आसनसोल में संजीव अमृत महोत्सव: संजीव महाश्वेता देवी की धारा को हिन्दी में ले आए- रणेंद्र


कथाकार रणेंद्र ने संजीव के उपन्यासों में आदिवासी जीवन के संदर्भ में बोलते हुए कहा कि आदिवासियों के प्रति दया-करुणा और उद्धार भाव की दृष्टि से पहले हिन्दी में रचनाएँ लिखी गयी थीं। लेकिन हमें समझना होगा कि आदिवासियों की वंचना की वजह क्या है? किस तरह उन्हें उनके जीने के साधनों से वंचित किया गया, कैसे उपनिवेशवादी ताक़तों ने उनके ज्ञान-दर्शन की समृद्ध परंपरा, संस्कृति आदि को हेय बताया, यह सब जानना ज़रूरी है। महाभारत और रामायण जैसे हमारे पुराने साहित्य में भी उन्हें दैत्य और दानव बताया गया। उनके दानवीकरण की प्रक्रिया आज भी जारी है।


सुधीर सुमन सुधीर सुमन
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आसनसोल में संजीव अमृत महोत्सव के दूसरे दिन 8 अगस्त को संजीव के कथा-साहित्य के महत्त्व पर केंद्रित दो सत्रों- ‘बदलता हुआ भारत और संजीव का कथा-संसार’ तथा ‘भारतीय कथा साहित्य में संजीव की उपस्थिति’ में गंभीर विचार-विमर्श हुआ। अंतिम सत्र में छात्रों ने संजीव से उनकी कहानियों और उपन्यासों से संबंधित कई सवाल पूछे।

पहले सत्र में अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक रविभूषण ने जोश मलीहाबादी के एक शेर से अपने वक्तव्य की शुरुआत की- इन्सान एक रात में हैवान हो गये/ जितने नमकहराम थे कप्तान हो गए। उन्होंने कहा कि संजीव के रचना-संसार पर बातचीत करते हुए हमें 1965 से 70 के समय को ध्यान में रखना होगा, जब संजीव का रचना-मानस बन रहा था। उनकी पहली कहानी के प्रकाशन के समय से यदि हम बदलते हुए भारत पर विचार करें तो हमें देखना होगा कि इस दौर में यहाँ राजनीति और आर्थिकी ने किस तरह की संस्कृति का विकास किया है। सत्तर के दशक से पूरी दुनिया में यहाँ तक कि चीन में भी पूँजीवाद का प्रभाव बढ़ रहा था। भारत में आर्थिक उदारीकरण कुछ देर से 1991 में आया, पर उसकी प्रक्रियाएँ अस्सी के दशक में शुरू हो चुकी थीं। राजनीति की दृष्टि से सत्तर का दशक खौलता हुआ दशक था। लेकिन इसी में जेपी मुख्य भूमिका में आ गए थे, उनके साथ सिर्फ़ छात्र-युवा वाहिनी के लोग ही नहीं थे, बल्कि एभीवीपी के लोग भी थे। पहले जनसंघ था, पर 1980 में भाजपा बनी, जिसके सीटों की संख्या क्रमशः बढ़ती गयी। भाजपा को इस रूप में लाने वाला गढ़ हिन्दी प्रदेश है, इसलिए हिन्दी के लेखकों, कवियों, विचारकों आदि की ज़िम्मेवारी आज पहले से कहीं अधिक है, कि वे इस ख़तरनाक रूप से बदल चुके, डार्क इंडिया में तब्दील हो चुके भारत को ब्राइट इंडिया में बदलने के लिए संघर्ष करें।

