दिल्लीः न दंगा एकतरफ़ा है, न डर! लोग जानते हैं इसे हिंदू-मुसलमान बनाया गया है…

तेज बहादुर सिंह
ख़बर Published On :


मेरे छोटे भाई के पैर में गोली के छर्रें लगे हुए थे. वो रो रहा था. हम सब मजबूर थे. उसको दर्द में तड़पते देखने के लिए. चाहकर भी हम उसे अस्पताल नहीं ले जा पा रहे थे क्योंकि बाहर उपद्रवी भीड़ लाठी, डंडे और बंदूक के साथ लोगों को मारने पर उतारू थी…

नूर-ए-इलाही में रहने वाली शगुफ़्ता एज़ाज का गला ये कहते हुए रुंधने लगता है.

वो बताती हैं, “हम नहीं जानते ये कौन लोग हैं. ये जो भी हैं न ये हिंदू हैं और न ही मुसलमान. ये सिर्फ उपद्रवी हैं. कोई हिंदू या मुसलमान ऐसा हो ही नहीं सकता है क्योंकि वो सबसे पहले एक इंसान होता है. मेरे मोहल्ले के हिंदू लोग तो हमारे साथ खड़े हैं. हमारे साथ-साथ उनको भी धमकाया डराया जा रहा है”.

सोमवार और मंगलवार को दिल्ली के उत्तर पूर्वी इलाकों में नागरिकता संशाेधन कानून के विरोधियों और समर्थकों के बीच हुए दंगे के शिकार हुए सैेकड़ों लोगों में शगुफ्ता का परिवार एक है.

शगुफ्ता कहती हैंं, “मोहल्ले में पुलिस उपद्रवियों के साथ खड़ी थी. ऐसे वक्त में हम किसके ऊपर भरोसा करें? पूरे मोहल्ले के लोग एक साथ होकर खुद की सुरक्षा के लिए रात-रात भर निगरानी कर रहे हैं.”

मंगलवार की रात दिल्ली पुलिस ने इलाके में धारा 144 लगा दी है. दिल्ली पुलिस ने दंगाइयों को मौके पर देखते ही गोली मारने का आदेश भी जारी कर दिया है. सामाचार एजेंसी एएनआई को पूर्वी दिल्ली के डीसीपी ने बताया कि इलाकों में पूरी तरह से पुलिस तैनात है. स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिशें जारी हैं.

लेकिन इलाके के लोग लगातार पुलिस पर सवाल खड़े कर रहे हैं. उनका कहना है कि पुलिस ये सब इतने देर से क्यों कर रही है? यही काम तीन दिन पहले से क्यों नहीं हो सकता था?

जाफराबाद में रहने वाली नगमा बताती हैं, “हम सब लोग घर में कैद हो गए हैं. जाफराबाद और मौजपुर से शुरू हुई ये हिंसा धीरे-धीरे गोकलपुरी, यमुना विहार, नूर-ए-इलाही और भजनपुरा तक पहुंच गई”.

वे बताती हैं कि भीड़ नारे लगा रही थी “मोदी जी तुम लठ्ठ बजाओ हम तुम्हारे साथ हैं.” दोनों तरफ के लोग उग्र हो चुके थे. कोई किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था. इलाके में डर को माहौल बना दिया गया है जो हिंदू और मुसलमान दोनों के दिल में बैठ गया है. राजनीतिक लोगों ने इसमें सामन्य घरों के बच्चों को फंसा दिया.

वो कहती हैं, “कई ऐसे लोग थे जिनका एंटी सीएए-प्रोटेस्ट से कोई संबंध नहीं था. वो न ही प्रोटेस्ट के समर्थन में थे और न ही विरोध में. लेकिन हिंसा भड़कने के बाद वहां मौजूद सीएए के समर्थक हिजाब या बुर्के में जा रही महिलाओं को रोक कर उनके साथ बदत्तमीजी कर रहे थे. कोई भी आदमी जिसकी दाढ़ी है उसे रोककर उसके साथ मारपीट कर रहे थे. कुल मिलाकर मामला अब सीएए के विरोध प्रदर्शन से अलग हिंदू-मुसलमान का हो गया था. शायद यही कपिल मिश्रा जैसे लोग चाहते थे”.

नगमा कहती हैं, “बच्चों के बोर्ड की परीक्षा है, वो ऐसे माहौल में कैसे पढ़ेंगे? परीक्षा देने के लिए कैसे घरों से बाहर निकलेंगे?”

क्या कर रही थी दिल्ली पुलिस?

सुभाष विहार के इलाके में रहने वाले ज़फर सबसे बड़ा जिम्मेदार पुलिस प्रशासन को मानते हैं. उनका कहना है कि इतना सब कुछ नुकसान हो जाने के बाद पुलिस एक्शन में आई है. ऐसा क्यों हुआ? ये सब पहले क्यों नहीं हो सकता था? जब बीते दो दिनों से हालात बदतर हो चुके थे. लोगों की दुकानें जलायी जा रही थीं. घरों मे पेट्रोल बम फेंके जा रहे थे. लोग खुद की सुरक्षा खुद से करने को मजबूर थे. तब जवानों की ये टुकड़ी क्यों नहीं भेजी गई? प्रशासन किस चीज का इंतजार कर रहा था. क्या प्रशासन खुद ऐसा चाहता था कि दंगे हों?

