मोदीजी कहते हैं कि “कानून का जंगल” साफ़ करना है। इसका मतलब क्‍या है?



शिवाजी राय

नोटबंदी और जीएसटी के बाद अब मोदीजी की निगाह जमीन और श्रम छीनने पर टिकी है। हम बताना चाहते हैं कि देश के प्रधानमंत्री लगातार अपने भाषणों में जिक्र करते हैं कि कानून का जंगल साफ करना है तो यह डर लगता है कि देश के उद्योगपतियों की बंधक यह संसद अब वह कौन सा कानून बनाएगी जिससे देश के किसानों और मजदूरों का हक छीना जायेगा क्योंकि देश की संसद व विधानसभाओं में किसानों-मजदूरों का प्रतिनिधित्व अनुपस्थित है। अब भारी संख्या में अरबपति और करोड़पति ही संसद के सदस्य हैं। इस हालत में किसानों, मजदूरों, गरीबों और बेरोजगारों नौजवानों, महिलाओं के हित में कानून तो बन ही नहीं सकते। यदा कदा प्रतिनिधि यदि उनकी हिमायत करने वाले हैं भी तो व्हिप जारी करके उनकी सदस्यता के अधिकार को प्रतिबंधित कर दिया जाता है।

किसानों के जमीन के अधिकार की बात करें तो हम पाते हैं कि भूमि अधिग्रहण कानून जो 1894 में बना था वह आजादी के बाद भी समाप्त नहीं किया गया। साथ ही किसानों से राजस्व वसूली का कानून आज भी यथावत है। आर्थिक उदारीकरण की नीति के तहत देश में विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज़), विशेष विकास क्षे़त्र (एसडीजेड) और औद्योगिक खेती (कारपोरेट खेती) के नाम पर देश में लाखों हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित कर किसानों से छीन कर कारपोरेट धरानों को सौंप दी गई जिसके लिए विभिन्न राज्यों में किसान अपनी जमीन बचाने के लिए सरकार के आमने सामने हुए। सरकारों ने गोलियां चलायीं और हजारों किसान मारे गये। जहां कहीं ये घटनायें घटीं उन जगहो में सिंगूर, नंदीग्राम, सिसवामहंत कुशीनगर, भटनी देवरिया, करछना इलाहाबाद, दादरी, भट्टा परसौल आदि जगहों पर विवाद के बाद आज भी जमीनें फंसी हुई हैं। कुछ जगहों के मामले न्यायालय में हैं और कुछ जगह अधिग्रहण के खिलाफ फैसले भी आये हैं। मैं कहना चाहता हूँ कि पूरे देश में किसानों और जनसंगठनों के व्यापक जनआनदोलन के बाद केन्द्र की पूर्वर्ती सरकार ने विवश होकर के भूमिअधिग्रहण कानून 1894 को संशोधित तो किया लेकिन किसानों के जमीन पर मालिकाना हक की मांग सौ फीसदी सहमति की थी जिसमें मनमोहन सरकार ने कटौती कर सत्तर से अस्सी फीसदी सहमति पर संशोधित किया एवं जमीन के दाम के साथ-साथ अन्य सुविधाओं का प्रावधान भी रखा।

