बजट में ‘मोदी केयर’ का मतलब एक व्यक्ति पर केवल 40 रुपये का सरकारी खर्च?



अमन कुमार 

बजट 2018 की घोषणा करते हुये वित्तमंत्री ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना का एलान किया। वित्त मंत्री ने बजट पेश करते हुए कहा कि इस योजना के तहत देश के 10 करोड़ गरीब और वंचित परिवारों के लिए ये योजना शुरू की जाएगी। इससे लगभग 50 करोड़ लोगों को लाभ होगा। वित्तमंत्री ने दावा किया इस योजना से हर साल प्रत्येक परिवार को 5 लाख रुपये का मेडिकल खर्च दिया किया जाएगा। सरकार की तरफ से इसको विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सुरक्षा योजना कहा जा रहा है।

सरकार इस योजना विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना कह रही है लेकिन इसकी हकीकत कुछ और है। बजट में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग को 52 हज़ार 800 करोड़ रुपये दिए गए हैं जबकि पिछ्ले साल 51 हजार 500 करोड़ रुपये दिये गये थे जो पिछले साल के बजट के मुकाबले केवल 2.5 फीसदी ज़्यादा है। इस साल स्वास्थ्य के नाम पर लगने वाले सेस को बढ़ाकर 3 से 4 फीसदी कर दिया है। इससे जनता पर बिलों का बोझ और ज़्यादा बढ़ेगा। इससे सरकार को सालाना 11 हज़ार करोड़ रूपये ज़्यादा मिलने की संभावना है लेकिन स्वास्थ्य के लिए केवल 1250 करोड़ रूपये बढ़ाए गए हैं।

असली घोटाला और जुमला हालांकि कहीं और छुपा है। नई स्वास्थ्य नीति में स्वास्थ्य बीमा के लिये 2000 करोड़ रूपये दिए गए हैं यानी 500 करोड़ की बढ़ोतरी की गई है। अब हम सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं कि बढ़े हुये 500 करोड़ से कितने लोगों को बीमा लाभ दिया जा सकता है? योजना के मुताबिक 10 करोड़ परिवारों को स्वास्थ्य बीमा के तहत लाया जाना है जिससे लोगों की सेहत को सुधारा जा सके। सरकार एक परिवार में पांच लोगों की गणना करती है इसका मतलब 50 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य बीमा देना है, बजट राशि है 2000 हजार करोड यानी प्रतिव्यक्ति 40 रुपए। अगर चार लोगों के परिवार के हिसाब से आकलन किया जाये तो प्रति व्यक्ति 50 रुपए। सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं और उनको लेकर सरकार की गम्भीरता का अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है।

मोदी केयर जिसे नमोकेयर भी कहा जा रहा है, इसके तहत 10 करोड़ परिवारों को प्रतिवर्ष प्रति परिवार 5 लाख रुपये का मेडिकल खर्च प्रदान किया जाएगा। मोदी सरकार द्वारा पहले भी स्वास्थ्य बीमा का एलान किया गया था लेकिन उसकी हकीकत से हम सब वाकिफ़ हैं। 5 लाख के स्वास्थ्य बीमा का हाल भी वही न हो पहले वाले का हुआ। 2016 में ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना’ का एलान किया गया था जिसमें हर परिवार को 1 लाख का स्वास्थ्य बीमा दिया जाना था। दो साल बीत जाने के बाद अभी भी प्रतिवर्ष लगभग 30,000 रुपये का बीमा ही दिया जा रहा है।

सरकार ने बजट में एक लाख 50 हज़ार स्वास्थ्य केंद्र बनाने का दावा किया है जिसके लिए 1200 करोड़ रूपये दिये गये हैं। इस हिसाब से एक स्वास्थ्य केन्द्र के निर्माण में लगभग 80,000 रुपये मिलेंगे। एक स्वास्थ्य केन्द्र के निर्माण के लिये ये रकम बहुत कम है। इतनी कम रकम से स्वास्थ्य केन्द्र का निर्माण असंभव है। पहले बने स्वास्थ्य केन्द्रों के हालात से हम सभी वाकिफ़ हैं।

नए स्वास्थ्य केन्द्रों की बात न करके अगर वर्तमान स्वास्थ्य केन्द्रों की हालत को भी देखा जाए तो स्वास्थ्य सेवाओं का अंदाजा लगाया जा सकता है। वर्तमान में लगभग एक लाख 56 हज़ार 231 स्वास्थ्य केंद्र हैं लेकिन मार्च 2017 को स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी किए गए स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक, इन केन्द्रों में से केवल 17,204 मतलब 11 फीसदी ही मानकों पर खरे उतरते हैं। 20 फीसदी केन्द्रों में साफ पानी नहीं है 23 फीसदी स्वास्थ्य केन्द्र बिजली की कमी से जूझ रहे हैं और लगभग 6000 स्वास्थ्य केन्द्रों में महिला स्वास्थ्यकर्मी नहीं है व एक लाख केन्द्रों में पुरुष स्वास्थ्यकर्मी नहीं है।

बजट में घोषित की गई मोदीकेयर एक और घोटाला न बन जाये इसके लिये इस योजना की निगरानी जरूरी है। कहीं ऐसा न हो कि मोदी सरकार की ये योजना बीमा कम्पनियों की लूट का साधन न बन जाये। सरकार ने बजट भाषण में ऐसा कोई संकेत नहीं दिया कि कौन सी बीमा कम्पनियां इस सुविधा को उपलब्ध करायेंगी। कहीं स्वास्थ्यसेवाओं को निजी हाथों में सौंपने का प्लान तो नहीं है? प्रीमियम भुगतान के पुराने अनुभव भी याद रखे जाने आवश्यक हैं जिससे दोबारा ऐसी स्थिति न आये।

‘मोदीकेयर’ का रोडमैप क्या है और कब तक इसको लागू किया जायेगा? इसकी अवधि क्या होगी? इस योजना का हश्र भी अन्य चुनावी वायदों की तरह तो नहीं होगा?