सोहराबुद्दीन फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले में CBI नहीं कर रही सहयोग-हाईकोर्ट



बाम्बे हाईकोर्ट की जज रेवती मोहिते डेरे ने सीबीआई की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आश्चर्य जताया है कि सीबीआई सोहराबुद्दीन हत्याकांड मामले में 164 के तहत हुई गवाहियों को भी पेश नहीं कर रही है। यह अभियोजन की ज़िम्मेदारी है कि अदालत के सामने सारे रिकार्ड और सबूत पेश करे, लेकिन सीबीआई सिर्फ़ चुनिंदा मसले पर बात कर रही है। दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 164 के तहत दिए गए बयान मजिस्ट्रेट के सामने दिए जाते हैं। अदालत में इन्हें बिना किसी दबाव के दिया गया बयान माना जाता है।

इंडियन एक्सप्रेस में छपी ख़बर में कहा गया है कि 2005 में हुए सोबराबुद्दीन फ़र्जी मुठभेड़ मामले में कुछ आरोपितों को छोड़े जाने को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान बुधवार को जज ने यह कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि सीबीआई केवल राजस्थान पुलिस के सिपाही दलपत सिंह और गुजरात पुलिस के अफसर एन.के.अमीन तक खुद को महदूद रख रही है।

अदालत में इस मामले की सुनवाई 9 फरवरी से कर रही है। सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन ने गुजरात के पूर्व डीआईजी डी.जी.बंजारा और आईपीएस अफसर दिनेश एम.एन और राजकुमार पांडियन तथा सीबीआई ने राठौड़ और अमीन को बरी किए जाने के ख़िलाफ़ याचिका दायर की है।

जज डेरे ने साफ़ कहा है कि इस मामल में उन्हें यथोचित सहयोग नहीं मिल रहा है। उन्होंने कहा “मैं पूरी तस्वीर जानना चाहती हूँ न कि कुछ अलग-थलग वक्तव्य।” उन्होंने सीबीआई से गवाहों को दी गई सुरक्षा के बारे में भी पूछा।

जज डेरे पिछले दो हफ्तों से सीबीआई को केस से संबंधित तमाम ज़रूरी दस्तावेज़ पेश करने को कह रही थीं। उन्होंने कहा था कि यह सीबीआई का कर्तव्य है कि कम से कम धारा 164 के तहत हुई गवाहियों का ब्योरा अदालत के सामने रखे।

हाईकोर्ट जज की यह टिप्पणी इस मामले में सीबीआई के पूरे रवैये पर गंभीर सवाल उठाता है। आरोप है कि राजनीतिक दबाव में आरोपितों को बरी कराने का अभियान चल रहा है और सीबीआई लंबी जाँच-पड़ताल के बाद दायर किए गए अपने ही मामलों को अंजाम तक पहुँचाने के लिए तैयार नहीं है।

यह बताता है कि सीबीआई का अंजाम हर हाल में तोता होना है। वे लोग वाक़ई भोले हैं जो आज भी किसी संवेदनशील मामले की सीबीआई जाँच की माँग को गंभीर कार्रवाई मानते हैं।

 



 

 


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