रविभूषण ने कहा कि आज का जो बदला हुआ भारत है, वहाँ नौ महीने से किसान आंदोलन कर रहे हैं, पैगासस जैसा मामला सामने है, पर सरकार किसी की नहीं सुन रही है। इस देश में संसद और संविधान है, पर सरकार किसी की नहीं सुन रही है। बेशक संसद के भीतर विरोधी बोल रहे हैं, पर बाहर जो बोल रहे हैं, उन्हें यूपीए के तहत जेल में डाला जा रहा है। पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी काॅरपोरेट डेमोक्रेसी में तब्दील हो चुकी है। भारत सही अर्थों में लोकतांत्रिक देश नहीं रह गया है। लोकतंत्र के चारों स्तंभों का नंगापन हमारे सामने मौजूद है। दीपक मिश्रा, रंजन गोगोई, अरुण मिश्रा का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कार्यपालिका, विधायिका से तो पहले ही भरोसा उठ चुका था, अब न्यायपालिका का भी चेहरा वैसा ही हो चुका है।

उन्होंने कहा कि संजीव का कथा-संसार भारत के वास्तविक संसार से भिन्न नहीं हैं। संजीव हिन्दी क्षेत्र का अतिक्रमण करते हैं, दूसरी भाषाओं के क्षेत्रों में जाते हैं। इतिहासकारों ने अपने इतिहास लेखन में जिन समुदायों को राष्ट्रीय फलक पर आने नहीं दिया है, उसे भी राष्ट्रीय फलक पर ले आते हैं। वे उस दुखी, पीड़ित, वंचित और शोषित वर्ग के कहानीकार हैं, जिन्हें राजनीति और आर्थिकी में छोड़ दिया गया है। संजीव केवल हिन्दी के ही कथाकार नहीं हैं, बल्कि महत्त्वपूर्ण भारतीय कथाकार हैं। देखना चाहिए कि उनके उपन्यास ‘सर्कस’ में ऐसे स्पष्ट संकेत हैं या नहीं कि यह पूरा देश ही सर्कस है! ‘सावधान! नीचे आग है’ अपने अंतर्वस्तु से निकलकर आज हमारे सामने तनकर खड़ा है। कहानियों और उपन्यासों का सिर्फ़ सामान्य और अकादमिक पाठ ही नहीं होना चाहिए। हमें देखना होगा कि ‘प्रत्यंचा’ पर चर्चा करते हुए किसी ने भीमा कोरेगांव की चर्चा की है क्या? संजीव ने कहा है कि धर्म और जाति प्रमुख प्रश्न है भारतीय समाज के, हमें देखना होगा कि धर्म और ब्राह्मणवाद को कौन कंट्रोल कर रहा है?

रविभूषण ने कहा कि संजीव के उपन्यास समाजशास्त्रीय अध्ययन की माँग करते हैं। अलग-अलग देखें तो संजीव के उपन्यास हमें खंडकाव्यों की तरह लगेंगे, लेकिन एक साथ देखने पर महसूस होगा कि ये सारे खंडकाव्य मिलकर एक महाकाव्य बनने के लिए प्रयत्नशील हैं। संजीव जैसे सजग लेखक से हमारी अपेक्षा यह है कि एक ऐसा उपन्यास लिखें जिसमें आज का पूरा समय, समाज और पूरा भारत आ जाए। वह राष्ट्रीय रूपक बन जाए।

कथाकार रणेंद्र ने संजीव के उपन्यासों में आदिवासी जीवन के संदर्भ में बोलते हुए कहा कि आदिवासियों के प्रति दया-करुणा और उद्धार भाव की दृष्टि से पहले हिन्दी में रचनाएँ लिखी गयी थीं। लेकिन हमें समझना होगा कि आदिवासियों की वंचना की वजह क्या है? किस तरह उन्हें उनके जीने के साधनों से वंचित किया गया, कैसे उपनिवेशवादी ताक़तों ने उनके ज्ञान-दर्शन की समृद्ध परंपरा, संस्कृति आदि को हेय बताया, यह सब जानना ज़रूरी है। महाभारत और रामायण जैसे हमारे पुराने साहित्य में भी उन्हें दैत्य और दानव बताया गया। उनके दानवीकरण की प्रक्रिया आज भी जारी है। ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासन से लेकर आज़ादी के बाद जो भूरे शासक आए- सबने उनको उनके ही संसाधनों से वंचित करने का काम किया। संजीव जिस पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते हैं, वहाँ बंधुआ मज़दूरों की जो पीड़ा है, वह उन्हें आदिवासियों से जोड़ती है। सारे मूलवासियों की पीड़ा एक है। दरअसल संजीव महाश्वेता देवी की धारा को हिन्दी साहित्य में ले आते हैं। ‘सावधान! नीचे आग है’, ‘धार’, ‘पाँव तले की दूब’ इस दृष्टि से उनके महत्त्वपूर्ण उपन्यास हैं।

