DU में शटडाउन: हक़ को भीख समझती है केजरीवाल सरकार,15 को सीएम आवास तक मार्च!

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‘जनवरी तक की सैलरी बैंक में चली गई है।’
‘अगस्त की बकाया राशि भी भेज दी गई है।’
‘मुझे तो ऐसा कई मेसेज नहीं मिला…?’
‘कैसे चेक करें?’
‘कालेज में सारे कर्मचारी खुश थे।’

यह कुछ व्हाट्सऐप संदेश हैं जो 12 मार्च 2021 की रात आठ साढ़े आठ बजे दिल्ली विश्वविद्यालय के बारह कालेजों के शिक्षकों के बीच घूम रहे थे. इन संदेशों में छुपी ख़ुशी किसी लम्बे सूखे के बाद आई पहली बारिश की फुहारों से पैदा हुई ख़ुशी जैसी थी. करीब पांच-छः महीने बाद दिल्ली सरकार ने दिल्ली विश्वविद्यालय के बारह कालेजों के टीचिंग और नान-टीचिंग स्टाफ की सैलरी रिलीज़ की थी। पिछले पांच महीने से शिक्षक बगैर सैलरी के पढ़ा रहे थे और नान टीचिंग स्टाफ बगैर सैलरी के काम कर रहा था। आख़िर सरकार की ऐसी कौन सी मजबूरी थी जिसके चलते सरकार ने कालेजों को फंड ट्रांसफर पिछले कई महीनों से रोक रखा था? कहीं ऐसा तो नहीं कि बारह कालेजों के स्टाफ की सैलरी रोकने के पीछे कुछ और था?

डाक्टर भीमराव आंबेडकर कालेज इन्ही बारह कालेजों में से एक है. इस कालेज के वरिष्ठ शिक्षक डॉ. सुजीत कुमार इस समस्या के पीछे की ‘बिग-पिक्चर’ पेश करते हैं. दिल्ली विश्विद्यालय एक्ट में दिल्ली में दिल्ली विश्विद्यालय के अलावा किसी भी दूसरे विश्विद्यालय को कालेज खोलने कि इजाजत नहीं दी गयी है. देश में उच्च शिक्षा की बढती मांग और दिल्ली विश्वविद्यालय के ऊंचे स्टैण्डर्ड को देखते हुए देश भर से बच्चे दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश चाहते हैं जिसे देखते हुए दिल्ली में नए कालेजों को खलना जरूरी हो गया था. दिल्ली विश्वविद्यालय के पास नए कालेज खोलने के पैसे नहीं थे. ऐसे में दिल्ली विश्वविद्यालय और दिल्ली सरकार के बीच एक समझौता हुआ जिसके तहत दिल्ली सरकार को कालेज खोलने कि अनुमति दी गयी. समझौता कुछ ऐसा था कि इन नए कालेजों के निर्माण से लेकर रखरखाव और कर्मचारियों के सैलरी की जिम्मेदारी दिल्ली सरकार की होगी और सिलेबस से लेकर पठन-पाठन, इम्तहान से लेकर डिग्री तक दिल्ली विश्वविद्यालय की होगी.

1991 में इस समझौते पर अमल करते हुए दिल्ली में बारह नए कालेजों कि स्थापना हुई. इन्हीं में से एक डा. बी आर आंबेडकर कालेज भी है. डॉ. सुजीत बताते हैं कि पिछले कई दशकों से पूरी व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रही पर अचानक पिछले कुछेक वर्षों से यह गड़बड़ाने लगी.

