उल्टा प्रदेश : लाश विकास दुबे की गिरी, धज्जियाँ संविधान की उड़ीं!

पंकज श्रीवास्तव पंकज श्रीवास्तव
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तो’ मैं विकास दुबे, कानपुर वाला’ कहकर गुरुवार सुबह उज्जैन के महाकाल मंदिर में आत्मसमर्पण करने वाला विकास दुबे शुक्रवार को उसी कानपुर में मारा गया। उज्जैन से ट्रांज़िट रिमांड पर उसे उत्तर प्रदेश ला रही यूपी पुलिस का कहना है कि गाड़ी पलट गयी थी और मौके का फायदा उठाकर विकास दुबे पुलिस से हथियार छीनकर भागने लगा। गोलीबारी हुई। वह घायल हुआ। अस्पताल ले जाया गया। पता चला कि मर गया।

ये वो कहानी है जिसके पीछे किसी आततायी का भीषण अट्टहास है। इस कहानी को सही मानते हुए पुलिस, सरकार और न्यायपालिका के तमाम दस्तावेज़ रंगे जायेंगे, लेकिन सबको पता है कि यह सफेद झूठ है। जनता का बड़ा हिस्सा तो ख़ैर ताली बजा रहा है क्योंकि उसे पता नहीं है कि जिसे वह इंसाफ़ समझ रहा है वह उसकी हत्या का लाइसेंस है। लाश विकास दुबे की गिरी है, लेकिन चिथड़े संविधान के उड़े हैं जिसकी शपथ लेकर योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी। उनका अपराधियों को ठोंको सरीखे बयान इसी संविधान पर मुसलसल ज़ख़्म हैं।

अब कोई नहीं जान पायेगा कि 2 जुलाई की रात आख़िर हुआ क्या था और वह कौन सी वजह थी कि पुलिस आधी रात विकास दुबे को मारने पहुँची थी। जिस तरह थाने से कहकर बिकरू गाँव की लाइट कटवायी गयी, उसके बाद यह मानना फिज़ूल है कि वह कोई दबिश थी। यह पुलिस अपराधी गठजोड़ में आई किसी बड़ी दरार का नतीजा था और यह संयोग नहीं कि इस हमले की जानकारी पुलिस के ही एक अफसर विनय तिवारी ने विकास दुबे को दी थी जो अब सस्पेंड है।

इस संबंध में केरल के पूर्व पुलिस महानिदेशक और सी.आर.पी.एफ. एवं बी.एस.एफ. के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक रहे एन.सी. अस्थाना की टिप्पणी अहम है। उन्होंने कहा है कि आमतौर पर दुर्दांत अपराधी भी पुलिस की प्रतिक्रिया और प्रतिशोध के डर से पुलिसकर्मी की हत्या करने से बचते हैं। यदि दुबे ने आठ पुलिसकर्मियों को मार डाला तो मतलब यह है कि उसे पक्का विश्‍वास था कि पुलिस पार्टी उसे गिरफ्तार करने नहीं बल्कि एनकाउंटर के माध्यम से उसे खत्म करने को आ रही थी।

पुलिस के प्रति विकास दुबे का यह नज़रिया एक दिन में नहीं बना। उसने 2001 में जब राज्यमंत्री का दर्जा पाये संतोष शुक्ल की हत्या की थी तो पांच दारोगा और 20 सिपाही गवाह थे, लेकिन किसी ने उसके खिलाफ़ गवाही न दी। जाहिर है, यह सब किसी लफंगे के लिए कर पाना आसान नहीं हो सकता। इसमें पैसे, राजनीतिक संरक्षण से लेकर जाति संगठनों की पैरवी का खुला खेल हुआ। यह खेल ही उसे ‘माननीय पं.विकस दुबे’ में बदलता गया जिसके दम पर वह जेल में रहते हुए भी जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीता और उसके घर की महिलाएँ प्रधान बनीं। सपा, बसपा से लेकर बीजेपी तक के लिए वह चुनाव में एकमुश्त वोट डलवाने वाला एक एजेंट था जिन्होंने उसका अपने अच्छे दिनों में इस्तेमाल किया। 2017 में उसका वायरल वीडियो बताता है कि किस तरह बीजेपी विधायक और मंत्रियों का उसे संरक्षण प्राप्त था। विकास की मौत के साथ ये सारे राजनीतिज्ञ और भ्रष्ट पुलिसवाले चैन की सांस ले सकते हैं जिनके साथ विकास के ताल्लुकात जगज़ाहिर थे। इसी के साथ सरकारी धन की लूट का वह ‘विकास-तंत्र’ भी बेपर्दा होने से बच गया जो कानपुर में नेताओं, पुलिस और गुंडों-माफियाओं के दम पर चल रहा है। अब इस तंत्र को चलाने और गति देने के लिए किसी दूसरे लफंगें को माननीय बनाया जायेगा।

