चौराहे पर साहेब !


छत्तीसगढ के 27 और मध्यप्रदेश के 36 लोगों पर दिल्ली से सीबीआई और इनकम टैक्सके छापे पड़े।




पुण्य प्रसून वाजपेयी

आसान है कहना कि 2014 में उगा सितारा 2019 में डूब जायेगा। ये भी कहना आसान है पहली बार किसान-मजदूर-बेरोजगारी के मुद्दे सतह परआये तो शहरी चकाचौंध तले विकास का रंग फीका पड़ गया। ये कहना भी आसान है कि बीजेपीआंकड़ों के लिहाज से चाहे विस्तार पाती रही लेकिन अपने ही दायरे में इतनी सिमटी कीमोदी-शाह-जेटली से आगे देख नहीं पायी। और ये भी कहना आसान है कि साल भर पहले कांग्रेसकी कमान संभालने वाले राहुल गांधी ने पप्पू से राहुल के सफर को जिस परिपक्वता केसाथ पूरा किया उसमें काग्रेस के दिन बहुरने दिखायी देने लग गये।

लेकिन मुश्किल है ये समझना कि जिस लोकतंत्र की धज्जियां दिल्ली में उड़ायी गई उसके छांव तले राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रेदश कैसे आ गये ! और अब क्या 2019 के फेर में लोकतंत्र और ज्यादा लहूलुहान होगा? क्योंकि जहाँ-जहाँ दाँव पर दिल्ली थी वहाँ-वहाँ सबसे बुरी हार बीजेपी की हुई। छत्तीसगढ़ में अडानी के प्रोजेक्ट हैं तो रुपया पानी की तरह बहाया गया। पर जनादेश की आँधी ऐसी चली कि तीन बार की रमन सरकार ही बह गई। मध्यप्रदेश के इंदौर और भोपाल सरीखे शहरी इलाको में भी बीजेपी को जनता के मात दे दी। जहाँ की सीट और कोई नहीं अमित शाह ही तय कर रहे थे। और राजस्थान में जहाँ-जहाँ वसुंधरा को धूल चटाने के लिये मोदी-शाह की जोड़ी गई वहाँ- वहाँ वसुंधरा ने किला बचाया और जिन 42 सीटो को दिल्ली में बैठ कर अमित शाह ने तय किया उसमें से 34 सीटो पर बीजेपी की हार हो गई।

तो क्या वाकई 2014 कीजीत के नशे में 2019 की जीत तय करने के लिये बीजेपी के तीन मुख्यमंत्रियों का बलिदानहुआ। या फिर कांग्रेस ने वाकई पसीना बहाया और जमीनी स्तर पर जुड़े कार्यकर्ताओं कोमहत्ता देकर अपने आलाकमान के पिरामिड को इस बार पलट दिया। यानी ना तो पैराशूटउम्मीदवार और ना ही बंद कमरो के निर्णयों को महत्व ! तो क्या बूथ दर बूथ और पन्ने दर पन्ने की सोच तले पन्ना प्रमुखकी रणनीति जो शाह बनाते रहे, वह इस बार टूटगया। हो सकता है ये सारे आकलन अब शुरु हों लेकिन महज चार महीने बाद ही देश को जिसआम चुनाव के समर में कूदना है उसकी बिसात कैसी होगी और इन तीन राज्यो में कांग्रेसकी जीत या बीजेपी की हार कौन सा नया समीकरण तैयार कर देगी, नजरें तो इसी पर हर किसी की होंगी।

हाँ , तेलंगाना में काग्रेस की हार से ज्यादा चन्द्रबाबू के बेअसर होने ने उस लकीर को चाहे अनचाहे मजबूत कर दिया कि कि अबगठंबधन की शर्तें क्षत्रप नहीं कांग्रेस तय करेगी। यानी जनादेश ने पांच इशारे साफ़तौर पर दिए हैं। पहला ये कि अब मोदी को चेहरा बनाकर प्रेजीडेन्शिलफार्मेट की सोच की खुमारी बीजेपी से उतर जायेगी। दूसरा, मोदी का विकल्प नहींकी खाली जगह पर ठसक के साथ राहुल गांधी नजर आयेगें। तीसरा, दलित वोट बैंककी एकमात्र नेत्री मायावती नहीं हैं और 2019 में मायावती की सौदेबाजी का दायरा बेहदसिमट गया है। चौथा, महागठबंधन के नेता के तौर पर राहुल गांधी को खारिज करने कीस्थिति में कोई नहीं होगा और पांचवाँ ये कि  बीजेपी के सहयोगी छिटकेगें और शिवसेना की सौदेबादी का दायरा न सिर्फ बीजेपी को मुश्किल में डालेगा बल्कि शिवसेना मोदी पर सीधा हमला बोलेगी।