शिव विहार में रहने वाले राजन मंगलवार के दिन का मंज़र बताते हैं, “एक अजीब तरह का डर है जो मन में बस गया है. मरने का डर तो अब खत्म हो गया है लेकिन हालात बहुत बुरे हैं. घर में खाने का सामान नहीं है. मां बीमार रहती हैं. इस बीच कभी बीमार हो जाए तो अस्पताल भी नहीं ले जा सकते हैं. भरी-पूरी भीड़ आचानक से “देश में रहना है तो जय श्री राम कहना है”, “देश के गद्दारों को गोली मारों स*** को” ऐसे नारे लगाते हुए आती है और अचानक से नाम पूछने लगती है. नाम उनके मन मुताबिक न होने पर किसी के भी घर में पेट्रोल की बोतलें फेंक देते हैं. किसी की भी दुकान जला देते हैं.

राजन इस हालात पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहते हैं, “अभी तो फोर्स है, धारा 144 है इसलिए माहौल थोड़ा शांत है. लेकिन फोर्स कब तक रहेगी? लोगों के मन में जो जहर भर गया है, उसका क्या इलाज है? कैसे उम्मीद की जाए कि फोर्स के जाते ही सब कुछ दोबारा शुरू नहीं हो जाएगा?”

कौन कर रहा है हिंसा?

भजनपुरा में रहने वाले प्रवीण कहते हैं कि आपका नाम चाहे परवेज हो या फिर प्रवीण, ऐसी स्थिति में हिंसा के शिकार आप दोनों ही होंगे. ये दंगा न हिंदुओं का है और न ही मुसलमानों का। ये दंगा सिर्फ दंगाइयों का है. कपिल मिश्रा जैसे दंगाइयों का, जो हिंसा भड़का कर धीरे से उससे अलग हो जाते हैं. प्रवीण कहते हैं कि 24-25 साल के अपने जीवन में वो कभी भी इतने दहशत के माहौल में नहीं रहे हैं.

वे बताते हैं कि सोमवार को ऑफिस जाने के लिए करीब दो बजे वे अपने घर से बाहर निकले. माहौल खराब था इसलिए उन्हें कोई साधन नहीं मिला. वो पैदल ही घर से थोड़ी दूरी पर मौजूद पुश्ते के रोड की ओर आगे बढ़ने लगे. इसी बीच आचानक से पत्थरबाजी करती उग्र भीड़ डंडे और रॉड के साथ उनकी ओर बढ़ने लगी. ये देखते ही वो एक दुकान में घुस गए. थोड़ी देर बाद मामला जब शांत हुआ तो वो बाहर निकले और वापस अपने घर की ओर जाने लगे. उन्हें माहौल खराब होने का अंदाजा तो था लेकिन माहौल इस कदर खराब है इससे वे अनजान थे.

इस बीच लगातार ऑफिस से उन्हें फोन आ रहा था. माहौल खराब है ऐसा बॉस को बताने के लिए उन्होंने उस जगह की फोटो ली और आगे बढ़ गए. तभी भीड़ से एक लड़के ने आवाज़ दी- उस काले जैकेट वाले को पकड़ो. प्रवीण ने उस दिन काली जैकेट पहनी हुई थी. उन्हें रोककर उनका नाम पूछा गया. फोन से फोटो डिलीट कराई गई. भीड़ ने उनका कॉलर पकड़ा तभी उनका जनेऊ उनके हाथों में आ गया. यह देखते ही भीड़ ने कहा, “मारो… हिंदू है.”

बहुत मिन्नतों और फोन से सब कुछ डिलीट करने के बाद ही भीड़ ने उन्हें वहां से जाने दिया. प्रवीण कहते है कि ऐसा ही उनके कई मुसलमान दोस्तों के साथ भी हुआ. भीड़ ने ऐसा सुनते ही कि मुसलमान है, कहा, “मुसलमान है मारो.”

शेरपुर में रहने वाली अंजली ने बताया, “मैं बचपन से जिस दुकान से सामान लाती रही हूं, उस दुकान को जला दिया गया. उग्र भीड़ ने दुकान को सिर्फ इसलिए आग के हवाले कर दिया क्योंकि दुकान एक मुसलमान की थी”.

शेरपुर से लेकर भजनपुरा तक की ऐसे ही लगभग सारी दुकानें जला दी गई हैं. अंजलि पुलिस और प्रशासन के रवैये से बहुत नाखुश और दुखी हैं. वे बताती हैं कि पुलिस दंगाइयों के साथ कुछ भी नहीं कर रही थी बल्कि उनके साथ खड़े होकर दुकानें जलवा रही थी. दंगाइयों ने भजनपुरा की मज़ार में भी आग लगा दी.

वे आगे बताती हैं कि भीड़ जय श्रीराम के नारे के साथ जब गलियों में घुस रही थी तो कुछ लोग घर के अंदर से ही उनके साथ नारे लगा रहे थे. अंजलि कहती हैं कि ये सब उन्हें मानसिक रूप से बहुत परेशान कर रहा है. उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि ये सब कब खत्म होगा. क्यों लोग एक-दूसरे को मारना चाहते हैं? देश के गृहमंत्री क्या कर रहे थे? दिल्ली के सुरक्षा की जिम्मेदारी उनकी है.


(इस रिपोर्ट में लोगों की सुरक्षा का ख्याल रखते हुए उनकी सहमति से कुछ नाम बदल दिए गए हैं)               


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