यह बात तय है कि इस संशोधन की बात देश के उद्योगपतियों को अच्छी नहीं लगी क्योंकि वे कदापि नही चाहते हैं कि अरबों-खरबों के मालिक फटेहाल किसान के पास जाकर जमीन के लिए सहमति मांगें और सौदा करें क्योंकि अभी तक जो उन्हें दी गयीं वे जमीने परियोजना की आवश्यकता के कई गुना ज्यादा अधिग्रहण करके दी गयीं और उन जमीनों का मूल्य भी औने-पौने दाम में है तथा जमीन हड़पवाने की सारी जिम्मेदारी सरकार ने खुद ही उठायी है। आज एक-एक उद्योगपति पच्चीस-पच्चीस हजार हेक्टेयर का मालिक है और जिन परियोजनाओं के उद्देश्य से जमीनें दी गयी हैं वे परियोजनायें न लगाकर जमीनों को अन्य कार्यों के उपयोग में लाया जाता है। सरकार ने जो कानून बनाया उसके अनुसार जो जमीन अधिग्रहित कर सौंपी गयी है उसमे पाँच साल के अन्दर ही यदि उन पर परियोजनाओं की शुरूआत नहीं होती और दस साल के अन्दर परियोजना चालू नहीं होती तो वह जमीन वापस ले ली जायेगी लेकिन आजतक उसपर कोई कार्यवाही नही हुई। साथ ही पूँजीपतियों को ये पसंद नहीं है। जिस तरह से पूँजीपति जमीन के लिए किसान के सामने हाथ फैलाये उसी तरह से देश के फटेहाल गरीब मजदूर अपनी श्रम शक्ति बेचने के लिए इन पूँजी के मालिकों से सौदा करे और श्रम पर अपना अधिकार जताए। इस लिए सौ वर्षों के अन्तराल में मजदूर संगठनों द्वारा लगातार संघर्ष कर और गोलियां खाकर तमाम किस्म के कानून मजदूरों की श्रम की रक्षा में बनवाये गये थे जिसमें तमाम किस्म की सोशल सिक्योरिटी का प्रावधान था। धीरे-धीरे संशोधित होते-होते मामूली से जो अधिकार बचे हैं वह भी औद्योगिक घरानों को पच नहीं रहे हैं तो मोदीजी के भाषण में यह जिक्र करना कि कानूनो का जंगल साफ करना है, इसका अभिप्राय साफ दिखता है भूमि अधिग्रहण कानून 2013 तथा श्रम सुधार कानून में बदलाव, जिसकी सीमा हायर एंड फायर तक जाती है।

मुख्य रूप से बात ये है कि ये मोदीजी का एजेंडा नहीं बल्कि कारपोरेट का एजेंडा है। मैं मोदीजी के शपथ ग्रहण समारोह की चर्चा करते हुए कहना चाहता हूं कि इस पूरे शपथग्रहण समारोह में किसानों और मजदूरों के प्रतिनिधि नहीं दिखाई दिये। इससे मोदीजी किसके प्रति प्रतिबद्ध हैं साफ दिखाई देता है। गंभीर बात है कि पहली बार ’’उद्योगपतियों’’ ने सरकार में निवेश किया है। अभी तक वे पार्टियों को चंदा दिया करते थे। इस बात का भी मायने समझ में आ रहा है कि मोदीजी ने गुजरात में कृषि विश्वविद्यालय की 2000 एकड़ जमीन टाटा को जो नैनो के लिए दिया था तो रतन टाटा ने उन्हें विकास पुरूष कहा था। उत्तर प्रदेश में मोदीजी ने जिस तरह से चुनाव प्रचार में शमशान,  विकास और किसानों के पूरे कर्जे माफ करने के नाम पर उत्तर प्रदेश में बहुमत की सरकार बनाने की बात की थी। इसका अभिप्राय भी तब समझ में आया जब 17 मार्च 2017 और 18 मार्च 2017 को एक अमेरिकी विशेषज्ञ की जो राय आयी है कि 2018 में राज्यसभा में बहुमत हो जायेगा और मोदीजी भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में संसोधन तथा श्रम सुधार को पास करने में सफल हो जायेंगे।

अब जो सबसे बड़ा संकट आने वाला है वो किसानों मजदूरों के जमीन और श्रम के अधिकार का संकट है। किसान और मजदूर संगठनों की शंका वाजिब है कि माननीय प्रधानमंत्री भी आखिर गुजरात चुनाव को ही अपनी अस्मिता का विषय बनाकर चुनाव लड़ रहे थे। उपरोक्त लंम्बित दोनो बिल पास करने में कोई दिक्कत न हो,  सरकार संसद और कारपोरेट के साथ-साथ किसानों मजदूरों के हक हड़पने में देशी और विदेशी कारपोरेट मीडिया भी महती भूमिका अदा कर रही है। हेनरी डेविड थोरो ने डिसओबिडिएंस में लिखा है कि ’’सरकार हमारे ही टैक्स से पुलिस पालती है और पुलिस मेरे ऊपर डंडे बरसाती है। इससे साफ जाहिर है कि मेरा ही पैसा मेरे ही ऊपर डंडे बरसाता है।’’ उसी तरह से यह बात भी सिद्ध है कि किसानो मजदूरों के वोट से देश की संसद और सरकार चुनी जाती है और किसानो मजदूरों के खिलाफ ही कानून बना कर उनके श्रम और खेती, किसानी की लूट की जाती है। इसका सीधा अर्थ है कि किसान मजदूर का वोट ही उनके हक का अपहरण करता है।

