Home ओप-एड विकास दुबे के ‘एन्काउंटर’ ने बिगाड़ दिया यूपी का शक्ति संतुलन!

विकास दुबे के ‘एन्काउंटर’ ने बिगाड़ दिया यूपी का शक्ति संतुलन!

विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘ मकबूल ’ के दो करप्ट पुलिस अधिकारी आपस में बातचीत में अक्सर एक जुमले का इस्तेमाल करते हैं-‘ शक्ति का संतुलन बहुत जरूरी है संसार में। आग के लिए पानी का डर बने रहना चाहिए.  ‘ विकास दुबे के एनकाउंटर के साथ एक चैप्टर तो क्लोज हो गया है लेकिन दूसरे नए चैप्टर जरूर खुलेंगे. यूपी की राजनीति में ठाकुर-ब्राह्मण राजनीति से कौन नहीं परिचित होगा. इन दोनों जातियों के नेताओं में वर्चस्व का संघर्ष होता रहा है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो इसका एक राजनीतिक इतिहास है. राजनीतिक दल दोनों में ‘ शक्ति संतुलन ’ साधने की कोशिश करते हैं लेकिन अक्सर यह ‘ शक्ति संतुलन ’ गड़बड़ा जाता है.

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विकास दुबे के एनकाउंटर से कुछ चैप्टर बंद हुए तो कई खुल गए हैं

उज्जैन के महाकाल मंदिर में गिरफ्तारी कम सरेंडर के बाद ही कयास लगाया जा रहा था कि कुख्यात विकास दुबे का यूपी आने पर क्या होगा ? गुरूवार की शाम को फेसबुक व सोशल मीडिया पर तमाम लोगों ने लिखा कि आगे की कहानी यह हो सकती है कि विकास भागने की कोशिश में पुलिस मुठभेड़ में मारा जाए. ऐसा लिखने वालों में सीनियर आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर भी थे.

उन्होंने लिखा ‘विकास दूबे का सरेंडर हो गया. हो सकता है कल वह पुलिस कस्टडी से भागने की कोशिश करे, मारा जाये. इस तरह विकास दूबे चैप्टर क्लोज हो जायेगा, किन्तु मेरी निगाह में असल जरुरत इस कांड से सामने आई पुलिस के अन्दर की गंदगी को ईमानदारी से देखते हुए उस पर निष्पक्ष कठोर कार्यवाही करना है. यदि लीपापोती हुई तो परिणाम भयावह होंगे और शहीद पुलिसकर्मियों का बलिदान पूरी तरह व्यर्थ हो जायेगा. आज विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद उन्होंने फिर लिखा-आखिर क्या हड़बड़ी थी? किसे बचाया जा रहा है?

एक बड़े पुलिस अधिकारी के इस बात पर गौर किया जाना चाहिए लेकिन इसके बजाय एक एनकाउंटर जिस पर सवाल ही सवाल हैं, उसे ‘जायज़’ ठहराने की कोशिश ज्यादा हो रही है. यह कहा जा रहा है कि हमारी न्याय प्रणाली उसे आज तक सजा नहीं दे पायी तो आगे क्या गारंटी है कि उसका कुछ बिगड़ पाता. ऐसे में उसका एनकाउंटर ही ठीक है.

यह तर्क भी कितना अजीब है. एक तरफ विकास दुबे जैसे लोगों के बारे में हमें यह समझाया जा रहा है कि विकास दुबे जैसे लोग तो न्याय प्रणाली से बच निकलते हैं लेकिन इसी न्याय प्रणाली पर आम लोगों को पूरा विश्वास करने और कोई सवाल न उठाने को कहा जाता है.

जिन लोगों को लगता है कि विकास दुबे के मारे जाने से तीन दशक पुरानी एक कहानी का अंत हो गया, वे गलतफहमी में हैं. दरअसल कहानी का अब नया चैप्टर शुरू हुआ है. कहानी का यह नया चैप्टर अब धीरे-धीरे खुलेगा और यूपी के विधानसभा चुनाव में उसका असर देखा जाएगा.