चास नाला दुर्घटना पर आधारित संजीव के उपन्यास ‘सावधान! नीचे आग है’ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि 1928 की एक रिपोर्ट बताती है कि उस समय भी खानों में सुरक्षा के प्रावधानों का पालन नहीं किया जाता था। आदिवासियों की ज़मीनें अधिगृहीत की गईं, उन्हें खदानों में मज़दूरी का काम मिला, पर राष्ट्रीयकरण के बाद भारी पैमाने पर उन्हें मज़दूरी के अधिकार से भी वंचित कर दिया गया। आज कोल इंडिया का जो बजट है, उससे कई गुना अधिक काला धन अवैध खनन करने वाले माफियाओं के पास है। 1843 से अब तक यहाँ काले धन का साम्राज्य क़ायम है। ऐसे में ‘धार’ जैसे उपन्यास में संजीव सहकारी कोयला खदान को विषय बनाते हैं और मैना जैसी चरित्र के माध्यम से पूरी स्थिति का वर्णन करते हैं। सुवास कुमार ने सही ही कहा है कि मैना हिंदी कथा साहित्य में धनिया और गदल से आगे की कड़ी है।

संजीव के मित्र और उनकी रचनाओं पर शोध करने वाले रविशंकर सिंह ने आलोचकों की इस राय से असहमति जताई कि संजीव की कहानियों में प्रेम नहीं है। उन्होंने कई कहानियों का उदाहरण देते हुए कहा कि संजीव की कहानियों में एक विशिष्ट क़िस्म का प्रेम है, उसे समझने की ज़रूरत है। वह ज़्यादा संवेदनशील, मानवीय और सामाजिक है। उन्होंने कहा कि संजीव जिस अंचल पर कहानी लिखते हैं उसकी भाषा को भी कहानी में ले आते हैं। उन्होंने संजीव की कही गई बात को ही उदाहरण बनाते हुए कहा कि संजीव चील की पीठ पर बैठी हुई चिड़िया के समान हैं।

प्रतिमा प्रसाद ने उपन्यास ‘सर्कस’ की झरना तथा जस्सी बहु, कठपुतली, प्याज के छिलके आदि कहानियों की चर्चा करते हुए स्त्रियों के प्रति उनकी संवेदना को विशेष तौर पर रेखांकित किया। उनके अनुसार संजीव मजदूर-किसान, आदिवासी, स्त्री और पीड़ित मनुष्यों के दुखों को आत्मसात करके उसे अभिव्यक्त करते हैं।

रामजी सिंह यादव ने कहा कि ‘रह गईं दिशाएँ इसी पार’ उनका अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपन्यास है, लेकिन उसकी चर्चा बहुत कम हुई। हिन्दी का पाठक राजनीतिक रूप से पिछड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि भारत बहुत दिनों से बदल रहा है। 1947 में जो आजादी मिली, वह सिर्फ़ झंडे का बदलना था, व्यवस्था सामंतवादी ही थी, जिसके साथ पूँजीवाद का गठजोड़ हुआ और विशिष्ट क़िस्म के भारतीय पूंजीवाद का विकास हुआ। जिस व्यवस्था के ख़िलाफ़ नक्सलबाड़ी विस्फोट हुआ। कथाकार संजीव उसी नक्सलवादी विस्फोट की पैदाइश हैं। वे व्यवस्था के ख़िला विद्रोह करते हैं।

