‘एक ख़ंजर पानी में’: महामारी की ट्रैजडी के ज़रिये उर्दू अदब को नया नज़रिया देने वाला उपन्यास!


“प्रो. खालिद जावेद जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के ब्रांड एंबेसडर हैं। अपने बेमिसाल अफसानों से न सिर्फ उर्दू बल्कि दूसरी जुबान के लोगों का ध्यान खींचने वाले खालिद का उपन्यास, ‘एक खंजर पानी में’ उर्दू अदब में एक नया नज़रिया पैदा करता है। उनका बयानिया उन्हें दूसरे अफ़सानानिगारों से अलग करता है”- जामिया मिलिया इस्लामिया के डीन प्रो. मुहम्मद असदुद्दीन ने जामिया मिलिया के उर्दू विभाग की तरफ से आयोजित कान्फ्रेंस में यह बात कही। वे जाने-माने लेखक खालिद जावेद के नये उपन्यास ‘एक खंजर पानी में’ पर अपना अध्यक्षीय वक्तव्य दे रहे थे। खालिद जावेद का उपन्यास एक फंतासी के जरिए महामारी से पैदा हालात, ट्रैजेडी और तल्ख़ हक़ीकत को सामने लाता है।


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“प्रो. खालिद जावेद जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के ब्रांड एंबेसडर हैं। अपने बेमिसाल अफसानों से न सिर्फ उर्दू बल्कि दूसरी जुबान के लोगों का ध्यान खींचने वाले खालिद का उपन्यास, ‘एक खंजर पानी में’ उर्दू अदब में एक नया नज़रिया पैदा करता है। उनका बयानिया उन्हें दूसरे अफ़सानानिगारों से अलग करता है”- जामिया मिलिया इस्लामिया के डीन प्रो. मुहम्मद असदुद्दीन ने जामिया मिलिया के उर्दू विभाग की तरफ से आयोजित कान्फ्रेंस में यह बात कही। वे जाने-माने लेखक खालिद जावेद के नये उपन्यास ‘एक खंजर पानी में’ पर अपना अध्यक्षीय वक्तव्य दे रहे थे। खालिद जावेद का उपन्यास एक फंतासी के जरिए महामारी से पैदा हालात, ट्रैजेडी और तल्ख़ हक़ीकत को सामने लाता है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. शफी किदवई ने कहा कि प्रो. खालिद जावेद ने एक ऐसे विषय पर उपन्यास लिखा है, जिस विषय में पुरानी परिपाटी को तोड़ पाना या कोई नया रास्ता खोजना मुश्किल था, क्योंकि इससे पहले उर्दू में प्लेग को कुदरत के कहर की तरह दिखाया गया है और कहा गया है कि ये सज़ा खुदा इनसान को उसकी गलतियों की वजह से देता है। लेकिन खालिद जावेद ने इससे बचते हुए महामारी को एक अस्तित्ववादी सवाल की तरह देखा और उसे बहस में बदल दिया है। प्रो. किदवई ने इस बात पर जोर दिया कि उपन्यास को गहरे अस्तित्ववादी अनुभव के रूप में देखा जाना चाsहिए।

“मैं इस उपन्यास को राजनीतिक नज़रिये से देखती हूँ” -प्रोफेसर सोनिया सुरभि गुप्ता ने कहा, जो कई भाषाओं में पारंगत हैं और विश्वविद्यालय के स्पेनिश और लैटिन अमेरिकी केंद्र में व्याख्याता हैं। उन्होंने कहा, “पानी में वायरस के फैलने की वजह से पैदा हालात दरअसल मौजूदा नागरिकता संशोधन अधिनियम और एनआरपी के परिणामस्वरूप में एक खास धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग को टारगेट किए जाने की याद दिलाता है। प्रो. सोनिया सुरभि गुप्ता ने गहरी राजनीतिक चेतना और राजनीतिक संवेदनशीलता के संदर्भ में इस उपन्यास की व्याख्या करने का प्रयास किया। विभागाध्यक्ष प्रो. शहजाद अंजुम ने कहा कि खालिद जावेद जैसे प्रख्यात कथाकार किसी भी संस्थान के लिए एक उपलब्धि हैं। हमें उन्हें अपने सहयोगी के रूप में पाकर गर्व का अनुभव हो रहा है।

