डीज़ल पहली बार पेट्रोल से महँगा, लगातार 18वें दिन बढ़े दाम

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मोदी सरकार ने वाक़ई इतिहास रच दिया। देश में पहली बार ऐसा हुआ कि डीज़ल की कीमत पेट्रोल से ज्यादा हो गयी हैं। कोरोना संकट के बीच पैसे-पैसे को मोहताज हो रही जनता को रिकार्ड झटका देते हुए लगातार 18वें दिन तेल की कीमत बढ़ाई गयी है। पेट्रोल बीते 18 दिनों में 8.50 रुपये महंगा हुआ जबकि डीज़ल में 10.48 रुपये की बढ़ोतरी हुई।

दिल्ली में डीज़ल प्रति लीटर 79.88 रुपये बिक रहा है जबकि पेट्रोल की कीमत कल के ही बराबर है, यानी 79.66 रुपये प्रति लीटर।

आमतौर पर डीजल पर राज्य और केंद्र की तरफ से कम टैक्स लगता है। लेकिन डीरेग्युलेशन के बाद यह अंतर काफी कम होने लगा। वैसे दिल्ली के अलावा अन्य राज्यों में अभी भी डीज़ल की कीमत पेट्रोल से कम है, लेकिन दिल्ली में पेट्रोल पर 64 फीसदी और डीजल पर 63 फीसदी टैक्स लगता है। यानी लगभग बराबर टैक्स इसलिए कीमत का अंतर भी लगभग खत्म हो गया है।

कोरोना काल में आर्थक स्रोतों के सूखते जाने से परेशान दिल्ली सरकार ने 4 मई को डीज़ल पर लगने वाला वैट 16.75 फीसदी से बढ़ाकर 30 फीसदी कर दिया जिसके बाद मुंबई से ज्यादा डीजल की कीमत दिल्ली में हो गयी। पेट्रोल पर वैट पहले 27 फीसदी था उसे बढ़ाकर अब 30 फीसदी कर दिया गया है। उधर, 5 मई को केंद्र सरकार ने भी पेट्रोल पर विशेष उत्पाद शुल्क के रूप में दस रुपये और डीज़ल पर 13 रुपये प्रति लीटर की भारी वृद्धि की।

दिल्ली में अब पेट्रोल 79.76 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल 79.88 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है। उसी तरह मुंबई में पेट्रोल 86.54 रुपये और डीजल 78.22 रुपये, चैन्नई में पेट्रोल में 83.04 रुपये और डीजल 77.17 रुपये, कोलकाता में पेट्रोल 81.45 रुपये प्रति लीटर और डीजल 77.06 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है।

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में क्रूड आयल की कीमत में नरमी बनी हुई है। कच्चे तेल की कीमत 40 डॉलर रुपये प्रति बैरल के आसपास है। इसे देखते हुए कीमतें काफी कम होनी चाहिए लेकिन सरकारों ने इस पर टैक्स लगाकर ख़ज़ाना भर रही हैं।

2014 से 2016 के बीच कच्चे तेल के दाम तेजी से गिरे थे। लेकिन केंद्र सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में भारी इजाफा किया। नवंबर 2014 से जनवरी 2016 के बीच 9 बार एक्साइज़ ड्यूटी बढ़ाई गयी। ऐसा करके 2014-2015 के बीच सरकार ने दस लाख करोड़ रुपये कमाये। राज्य सराकरों ने भी वैट बढ़ाकर ख़ज़ाना भरा। 2014-2015 में वैट के रुप 1.3 लाख करोड़ मिले तो 2017-2018 में 1.8 लाख करोड़ रुपये हो गया।
केंद्र और राज्य सराकरें टैक्स के रूप में एक लीटर तेल पर 50 रुपये के करीब वसूल लेती हैं। बेस प्राइस तो 19 रुपये के आसपास है।

सरकार के आलोचकों का कहना है कि मनमोहन सरकार के समय कच्चे तेल की कीमत 130 डालर के आस पास प्रति बैरल थी, तब भी पेट्रोल 71 रुपये बिक रहा था तो 40 डॉलर प्रति बैरल के समय तो इसे काफी कम होना चाहिए। लेकिन केंद्र सरकार साफ कहती है कि कीमतों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है, इसका फैसला कंपनियां करती हैं। लेकिन सब जानते हैं कि चुनाव के आस पास कैसे कंपनियां तेल के दाम बढ़ाना रोक देती हैं और मतदान खत्म होने के बाद ही दाम बढ़ा देती हैं। सरकारी तेल कंपनियां सरकार का अच्छा बुरा खूब समझती हैं।

सरकार के इस रिकॉर्ड तोड़ काम पर ताली नहीं, सर ही पीटा जा सकता है।



 


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