बहरहाल, असल मसला उत्तर प्रदेश के बर्बर प्रदेश बनने का है। विकास की मौत के पहले कुछ दिनों में उसके पांच करीबियों को पुलिस ने मार डाला। क्या ये सभी उस रात की घटना में शामिल थे इस नतीजे पर पुलिस बिना जांच के कैसे पहुँच गयी?  प्रेम प्रकाश (विकास दुबे का मामा), अतुल दुबे (विकास दुबे का भतीजा), अमर दुबे (विकास दुबे का राइड हैंड), प्रभात और प्रवीण उर्फ बउवा जिस तरह गोली से उड़ाये गये वह बताता है कि पुलिस या यूपी की सरकार इंसाफ़ नहीं बदले में यक़ीन रखती है और इस तरह खुद अपराधी बन जाती है। कभी जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला ने कहा था कि ‘पुलिस वर्दीधारी गुंडों का गिरोह है’, लेकिन अब इसमें इतना और जोड़ने की ज़रूरत है कि ‘सरकार इस गिरोह की सरगना है।’

जनता के बीच यह बोध जानबूझकर बैठाया गया है कि अपराधियों को तुरंत मुठभेड़ के नाम पर मार डालना ही असल इंसाफ़ है क्योंकि गवाही के अभाव में और लंबी अदालती प्रक्रिया की वजह से अपराधी बच निकलते हैं। समय आ गया है कि जनता भी पलट कर इन माननीयों से पूछे कि त्वरित कार्रवाई का तंत्र कौन विकसित करेगा? लोग गवाही देने से डरे नहीं, ऐसा भयमुक्त वातावरण बनाने की ज़िम्मेदारी किसकी है? अगर अदालतों में जज नहीं हैं तो उनकी नियुक्ति कौन करेगा? पुलिस में भर्ती क्यों नहीं बढ़ायी जाती ताकि पुलिसवालों को 24 घंटे की छद्म ड्यूटी न करनी पड़े और वे मानवीय बन सकें? क्या अपनी इसी असफलता को छिपाने के लिए सरकार ‘ठोंको- मारो’ अभियान चलाती है? और ये वो लोग ज़्यादा ही चलाते हैं जिन पर तमाम ऐसे आरोप और मुक़दमे थे कि कोई सिरफ़िरी सरकार उनका भी एन्काउंटर करवा सकती थी?

ये संयोग नहीं कि पुलिस रिफार्म के संबंध में की गयीं तमाम सिफारिशें ठंडे बस्ते में हैं क्योंकि अगर पुलिस कानून और संविधान के हिसाब से चलने लगी तो वह फिर वर्दीधारी गुंडों का गिरोह नहीं रह जायेगी जो किसी सरकार के इशारे पर हत्या करे। तब बदला नहीं ‘इंसाफ़’ की बात होगी। समाज को बर्बरता से निकालने की बात होगी जिसका पहला क़दम बर्बर सरकारों और नेताओं से हमेशा के लिए मुक्ति पाना होगा।

पुनश्च- विकास दुबे के महाकाल मंदिर में सरेंडर के बाद उसके परिजनों ने कहा कि भगवान महाकाल ने उसे बचा लिया। पर सत्ता जब काल बन जाये तो महाकाल का कवच काम नहीं आता, यह बात सबको समझनी चाहिए। महाकाल की अवधारणा को बल सत्ता इसलिए देती है ताकि लोग सत्ता उससे नहीं उससे बड़ी सत्ता से ही कृपा माँगें। जीवन की समस्याओं के लिए सरकार को नहीं अपनी किस्मत को कोसें। सत्ता जन्नत की हक़ीक़त को ख़ूब समझती है, आप कब समझेंगे।

 

लेखक मीडिया विजिल के संस्थापक संपादक हैं।