सन 2014 में दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में पहली बार आम आदमी पार्टी की सरकार बनी. दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया गया है. दिल्ली से सम्बंधित महत्वपूर्ण फैसले लेने का अधिकार लेफ्टिनेंट गवर्नर के पास है. केजरीवाल के पहले कार्यकाल में ही दिल्ली सरकार और लेफ्टिनेंट गवर्नर के बीच मतमुटाव की खबरें आनी शुरू हो गयीं थीं. दिल्ली सरकार का मतविरोध केवल दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर तक सीमित नहीं रहा और जल्द ही दिल्ली सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन आमने सामने आ गये. विवाद कि जड़ में यह सवाल था कि इन बारह कालेजों के गवर्निंग बॉडी को बनाने का अधिकार दिल्ली सरकार के पास होगा या विश्वविध्यालय प्रशासन के पास? दिल्ली सरकार का कहना था कि इन बारह कालेजों में गवर्निंग बॉडी में दिल्ली सरकार के लोग रहने चाहिए पर विश्ववविद्यालय प्रशासन ने राज्य सरकार के सुझवों को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया. कभी इस बहाने तो कभी उस बहाने दिल्ली सरकार के लोगों को न तो गवर्निंग बॉडी में शामिल होने दिया और न ही चेयरमैन बनने दिया. दिल्ली सरकार का कहना था कि इन बारह कालेजों को चलने का खर्चा दिल्ली सरकार दे रही है पर वहाँ उसे अपनी गवर्निंग बॉडी भी नहीं बनाने दिया जा रहा है. भला ऐसा कबतक चल सकता है ? नतीजा, दिल्ली सरकार ने अक्टूबर 2019 से फंड में कटौती करनी शुरू कर दी.

फरवरी 2020 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने लगातार दूसरी बार बहुमत से दिल्ली में अपनी सरकार बनायी. अब तक आम आदमी पार्टी कि सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच गवर्निंग बॉडी को लेकर चल रही यह तकरार खुलकर सामने आ गयी थी. अपने दूसरे कार्यकाल के बजट में दिल्ली सरकार ने विधेयक पारित किया कि न केवल दिल्ली सरकार इन बारह कालेजों का फंड रोक देगी बल्कि आने वाले दिनों में यूनिवर्सिटी एक्ट में संशोधन करके इन बारह कालेजों को दिल्ली विश्विद्यालय से अलग करके डा. भीमराव विश्वविद्यालय में मिला लिया जायेगा.

यानी, एक ओर दिल्ली विश्वविद्यालय गवर्निंग बॉडी को लेकर अड़ियल रुख बनाये बैठा था तो दूसरी और दिल्ली सरकार अपनी जिद पर अड़ गयी थी कि सरकार को जब तक गवर्निंग बॉडी नहीं बनाने दिया जाता तब तक वह इन कालेजों के फंड को मुहैया नहीं करवाएगी. इन दोनों के झगड़े में इन बारह कालेजो के कर्मचारी फँस गए. फंड की कटौती के चलते उनकी सैलरी अनियमित होती गयी. कभी किसी एक महीने सैलरी आती तो दो महीने नहीं आती. कभी किसी महीने के दस बारह दिनों की ही सैलरी आती. एक समय ऐसा आया जब सैलरी आनी एकदम से बंद हो गयी.

दिलचस्प यह है कि इसका असर अलग अलग वर्गों पर अलग-अलग तरीके से पड़ा. इनमें ऐसे लोग भी थे जिनकी पगार अच्छी है. या बैंको में बचत का कुछ पैसा है. या घर के दूसरे सदस्य की तनख्वाह नियमित रूप से आ रही है, ऐसे लोगों को शुरूआती दिनों में कम मुश्किलें आयीं. लेकिन जिनकी तन्खवाह कम है या मियाँ-बीवी दोनों इन बारह कालेजों में काम करते हैं, उनके लिए घर चलाना मुश्किल होता गया. कुछ ऐसी ही कहानी है डॉ. वेदपाल और डॉ. रेखा की. दोनों एडहोक हैं. वेदपाल कहते हैं कि ‘तनख्वाह भले ही अनियमित हो गयी थी, खर्चे तो नियमित ही थे. घर के रोजमर्रे की जरूरतों से लेकर EMI,बच्चे का फीस तो नियमित ही थी और इस खर्च को उठा पाना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा था. मवाना के रहने वाले डॉ. वेदपाल को अपने घर भी पैसा भेजना पड़ता है. उनके बैंक में अब बस कुछेक हजार रुपये पड़े थे। आने वाले दिनों में वह अपने खर्चे कैसे निकालेंगे इसको सोच कर ही वह तनाव में आ जाते थे. तीन-चार महीने सैलरी न मिलने से वरिष्ठ प्रोफेसरोंकी हालत भी खराब होती जा रही थी. डॉ सुजीत भी कहते हैं कि तनख्वाह न मिलने पर अगले महीने घर की EMI वगैरह के लिए उन्हें अपने दोस्तों से उधार लेना पड़ता.