शायर और कहानीकार सेराज खान बातिश ने कहा कि विगत दस वर्षों के भीतर जो बदलाव आया है, उसने सब कुछ को तहस-नहस कर दिया है। जो मित्र थे, वे शत्रु बन चुके हैं। खान-पान, वेश-भूषा को लेकर जहर फैलाया जा रहा है। साज़िशन हिन्दू-मुस्लिमों के बीच नफरत फैलाया जा रहा है। क़ौमी एकता पर डंडे बरस रहे हैं। ‘प्रार्थना’ जैसी कहानी के ज़रिये संजीव इन साज़िशों और जहर के असर को तोड़ने की कोशिश करते हैं।

इस सत्र के संचालक सुधीर सुमन ने कहा कि संजीव हिंदुत्व की राजनीति और कॉपोरेट के गठजोड़ को चित्रित करने वाले कहानीकार हैं, जिस गठजोड़ ने हर स्तर पर हमारे समाज और देश को तहस-नहस कर दिया है। आज के बदले हुए भारत में जहाँ प्रतिक्रियावादी ताक़तें झूठे इतिहास को फैला रही हैं, मिथक को यथार्थ बनाने पर आमादा है, वहाँ संजीव ने इतिहास से ही वास्तविक चरित्रों को उठाकर उन्हें मुकाबले का हथियार बनाकर प्रस्तुत किया है, वे प्रतिमिथकों के ज़रिए वर्णवादी-सामंती मिथकीय चरित्रों का प्रतिकार करते हैं। उनकी ख़ासियत यह भी है कि नकारात्मक और ख़तरनाक रूप में बदल चुके भारत में अपने जनतांत्रिक-संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने या उसकी आकांक्षा रखने वाली ताक़तों को परस्पर जोड़ने की भी सचेत कोशिश करते हैं। वे साहित्यकार के विचार और कर्म के रिश्ते की फ़िक्र करते हैं। उनकी यह आकांक्षा है कि विचार कर्म में बदलें, ताकि समाज और देश को बेहतर बनाया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि संजीव के कथा-साहित्य को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाना आवश्यक है।

दूसरे सत्र की शुरुआत करते हुए एकता मंडल ने कहा कि संजीव यह जोर देकर कहते हैं कि नक्सली अपराधी नहीं हैं। लोकतंत्र में साधारण नागरिक हथियार को अंतिम उपाय मानता है। ‘अपराध’ कहानी के हवाले से उनका कहना था कि पूरा तंत्र साइकिल के स्कोप की तरह है, जो केंद्रीय धुरी से जुड़ा हुआ है। एकता ने उनकी कहानी ‘लिटरेचर’ की प्रासंगिकता पर भी विचार किया।

जमशेद अहमद का कहना था कि संजीव इंसान को इंसान के रूप में देखना चाहते हैं। उनकी कहानी का पात्र अब्बास जब पाकिस्तान चला जाता है तो यहाँ वैसा ही सूनापन महसूस किया जाता है, जैसा राम के अयोध्या से वन जाने के बाद महसूस किया गया होगा। उन्होंने कहा कि साहित्य से दूरी समाज के लिए ठीक नहीं है। हमें रोज़ाना साहित्य पढ़ना चाहिए।

रीता सिन्हा ने कहा कि सामंतवाद-ब्राह्मणवाद केवल सरकार में नहीं, हमारे भीतर भी है। संजीव के कथा साहित्य को समझने के लिए समाजशास्त्रीय वैचारिकी ज़रूरी है। उनकी दृष्टि आलोचनात्मक है तथा विश्लेषण मनोवैज्ञानिक और सामाजिक है। उनका साहित्य भविष्य की स्थितियों को समझने का प्रयत्न है।