धीरे-धीरे किसान संगठनों की लामबंदी इस बात के लिए तेज हो रही है कि भारतीय जनता पार्टी के घोषणापत्र में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार लागत मूल्य के डेढ़ गुना समर्थन मूल्य तय करने तथा किसानों की सम्पूर्ण ऋणमुक्ति की बात देश के प्रधानमंत्री जी ने कही थी लेकिन अपने वादे पर ख़रे नही उतरे तथा श्रम संगठनों ने श्रम सुधार बिल के खिलाफ भारी संख्या में एकजुट होकर संसद पर मार्च किया। साथ ही साथ अब किसान मजदूर संगठनों के उपरोक्त प्रस्तावों के खिलाफ लड़ने के एका पर बल दिया जा रहा है। ब्रिटिश हुकूमत का राजस्व वसूली का वह कानून जो किसानों पर लागू होता है, जिसके तहत तहसीलदार और कलेक्शन अमीन किसान को पकड़ करके लेजाकर तहसील के हवालात में डाल देता है। पैसा न जमा करने पर चौदह दिन तक हवालात में रखा जाता है और हवालात में रहने पर जो खर्च आता है उसे राजस्व में जोड़ दिया जाता है तथा दस प्रतिशत कलेक्शन चार्ज भी ब्याज के साथ जोड़ा जाता है। हवालात में रखने के बाद उस किसान की मुक्ति नहीं हो पाती है। छः महीने बाद फिर से उस किसान को हवालात में ले जाया जा सकता है। राजस्व वसूली का यह काला कानून उस पर लागू किया गया है जो देश का अन्नदाता कहा जाता है, पूरे देश के लिए भोजन पैदा करता है और स्वयं कर्ज में डूबे रहकर और चिथड़े लपेट कर गुजारा करता है। लेकिन देश की बैंको में देश की जनता का जमा धन देश के उद्योगपतियों को लाखों करोड़ रूपये कर्ज में दे दिया जाता है। बाद में सरकार, बैंक और उद्योगपतियों के आपसी तालमेल से उसे बेलआउट पैकेज, बेलइन , बट्टाखता,  राइटआफ के माध्यम से उनको मुक्त कर दिया जाता है और पुनः विकास और उत्पादन के नाम पर ब्याज दर कम करके बिना शर्त उन्हे कर्ज दे दिया जाता है। उनके लिए न कोई तहसीलदार , न कलेक्शन अमीन न हवालात का कानून और न जबाबदेही तय हो पाती है। इस देश में प्रतिवर्ष राजस्व वसूली के नाम पर लाखों सम्मानित किसान तहसीलों के हवालातों में बंद होते हैं और बेइज्जत किये जाते हैं और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी नष्ट की जाती है। कभी-कभी शर्म के मारे किसान आत्महत्या कर लेते है।

मोदीजी यदि कानून का जंगल साफ करना है तो अंग्रेजी हुकूमत का वो काला कानून जो किसानों पर लागू है उसे खत्म करना चाहिए और किसानों मजदूरों के हितैशी अपने को गरीब का बेटा मानते हैं तो मजदूरों के सोशल सिक्यिोरिटी के रूप में आप ही की पूर्वर्ती सरकार द्वारा खत्म की गयी पुरानी पेंशन के साथ-साथ जो मजदूरों की पुरानी सामाजिक सुरक्षा का कानून का प्रस्ताव है उसे लाना चाहिए तथा किसानों की सामाजिक सुरक्षा के लिए सारे नफे नुकसान से इतर प्रत्येक किसान परिवार को एक सांसद के महीने का वेतन और भत्ते के बराबर सालाना आय सुनिश्चित करने के लिए देश की संसद में कानून लाना चहिए तथा देश में आम चुनाव में व्यापक स्तर पर सुधार कर संसद और विधानसभाओं में किसानों मजदूरों की भागीदारी के लिए संख्या के आधार पर किसानों मजदूरों की विधानसभा क्षेत्र निर्धारित करने के लिए कानून लाया जाना चाहिए तथा चुनाव प्रक्रिया को नौकरशाही से मुक्त किया जाना चाहिए। किसानों मजदूरों की भागीदारी के बिना सच्चे लोकतंत्र की कल्पना करना बेईमानी है।


 

लेखक किसान मजदूर संघर्ष मोर्चा के अध्‍यक्ष हैं।


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