दिल्ली सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच के झगड़े से पैदा हुए इस संकट के चलते इन कालेजों के कर्मचारियों में रोष स्वाभाविक था. दिलचस्प यह है कि दिल्ली सरकार ने इस रोष से निबटने का एक बहुत ही अनूठा तरीका ढूढ़ निकाला. बारह कालेजों के फंड में कटौती तो की गयी पर कभी किन्हीं तीन -चार कालेजों को कुछेक महीनो का फंड उपलब्ध करवा दिया जाता, फिर कभी कुछ और कालेजों को कुछ फंड उपलब्ध करवा दिया जाता. मसलन सरकार ने दवा किया था कि अग्रसेन कालेज को जनवरी 2021 तक नियमित रूप से फंड दिया गया. डॉ. वेदपाल का कहना है कि सरकार के इस दावे में सच्चाई नहीं है क्योंकि पिछले वर्ष जून से लेकर अगस्त तक कि सैलरी स्टूडेंट्स वेलफेयर फंड से दी गयी. ऐसे में सरकार कैसे कह सकती है कि उसने अग्रसेन कालेज को नियमित रूप से फंड भेजा? इसी तरह अलग-अलग कालेजों में कुछ महीनों कि सैलरी भेजी गयी तो कुछ महीने रोक दिया गया. कालेज के कर्मचारियों को अक्सर इस बात कि जानकारी नहीं होती कि आखिर उन्हें कब तक की सैलरी नहीं मिली या कब तक कि सैलरी मिली है. यह अपने आप में एक अभूतपूर्व स्थिति थी. मसलन बी.आर आंबेडकर कालेज को अक्टूबर 2020 तक का फंड मिला.

शिक्षकों का मानना है कि देखने में भले ही यह थोडा अजीब लगे पर दरअसल दिल्ली सरकार का यह एक मास्टर-स्ट्रोक था. यह दरअसल आर्थिक फूट डालो और राज करो की नीति थी. सैलरी को लेकर इस अस्पष्टता के चलते इन बारह कालेजों के कर्मचारी कभी भी एकजुट नहीं हो सके.

दिल्ली सरकार ने हाल ही में इन बारह कालेजों के लिए एक निर्देश जारी किया है जिसमें इन कालेजों को अपना खर्चा खुद निकालने कि ‘सलाह’ दी गयी है. सरकार का कहना है कि जो ‘डेफिसिट’ होगा सरकार उस कमी को पूरा कर देगी. शिक्षकों का मानना है इस नए फार्मूले कि मदद से सरकार कालेजों को दिए जाने वाली मदद से अपना हाथ खींच रही है. ऐसे में अपने खर्चे निकलने के लिए कालेज को अपनी फीस कई गुणा बढ़नी पड़ेगी और आने वाले दिनों में आम घरों के बच्चों का इन कालेजों में पढ़ने का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो जायेगा.

दिल्ली सरकार ने इसी के साथ एक नया फार्मूला बनाया जिसके अनुसार कालेजों को अब कहा गया कि वह स्टूडेंट वेलफेयर फंड का इस्तमाल कर्मचारियों को तनख्वाह देने में करें. डॉ. सुजीत बताते हैं कि दिल्ली सरकार द्वारा कालेजों को प्रस्तावित यह फार्मूला अपने आप में गैरकानूनी है क्योंकि एक्ज़िक्विटिव काउंसिल से जुड़े नियमों के सेक्शन 47 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि स्टूडेंट वेलफेयर फंड का इस्तमाल केवल विद्यार्थियों पर ख़र्च में होगा. इसका इस्तमाल किसी भी सूरत में कर्मचारियों की सैलरी के रूप में नहीं किया जा सकता.