आने वाले दिनों की कहानी अभी से कुछ समझनी हो तो राजस्थान के गैंगस्टर आनंद पाल सिंह के एनकाउंटर की कहानी को पढ़ लेना होगा. तीन वर्ष पहले आनंदपाल सिंह के मुठभेड़ में मारे जाने का समय कुछ ऐसा ही था जैसा आज यूपी का है. राजस्थान में चुनाव के दिन आ रहे थे. कुख्यात गैंगस्टर आनन्दपाल सिंह के सरेंडर का प्रयास हो रहा था लेकिन जून 2017 में उसे मुठभेड़ में मार दिया गया. आनन्दपाल के मुठभेड़ की सीबीआई जांच की मांग को लेकर उसके गांव में कई दिन तक धरना-प्रदर्शन हुआ और उसे ‘ श्रद्धाजंलि ’ देने के लिए लाखों की भीड़ जुट गई.  इस घटना को संभालना तत्कालीन वसुंधरा सरकार के लिए काफी मुश्किल होेने लगा.  जानने वाले बताते हैं कि आनन्द पाल सिंह के इनकाउंटर का भाजपा को कुछ इलाकों में खामियाजा भी उठाना पड़़ा.

आनंद पाल सिंह के गैंगस्टर बनने की कथा विकास दुबे के जीवन से काफी मिलती-जुलती है। बस कथा भूमि अलग-अलग है।

आनन्द पाल सिंह के जीवन और इनकाउंटर पर छह महीने पहले ‘रंगबाज फिर से’ नाम से एक वेब सिरीज बन चुकी है जिसमें आनन्दपाल सिंह की भूमिका प्रसिद्ध सिने अभिनेता जिम्मी शेरगिल ने निभायी है। इस वेबसिरीज को देखें तो  पता चलता है कि शुरू में कथित रूप से अपने खिलाफ हो रहे अन्याय का बदला लेने के लिए आनन्दपाल सिंह जरायम की दुनिया में कदम रखता है लेकिन बाद में वह राजनेताओ का मोहरा बनता जाता है। इस दौरान वह अपनी जाति का हीरो जरूर बन जाता है लेकिन उसकी बढ़ती महात्वाकांक्षा ही उसे एनकाउंटर के रास्ते पर पहुंचा देती है।

तो बड़ा सवाल यह है कि विकास दुबे के एनकाउंटर से कौन सा चैप्टर बंद हुआ और कौन सा चैप्टर खुला। ‘बिकरू गांव के विकास दुबे’ को ‘विकास दुबे कानपुर वाला ’ बनाने में जिस नेता-पुलिस-अपराधी तंत्र की भूमिका थी, उसको बेनकाब करने के अवसर को एक बार फिर बंद कर दिया गया. वर्ष 1990 में हत्या की पहली घटना से लेकर थाने में दर्जा प्राप्त मंत्री की हत्या और फिर अपने गांव में डिप्टी एसपी सहित आठ पुलिस कर्मियों की बर्बर हत्या करने वाला विकास दुबे कैसे जेल में होने के बजाय बाहर घूम रहा था? वह क्यों जिले के टाप टेन बदमाशों की सूची में भी नहीं था? उसकी पुलिस कर्मियों से मिलीभगत की रिपोर्ट करने वाले डिप्टी एसपी की चिट्ठी पर आखिर क्यों कोई कार्रवाई नहीं हुई? उसकी काली कमाई को मैनेज करने वाले शख्स की पहुंच बड़े ओहदेदारेां से लेकर राजनेताओं तक कैसे थी? उसके खिलाफ दर्ज मामले एक के बाद एक कैसे खत्म होते जा रहे थे ? एसटीएफ के सामने उसने जिन राजनेतओं से संरक्षण मिलने की बात कही थी, उस पर क्या कार्रवाई हुई ?

इस तरह के सवालों की सूची लम्बी है. बिकरू गांव में पुलिस कर्मियों की हत्या करने वाले विकास को कैसे सात दिन तक पुलिस ढूंढ नहीं पायी जबकि पूरे यूपी की पुलिस को उसे ढूंढने में लगा दिया गया था. उज्जैन में उसकी गिरफ्तारी क्या प्रयोजित थी और इसे आखिर किसने प्रायोजित किया ?

