फोटक होने लगा। बातचीत की किसी प्रक्रिया के अभाव में इसे हल करने की जिम्मेदारी पूरी तरह से सेना और अर्द्धसैनिक बलों को दी गई और हालात ऐसे बने कि एक तरफ़ तो स्थानीय लड़के लगातार बंदूक उठा रहे हैं तो दूसरी तरफ़ उनके जनाज़ों में भीड़ उमड़ रही है।





अशोक कुमार पाण्डेय 

अवंतिपुरा के पास जम्मू हाइवे पर कल हुए आत्मघाती हमले के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में इसकी तीखी मलामत करते हुए जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने कहा कि यह 2004-05 के पहले के दौर की याद दिलाता है। 

1989 में शुरू हुआ आतंकवाद का दौर 2001-02 तक जब कमज़ोर पड़ने लगा तो मिलिटेंट्स ने आत्मघाती हमलों की तकनीक अपनाई थी। यह उनके मास बेस के कम होते जाने और सेना के बढ़ते दबाव का नतीजा था। यह दौर लम्बा तो नहीं चला लेकिन बेहद भयानक था। 

लेकिन एक बड़ा फ़र्क़ यह था कि ये फिदाईन अक्सर पाकिस्तान या अफगानिस्तान से होते थे। 

असल में नब्बे के आतंकवाद का इतिहास देखें तो शुरुआत में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंटयानी जेकेएलएफ का दबदबा था। कश्मीर से भारी संख्या में युवा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के ट्रेनिंग कैम्पों से हथियार और ट्रेनिंग लेकर आये और उन्होंने यहाँ आतंकवादी कार्यवाहियाँ शुरू कीं। जेकेएलएफ आज़ादी की बात करता था और पाकिस्तान तथा भारत से अलग एक स्वतंत्र कश्मीर राष्ट्र की मांग करता था। लेकिन धीरे धीरे इस आंदोलन पर हिज़्बुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों का कब्ज़ा होता गया जो नारे भले आज़ादी के लगाते हों लेकिन स्पष्ट तौर पर पाकिस्तान के समर्थक थे। गीलानी इस समूह का वैचारिक लीडर बना और न केवल आतंकवादी कार्रवाइयों में भारतीय सेना को निशाना बनाया गया बल्कि जेकेएलएफ जैसे संगठनों और उन कश्मीरी नेताओं को भी नहीं बख़्शा गया जो पाकिस्तान विरोधी या कम से कम भारत से बातचीत के पक्षधर थे। हुर्रियत के बेहद शुरुआती नेताओं में से एक फ़ज़ल उल हक़ कुरैशी पर जानलेवा हमला किया गया, वह बच तो गए लेकिन शरीर का एक हिस्सा अपाहिज हो गया। अब्दुल गनी लोन को जब मारा गया तो सबका शक गीलानी पर था। इसके पहले जब मीरवाइज़ की हत्या हुई थी तो भी कई लोगों का मानना था कि यह पाकिस्तान समर्थक ग्रुप की ही कार्रवाई है। भारत की एक बड़ी नाकामयाबी कश्मीर में अपने करीबियों की हत्या न रोक पाना भी है। दुलत अपनी किताब में शब्बीर शाह को मुख्यधारा में लाने की बाजपेयी की कोशिश और मुख्यमंत्री बनाने की पेशकश की बात करते हैं। मुझे हमेशा लगा कि शायद यह डर भी शब्बीर के पीछे हटने की बड़ी वजह रहा हो। 

ख़ैर, पाकिस्तान के सीधे दख़ल और बड़ी संख्या में अफगानी और पाकिस्तानी लड़ाकों का कश्मीर में आना भी लोगों के मोहभंग का कारण बना। दस साल से ज़्यादा चले आतंकवाद के दौर से लोग ऊब भी गए थे और इसमें इन लड़ाकों के स्थानीय लोगों के प्रति व्यवहार ने उन्हें आतंकवाद से दूर कर दिया। एक बार स्थानीय सपोर्ट ख़त्म हुआ तो आतंकवाद की चमक फीकी पड़ने लगी। बाजपेयी के समय मे बातचीत की पहल के चलते उम्मीद का माहौल बना और 2007-08 के विधानसभा चुनावों में हुर्रियत के बहिष्कार के बावजूद जब बड़ी संख्या में लोग वोट देने निकले तो मीरवाइज़ की टिप्पणी थी कि हमें अपने तरीके बदलने होंगे। 