दिल्ली सरकार द्वारा फंड रोक दिए जाने से एक ओर जहां लोगों कि सैलरी बंद हो गयी, उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, वहीं कालेजों के लिए अपनी जरूरत के खर्चों को निकलना दिन ब दिन मुश्किल होता गया. कालेज के कम्यूटर /साफ्टवेयर के AMC से लेकर बिजली/ जलबोर्ड के बिल बकाया रहने लगे. कई कालेज में हालत इतनी खराब हो गयी कि वहाँ बिजली–पानी के कनेक्शन भी कट गए. यह अपने आप में एक अभूतपूर्व स्थिति थी. आज से पहले कभी भी ऐसी हालत नहीं आई थी. कालेज के लोग बताते हैं कि कोरोना के चलते कालेज बंद थे वरना अगर कालेज खुले होते तो न केवल वहाँ पर काम करने वालों बल्कि छात्रों को भयावह स्थिति का मुकाबला करना पड़ता.

सैलरी न आने से सबसे बुरा प्रभाव चतुर्थ श्रेणी में काम कर रहे कर्मचारियों पर पड़ा और वे भुखमरी के कगार पर पहुँच गये.सुनील कुमार इन्हीं में एक हैं. उनका कहना है कि पिछले कई महीनो से अनियमित रूप से मिलने वाली सैलरी ने उनकी कमर को तोड़ दिया. महंगाई के चलते पहले ही अपने खर्चों को वह किसी तरह ही निकाल रहे थे, इस अनियमित सैलरी के चलते उन्होंने दोस्तों से उधार लेकर किसी तरह अपना घर के खर्चों को पूरा किया. हालत इतने ख़राब थे कि कॉलेज खुलने के बाद आने–जाने के बस का किराया भी नहीं जुट पा रहा था।

बहरहाल, पूरी स्थिति से निपटने के लिए इन बारह कालेजों के शिक्षक और कर्मचारी स्थायी हल की तलाश में हैं। उन्हें एकजुट होकर संघर्ष का फ़ैसला किया है और दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के इन बारह कालेजों के शिक्षकों और कर्मचारियों के पक्ष में उतर पड़ा. डूटा ने 11 मार्च से शटडाउन का ऐलान किया और 12 तारीख़ से बकाया वेतन आने लगा. डीयू में शटडाउन का यह सिलसिला लेकिन जारी है. 15 मार्च को विश्वविद्यालय के कुलपति आवास से सीएम अरविंद केजरीवाल के सिविल लाइन्स स्थित आवास तक मार्च निकलेगा. शिक्षकों और कर्मचारियों माँग है कि दिल्ली सरकार तुरंत सारा बकाया दे और यह सुनिश्चित करे कि सैलरी पहले जैसी नियमित रूप से आएगी. साथ ही यह मांग भी है कि दिल्ली सरकार द्वारा इन बारह कालेजों का बी.आर. आंबेडकर युनिविर्सिटी द्वारा अधिग्रहण की योजना को फौरी प्रभाव से निरस्त किया जाय.

यानी दिल्ली के सरहद पर अगर किसान डटे हैं तो शहर के अंदर, सड़कों पर मुट्ठी ताने शिक्षक नज़र आयेंगे। दबाव पड़ते ही फंड रिलीज़ होने से शिक्षक और कर्मचारियों की आशंकाएँ दूर नहीं हुई हैं। कई तो अभी भी बकाये वेतन का इंतज़ार कर रहे हैं. पर अलव बात है कि इस समस्या का कोई स्थायी हल कैसे निकले। शिक्षा क्षेत्र में बड़े-बड़े बदलाव लाने का दावा कर रही केजरीवाल सरकार शिक्षकों और कर्मचारियों के अधिकार को भीख समझ कर दे रही है। शिक्षक नेता कह रहे हैं कि संघर्ष ज़रूरी हो गया है। वैसे भी जिन शर्तों पर सरकार ने ग्रांट दी है, वे ख़तरनाक हैं।


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