सुधीर सुमन ने कहा कि भारतीय कथा साहित्य में संजीव की उपस्थिति एक ऐसे कथाकार के रूप में रही है, जिसने समाज में जनतांत्रिक चेतना के विकास और अंधविश्वास और अवैज्ञानिक धारणाओं के उन्मूलन को ध्यान में रखकर अपनी रचनाएँ लिखी हैं। वे एक ऐसे जनवादी कथाकार हैं, जिन्होंने जनवादी कहानी को विषय के स्तर पर तो व्यापक बनाया ही है, हर तरह के शिल्प का भी सहारा लिया है। उनमें पूर्ववर्ती कहानीकारों की साकारात्मक प्रवृत्तियाँ मिलेंगी, पर वे किसी की परंपरा का पूरी तरह अनुसरण नहीं करते। निरंतर शोध और यथार्थ अन्वेषण के आधार पर सचेत सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक उद्देश्यों के साथ कथा-साहित्य रचने वाले संजीव शायद भारतीय साहित्यकारों के बीच अपने किस्म के अनूठे कथाकार हैं। उनकी कहानियों में मध्यवर्ग की जो आलोचना और आत्मालोचना है, वह मुक्तिबोध की याद दिलाती है। वे बाज़ार के आगे समर्पण न करने वाले चरित्रों का उपहास नहीं उड़ाते, बल्कि उनकी आत्मग्लानि को चित्रित करते हैं। स्त्रियों, आदिवासियों, दलितों और हर समुदाय के गरीब-मेहनतकशों के प्रति सच्ची संवेदना रखने वाले वे विरल भारतीय कथाकार हैं।

सत्र की अध्यक्षता करते हुए कथाकार मनमोहन पाठक ने कहा कि संजीव और उनके जन्म का वर्ष 1947 ही है। दोनों की कथा लेखन का उद्देश्य भी समान है। संजीव भारत के महत्वपूर्ण कथाकार हैं। उनका स्वस्थ और सक्रिय रहना भारतीय कथा साहित्य के भविष्य के लिए ज़रूरी है। सत्र का संचालन कहानीकार सृंजय ने किया।

अंतिम सत्र में पार्वती कुमारी, अमन, मीरा पासवान, अमित साव, संजय, प्रीति सिंह, सत्यम आदि छात्र-छात्राओं के प्रश्नों का उत्तर देते हुए संजीव ने कहा कि उन्होंने पूरे हिन्दुस्तान का भ्रमण किया है, पर ऐसी प्रतिभाएँ कम जगहों पर देखी हैं। उन्होंने कहा कि वर्ग, वर्ण और लिंग के स्तर पर जो विषमताएँ हैं, वे न रहें, बल्कि समानता हो यह उनकी रचनाओं का उद्देश्य रहा है। कहानी लेखन की कला के विषय में समझाते हुए उन्होंने कहा कि जैसे ही कोई किसी घटना का वर्णन करना आरंभ करता है, वहीं से कहानी की शुरुआत हो जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि कहानी केवल संवेदना जगाने के लिए ही नहीं लिखी जाती, बल्कि विडंबनाओं को दर्शाने के लिए भी लिखी जाती है। उन्होंने कहा कि सिद्धांतों के साथ-साथ यथार्थ को भी देखने की ज़रूरत है। विदर्भ में उन्होंने देखा कि किसानों की हालत मज़दूरों से ज़्यादा ख़राब थी। जो मनमोहनी गाय किसानों की सहायता के लिए दी गयी थी, वह उनके गले की हड्डी बन गयी थी। ‘घर चलो दुलारीबाई’ के संदर्भ में एक सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि हर आदमी को जीवित रहने का सबूत देना पड़ता है। ‘प्रार्थना’ कहानी के संदर्भ में उन्होंने कहा कि यथार्थ को कई तरीक़ों से देखना पड़ता है। विज्ञान का विद्यार्थी रहने के कारण भी उन्हें यह जरूरी लगता रहा है।

अंत में इस आयोजन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले कहानीकार शिव कुमार यादव ने धन्यवाद ज्ञापन किया। हिन्दी अकादमी की अध्यक्ष उमा सर्राफ, कवि निशांत, बजरंग बली कहार, रोहित प्रसाद पथिक, मनोहर भाई पटेल आदि ने इस आयोजन को सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 


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