दुर्भाग्य यह कि न तो बाजपेई ही उस प्रक्रिया को किसी मकाम तक पहुंचा सके न ही उनके बाद कोई बड़ी प्रक्रिया शुरू हुई। फिर भी 2004-05 के बाद का एक दशक लगभग शांति का दशक रहा। छिटपुट घटनाओं के अलावा कोई बड़ी वारदात नहीं हुई और सेना ने कई कल्याणकारी योजनाएं लागू कीं जिससे एक बेहतर माहौल बनता दिखाई दिया। 

लेकिन बुरहान वानी परिघटना के बाद से माहौल फिर से विस्फोटक होने लगा। बातचीत की किसी प्रक्रिया के अभाव में इसे हल करने की जिम्मेदारी पूरी तरह से सेना और अर्द्धसैनिक बलों को दी गई और हालात ऐसे बने कि एक तरफ़ तो स्थानीय लड़के लगातार बंदूक उठा रहे हैं तो दूसरी तरफ़ उनके जनाज़ों में भीड़ उमड़ रही है। चौंकाने वाली बात इनका दूर दराज़ के गांवों तक फैल जाना है। पिछले दिनों श्रीनगर में हुए ग्रेनेड हमलों और अब हाइवे पर हुई इस भयानक घटना के बाद यह डर बढ़ गया है कि यह एक और लंबे ख़ूनी दौर को जन्म न दे। 

हालांकि पाकिस्तान के परोक्ष समर्थन से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन स्थानीय गुस्से और असंतोष को अनदेखा किया जाना भी भयानक होगा।

सभी एजेंसीज इस बात की ओर इशारा कर रही हैं कि इस बार एक्शन करने वाले सभी लड़के स्थानीय हैं। एनकाउंटर्स या सर्च ऑपरेशन के दौरान जिस तरह उन्हें कवर मिल रहा है उससे स्पष्ट है कि स्थानीय समर्थन भी काफी है। यही नहीं सोशल मीडिया ने एक बड़ा मंच दिया है जहाँ वे बंदूकों के साथ फोटो पोस्ट करते हैं ,वीडियोज़ डालते हैं और एक हीरो की छवि निर्मित करते हैं। वहीं भारत के दूसरे हिस्सों से अल्पसंख्यकों पर या फिर कश्मीरी छात्रों पर हुए हमले आग में घी का काम करते हैं।

याद कीजिये नोएडा के एक निजी कॉलेज के छात्र के साथ दुर्व्यवहार के बाद उसका आतंकवादी बन जाना या फिर अभी छत्तीसगढ़ में कश्मीरी छात्रों पर हमला या फिर जम्मू में फंसे हुए कश्मीरियों और स्थानीय छात्रों के बीच विवाद। ये सब घटनाएं कश्मीर में असंतोष को बढाने के काम आती हैं। इस दौर में कट्टरपंथी इस्लाम का जो प्रचलन बढ़ा है कश्मीर में उसने भी अपनी भूमिका निभाई और पूरे देश मे बढ़े दक्षिणपंथी कट्टरपंथ के साथ मिलकर यह एक भयावह पसेमंजर बना रहा है। 

इन हालात में यह कह पाना मुश्किल है कि यह घटना कश्मीरी मिलिटेंसी की हताशा का प्रतीक है या बढ़ी हुई हिम्मत की। यह भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि फिदाईन हमला किसी दीर्घकालिक नीति का हिस्सा है या फिर फौरी घटना। पक्के तौर पर जो कहा जा सकता है वह बस यही कि पिछले तीन दशकों से अधिक समय के अनुभव से यह साफ़ है कि केवल ताक़त से कश्मीर में शांति नहीं लाई जा सकती। ज़रूरत इस बात की है कि एक राजनैतिक प्रक्रिया की शुरुआत के लिए बातचीत शुरू की जाए। 

किसी देश के कंधे अपने नागरिकों और सैनिकों की लाशें रोज़ ब रोज़ ढोने के लिए नहीं बल्कि उनके क़दमों से लगातार बेहतर भविष्य की ओर चलने के लिए होते हैं।

अशोक कुमार पाण्डेय हालिया चर्चित किताब कश्मीरनामा : इतिहास और समकाल  के लेखक हैं।


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