तो क्या वाकई काग्रेस के लिये अच्छेदिनों की आहट और बीजेपी के बुरे दिन की शुरूआत हो गई है। अगर इस सोच को सही मानलें तो जनता जनादेश के जरिये इशारा कर चुकी है, हालाँकि उसे जुंबाँ कौन सी सत्ता देपायेगी ये अपने आप में सवाल है। मसलन राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़, तीनों सत्ता घाटेके साथ कांग्रेस को मिल रही है। यानी सत्ता पर कर्ज है। तीन राज्यो मेंकिसान-मजदूर-युवा बेरोजगार बेहाल हैं। तीनों राज्यो में औद्योगिक विकास ठप पड़ा है।तीनों राज्यों में खनिज संसाधनो की लूट चरम पर है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तोसंघ के स्वयसेवको की टोलियों का कब्जा सरकारी संस्थानो से लेकर सिस्टम के हर पुर्जे पर है। और सबसे बड़ी बात तो ये है कि मौजूदा दौर में जो खटास राजनीतिक तौरपर उभरी वह सिर्फ बयानबाजी या राजनीतिक हमले भर की नहीं रही बल्कि सीबीआई और इनकम टैक्सके अधिकारियों ने कांग्रेसी पर मामला भी दर्ज किया और छापे भी मारे। काँग्रेस कोफाइनेन्स करने वाले छत्तीसगढ़ के 27 और मध्यप्रदेश के 36 लोगों पर दिल्ली से सीबीआई और इनकम टैक्सके छापे पड़े।

यानी राजनीतिक तौर तरीके पारंपरिकचेहरे वाले रहे नहीं हैं। तो ऐसे में सत्ता परिवर्तन राज्य में जिस तल्खी के साथउभरेगें उसमें इस बात का इंताजार करना होगा कि अब कांग्रेस के लिये संघ का मतलबसामाजिक सांस्कृतिक संगठन भर नहीं होगा। बात यही नहीं रुकती, क्योकि मोदी भी समझरहे हैं और राहुल गांधी भी जान रहे हैं कि अगले तीन महीने की सत्ता 2019 कीबिसात को तय करेगी। यानी सत्ता चलाने के तौर तरीके बेहद मायने रखेगें। खासकर आर्थिकहालात और सिस्टम का काम करना। मोदी के सामने अंतरिम बजट सबसे बडी चुनौती है तो कांग्रेसके सामने नोटबंदी के बाद असंगठित क्षेत्र को पटरी पर लाने और ग्रामीणों की हालतमें सुधार तत्काल लाने की चुनौती है। और संयोग से इनकी तादाद सबसे ज्यादा उन्हीतीन राज्यो में है जहा कांग्रेस को जीत मिली है। फिर भ्रष्टाचार के मुद्दों कोउठाकर 2014 में जिस तरह बार बार मोदी ने कांग्रेस को घेरा अब इन्ही तीन राज्यो में भ्रष्ट्रचार केमुद्दो के आसरे कांग्रेस बिना देर किये बीजेपी को घेरेगी । मध्यप्रदेश का व्यापमघोटाला हो या वसुंधरा का ललित मोदी के साथ मिलकर खेल करना या फिर रमन सिंह कापनामा पेपर। और इस रास्ते को सटीक तरह से चलाने के लिये तीनों राज्यों में जो तीनचेहरे कांग्रेस में सबसे फिट हैं, उसमें मध्यप्रदेश में कमलनाथ, तो राजस्थान मेंसचिन पायलट और छत्तीसगढ़ में भूपेश बधेल ही फिट बैठते हैं। ये तिकड़ी कांग्रेसीओल्ड गार्ड और युवा को भी बैलेस करती है। और बघेल के जरिये रमन सिंह या छत्तीसगढ़में अडानी के प्रोजक्ट पर भी लगाम लगाने की ताकत रखती है।

इस कड़ी में आखरी सवाल यही है कि अबशिवराज, रमन सिंह औरवसुंधरा का क्या होगा। या फिर मोदी – शाह की जोड़ी अब कौन सी बिसात बिछायेगी याफिर मोदी सत्ता कौन सा तुरुप का पत्ता देश के सामने फेकेगीं जो मई 2019 तकबरकरार रहें। या फिर बीजेपी के भीतर से वाकई कोई अवाज उठेगी या संघ परिवार जागेगा।ध्यान दें तो कोई विकल्प अब बीजेपी के भीतर नहीं है। मोदी के बाद दूसरी कतार केनेता ऐसे है जो अपना चुनाव नहीं जीत सकते या फिर उनकी कोई पहचान किसी राज्य तो दूरकिसी लोकसभा सीट तक की नहीं है। मसलन, अरुण जेटली , धर्मेन्द्रप्रधान , पीयूष गोयल यानिर्मला सीमारमण। इस कड़ी में हारे हुये मुख्यमंत्रियों को अमित शाह कौन सी जगह देगें, ये भी सवाल है।

जनादेश ने साफ तौर पर बतलाया है किजादू या जुमले से देश चलता नहीं और मंदिर नहीं सवाल पेट का होगा। सिस्टम गढ़ा नहींजाता बल्कि संवैधानिक संस्थाओ के जरिये चलाना आना चाहिये। शायद इसीलिये पांच राज्यो के जनादेश ने मोदी को लोकतंत्र के चौराहे पर ला खड़ा किया है।

(लेखक मशहूर टीवी पत्रकार हैं.)



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