दिल्ली दंगा: जाँच में फ़र्ज़ीवाड़े को लेकर अदालत ने पुलिस को फटकारा, तीन आरोपित बरी

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दिल्ली की एक अदालत ने गुरुवार को दिल्ली दंगा मामले में आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन के भाई शाह आलम, राशिद सैफी और शादाब समेत तीन आरोपियों को आरोपमुक्त करते हुए दिल्ली पुलिस के खिलाफ सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कड़े शब्दों का प्रयोग करने हुए कहा कि जब भविष्य में राष्ट्रीय राजधानी में सबसे भीषण सांप्रदायिक दंगों को देखा जाएगा, तो उचित जांच करने में पुलिस की विफलता लोकतंत्र के रखवालों को ‘पीड़ा’ देगी।

बता दे, इन लोगो पर फरवरी 2020 में दिल्ली दंगों के दौरान एक दुकान में कथित लूटपाट, तोड़फोड़ और दुकान को जलाने के आरोप थे। यूएपीए के तहत भी इन पर आरोप लगाया गया था। आरोपियों पर आईपीसी की धारा 147, 148, 149, 380, 427, 436, 435,454 और धारा 120-बी के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।

चश्मदीद गवाहों के बयान नही है..

कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने जांच एजेंसी को फटकार लगाते हुए कहा कि इस मामले में चश्मदीद गवाहों के बयान नही है। मामले में आरोपियों के घटनास्थल पर मौजूदगी को लेकर कोई भी सीसीटीवी कैमरा की फुटेज नहीं है। तकनीकी सबूतों का पता लगाने के लिए कोई वास्तविक प्रयास किए बिना ही चार्जशीट को दाखिल करने से ही मामला सुलझ गया ऐसा प्रतीत होता है। कोर्ट ने कहा की जब कभी इस तरह के दंगे की जांच के बारे में भविष्य में देखा जाएगा तो पता चलेगा कि जांच में कोई वैज्ञानिक तरीका उपयोग नहीं किया गया।

अदालत की आंखों पर पट्टी बांधने की कोशिश..

कोर्ट ने कहा की किसी गवाह के बारे में पता भी नहीं किया गया। इस जांच में क्षमता का पूरा अभाव नज़र आ रहा है। इस मामले में जिस प्रकार की जांच की गई है वह वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा मामले में निगरानी में कमी को स्पष्ट रूप से ज़हिर करती है। यह जांच दिखावा करने वाली व बेमन से की गई है। यह साफ दिख रहा हैैैै की जांच एजेंसी ने केवल अदालत की आंखों पर पट्टी बांधने की कोशिश की है और इससेे ज़्यादा कुछ नहींं। यह आम जनता के टैक्स के रूप में दिए गए पैसे की बर्बादी है।

न्यायालय का कीमती समय तारीख देने में बर्बाद हो रहा..

कोर्ट ने इस मामले पर आगे कहा, इस न्यायालय का कीमती न्यायिक समय उन मामलों में तारीख देने में बर्बाद हो रहा है। जहां पुलिस द्वारा शायद ही कोई जांच की जाती है। यह उत्तर-पूर्वी दिल्ली की एकमात्र अदालत है जो दंगों के सभी मामलों से निपटती है। इस अदालत में करीब 150 मामले दर्ज किए गए हैं। अब तक करीब 35 मामलों में आरोप तय किए जा चुके हैं।

कुछ मामलों में एमएम को वापस भेज दिया गया है, क्योंकि कोई भी अपराध विशेष रूप से सेशन कोर्ट द्वारा ऐसा नहीं पाया गया था जिसपर अदालती कार्रवाई की जा सके। बड़ी संख्या में ऐसे आरोपी हैं जो पिछले डेढ़ साल से सिर्फ इसलिए जेल में बंद हैं क्योंकि उनके मुकदमों की सुनवाई नहीं हो रही है। अदालत ने कहा अभियोजन पक्ष ऐसा कोई सबूत पेश करने में असफल रहा है जिससे आरोपियों पर अपराध साबित हो सके। इसी के साथ कोर्ट ने तीनों को मामले से आरोपमुक्त कर दिया हैं।

 


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