प्रो. खालिद जावेद ने इस मौके पर अपने उपन्यास के एक हिस्से को पढ़ा। स्त्रीवादी आलोचक, उर्दू व्याख्याता और दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नजमा रहमानी ने खालिद जावेद के उपन्यासों की खूबियों पर रोशनी डालते हुए कहा कि जिस तरह से वह जिंदगी और क़ायनात के सियाह हिस्सों को आत्मसात करते हुए उसे अपने अनूठी शैली के साथ प्रस्तुत करते हैं, इसका तालमेल अद्भुत है। वे बेहद जटिल और सघन लिखते हैं। उनके उपन्यास और कहानियां सामान्य चलन को तोड़ते हैं। वे सुंदरता और रोमांस के सतही समझ और बोध पर प्रहार करते हैं। वे मनुष्य और जीवन की पेचीदगियों, कुरूपता, बीमारी और गंदगी को प्रस्तुत करते हैं। उनकी कल्पनाएं कभी-कभी समझ से बाहर होती है, मगर हमें अपनी तरफ खींचती भी हैं। उपन्यास में नए नैरेटिव पर टिप्पणी करते हुए, प्रसिद्ध हिंदी लेखक और हिंदी विभाग के आलोचक और व्याख्याता, जामिया मिलिया इस्लामिया, प्रो नीरज कुमार ने कहा कि खालिद जावेद का यह उपन्यास उत्तर-प्रामाणिक युग से उत्पन्न जीवन की जटिलताओं को प्रस्तुत करता है। मनुष्य जिस तरह अस्तित्व के स्तर पर उलझा हुआ है, उसे खालिद सभी संभावनाओं के साथ उपन्यास के विषय में बदल देते हैं।

जाने-माने अनुवादक और अंग्रेजी और उर्दू के कवि डॉ. अब्दुल नसीब खान ने कहा कि इस उपन्यास को बिना संकोच दुनिया भर में महामारियों पर लिख गए सर्वश्रेष्ठ साहित्य के साथ रखा जा सकता है। खालिद जावेद ने मौजूदा दौर के दैत्यों, महामारी के भय, इंसानी तकलीफ़, बीमारी की व्यापकता और लोगों की दुर्दशा को बहुत अलग शैली में चित्रित किया है। पूरा उपन्यास एक मजबूर चुप्पी, कयामत और सामाजिक गतिरोध को दर्शाता है। प्रसिद्ध आलोचक और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के उर्दू विभाग में व्याख्याता डॉ. सरवर-उल-हुदा ने कहा कि खालिद जावेद अपने स्टेटमेंट में जहां खड़े होते हैं, उनके आसपास कोई समकालीन नहीं नजर आता है। इस उपन्यास में पाठक कई जगहों से गुजरता है जहाँ उसे लगता है कि यह उपन्यास कुछ अलग तरह से खत्म होगा। खालिद के कथानक की अवधारणा पारंपरिक अवधारणा से भिन्न है, जो औसत पाठक को परेशान भी कर सकती है।

जामिया मिलिया इस्लामिया के उर्दू विभाग के व्याख्याता तथा जाने-माने साहित्यकार डॉ खालिद मुबाशीर ने कहा कि खालिद जावेद मुख्य रूप से एक अस्तित्ववादी कथा लेखक हैं। इन उपन्यास में मौजूद आतंकवाद, बीमारी, गंदगी, पीला वातावरण, मानव क्रूरता और गंभीर अस्तित्व की पीड़ा जिसके साथ मृत्यु पैदा होती है, को महज़ नकारात्मक माना जाना सही नहीं है। क्योंकि सभी धर्मों और दर्शन में, जीवन और ब्रह्मांड का एक समान मूल्य है। उन्होंने कहा कि खालिद जावेद के बयान में ब्लैक ह्यूमर बहुत हावी है। इस मौके पर फरहत एहसास, अशर नजमी, प्रो. कौसर मज़हरी, डॉ. मुकेश कुमार मरुथा, रिज़वानुद्दीन फारूकी, डॉ. इमरान अहमद अंदलिब, डॉ. शाह आलम, डॉ. सैयद तनवीर हुसैन, डॉ.आदिल हयात, डॉ.जावेद हसन, डॉ.साकिब इमरान और डॉ.साजिद जकी मौजूद थे।


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