इन सवालों के मद्देनर विपक्षी नेताओं सहित कई जगहों से इस मामले में न्यायिक या सीबीआई जांच की मांग उठना जायज है लेकिन इन्हीं सवालों से सत्ता के साथ-साथ पूरा राजनीतिक तंत्र बचना चाहता है क्योंकि वह इसका ‘लाभार्थी’ है। इन सवालों के जवाब ‘ अपराध के राजनीतिकरण ’, ‘ राजनीति के अपराधीकरण ’, पुलिस सुधार, न्याय प्रणाली में सुधार तक पहुंचते हैं जिसके बारे में समय-समय पर गठित आयोगों व कमेटियों की रिपोर्ट्स दराजों में जतन से बंद कर दिए गए हैं.

ये सवाल बार-बार उठे हैं लेकिन उसका जवाब कभी नहीं मिलता है. यह बात तो अब पुलिस के आला अधिकारी के किताब से लेकर फिल्मों व वेबसिरीज में दर्ज हो गयी है कि माफिया डाॅन श्रीप्रकाश शुक्ला ने तत्कालीन मुख्यमंत्री को मारने की सुपारी ली थी लेकिन सुपारी किसने दी थी, इस सवाल पर सब चुप हैं. इसका जवाब कोई नहीं देना चाहता क्योंकि ‘तंत्र’ की भलाई इसी में है.

इसलिए जो लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं कि विकास दुबे से मध्य प्रदेश पुलिस की आठ घंटे की पूछताछ या उज्जैन से कानपुर के भौंती तक मुठभेड़ के पहले विकास दुबे ने जो कुछ बताया है, उससे कभी पर्दा उठेगा तो उन्हें यकीनन निराश होना पड़ेगा.

विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘ मकबूल ’ के दो करप्ट पुलिस अधिकारी आपस में बातचीत में अक्सर एक जुमले का इस्तेमाल करते हैं-‘ शक्ति का संतुलन बहुत जरूरी है संसार में। आग के लिए पानी का डर बने रहना चाहिए.  ‘

विकास दुबे के एनकाउंटर के साथ एक चैप्टर तो क्लोज हो गया है लेकिन दूसरे नए चैप्टर जरूर खुलेंगे. यूपी की राजनीति में ठाकुर-ब्राह्मण राजनीति से कौन नहीं परिचित होगा. इन दोनों जातियों के नेताओं में वर्चस्व का संघर्ष होता रहा है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो इसका एक राजनीतिक इतिहास है. राजनीतिक दल दोनों में ‘ शक्ति संतुलन ’ साधने की कोशिश करते हैं लेकिन अक्सर यह ‘ शक्ति संतुलन ’ गड़बड़ा जाता है.

विगत तीन वर्षों में यह शक्ति संतुलन साधने की कोशिश की गयी है. बीच-बीच में कई बार यह संतुलन गड़बड़ाया है. बिकरू गांव में आठ पुलिस कर्मियों की विकास दुबे द्वारा की गयी हत्या, उसके बाद विकास दुबे के कई सहयोगियों के मुठभेड़ में मारे जाने, विकास दुबे की उज्जैन में ‘ शांतिपूर्वक और सम्मानजनक ‘  गिरफ़्तारी और यूपी लाते समय कानपुर के पहले भौंती में एनकाउंटर में मारे जाने के घटनाक्रम में इस शक्ति संतुलन को बनाए रखने का प्रयास किया गया.

अब देखना होगा कि क्या वाकई शक्ति संतुलन सधा है कि बिगड़ा है लेकिन इतना तो निश्चित है कि इन घटनाओं का प्रभाव सिर्फ कानपुर तक सीमित नहीं रहने वाला है. यह यूपी पर राजस्थान के आनंदपाल सिंह एनकाउंटर की तरह प्रभाव डालेगा.



मनोज सिंह वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विजिल संपादक मंडल के सम्मानित सदस्य हैं.



 

2 COMMENTS

  1. पूंजी वादी व्यवस्था का पूंजीवादी न्याय इससे कम या ज्यादा कतई नहीं

  2. Govt khud nyay vyvastha pr visvas nhi karti, lekin vahi govt dusro ko swal uthane ka virodh karti h.

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