‘पिंजरा तोड़’ की एक्टिविस्ट्स को ज़मानत मिलते ही, नए मामले में गिरफ्तारी

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पिछले डेढ़ महीने में लगने लगा है कि कोरोना संकट को दिल्ली पुलिस ने सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन के कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न का औज़ार बना लिया है। यहां तक कि अदालत से एक मामले में ज़मानत मिलने की स्थिति में पुलिस, दूसरा मामला तैयार कर के पहले से तैयार रखती है कि इन एक्टिविस्टों को ज़मानत न मिल पाए। रविवार को दिल्ली में गिरफ्तार की गई पिंजरा तोड़ संगठन की कार्यकर्ता नताशा नरवाल और देवांगना कलीता के मामले में यही हुआ है। अदालत ने जब दोनों को ज़मानत दे दी, तो पुलिस ने एक दूसरे मामले में इनकी रिमांड हासिल कर ली। हालांकि पुलिस को अदालत से केवल 2 ही दिन की न्यायिक हिरासत की अनुमति मिली है।

मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट अजीत नारायण ने दिल्ली पुलिस द्वारा जाफराबाद में हुए दंगे के आरोप में गिरफ्तार की गयी पिंजरा तोड़ संगठन की कार्यकर्ता नताशा नरवाल और देवांगना कलीता को 20 हज़ार रुपये के मुचलके पर ज़मानत देते हुए कहा कि अभियुक्तों के हिंसा में शामिल होने का कोई तथ्य नहीं दिखाई देता। ये सिर्फ़ नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के विरोध में प्रदर्शन कर रही थीं। इनकी जड़ें समाज में काफ़ी गहराई तक हैं और ये काफ़ी पढ़ी-लिखी भी हैं। साथ ही अभियुक्त दिल्ली पुलिस को जांच में सहयोग करने के लिए भी तैयार हैं। 

लेकिन मजिस्ट्रेट द्वारा ज़मानत दिए जाने के कुछ समय के भीतर ही दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच ने दंगो से जुड़े हत्या के एक अन्य मामले में नताशा नरवाल और देवांगना कलीता के लिए 14 दिन की न्यायिक हिरासत मांगी। हालांकि कोर्ट ने क्राइम ब्रांच को पूछताछ के लिए दो दिन ही स्वीकृत किये। बता दें कि दिल्ली पुलिस ने पिंजरा तोड़ संगठन की इन दोनों कार्यकर्ताओं को जाफराबाद में हुए दंगो से जुड़े मामलों में बीते शनिवार को गिरफ्तार किया था। जिसके बाद इन दोनों को रविवार को मजिस्ट्रेट अजीत नारायण के सामने पेश किया गया।

कोर्ट में चल रही सुनवाई में पुलिस ने इनकी न्यायिक हिरासत की मांग करते हुए कहा कि ये राष्ट्र विरोधी कार्यों में सम्मिलित हैं। नताशा और देवांगना के वकील ने पुलिस की इस बात पर कोर्ट को बताया कि ये गलत आरोप हैं, इनमे कहीं भी कोई तथ्य नहीं है। और एफआईआर दर्ज किये जाने के बाद से ही ये दोनों पुलिस की जांच में पूर्ण सहयोग भी कर रही हैं। जिस वजह से इन्हें ज़मानत दी जानी चाहिए। 

दिल्ली पुलिस इसके पहले भी दिल्ली दंगों में संलिप्तता के आरोप में कई छात्रों को गिरफ्तार कर चुकी है। पुलिस ने जामिया मीलिया विश्वविद्यालय के कई छात्रों को भी दिल्ली दंगों के मामलों में शामिल होने का आरोप लगाकर गिरफ्तार किया है। पिंजरा तोड़ संगठन की दोनों सदस्यों की गिरफ़्तारी को लेकर जे.एन.यू. शिक्षक संघ ने एक विज्ञप्ति भी जारी की थी। जिसमें उनके ऊपर लगे झूठे आरोपों को खारिज़ कर के उन्हें रिहा करने की मांग की गयी थी।  

फ़रवरी 2020 में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के पास महिलाओं का बड़ा समूह लोकतांत्रिक तरीके से प्रदर्शन के लिए एकत्रित हुआ था। इसको देखते हुए भाजपा के कपिल मिश्रा ने पुलिस के साथ खड़े होकर प्रदर्शनकारियों को हटने के लिए विवादित बयान दिया था और ट्वीट भी किया था कि दिल्ली पुलिस को तीन दिन का अल्टीमेटम- जाफराबाद और चांद बाग की सड़कें ख़ाली करवाइये। इसके बाद हमें मत समझाईयेगा, हम आपकी भी नहीं सुनेंगे, सिर्फ़ तीन दिन। कपिल मिश्रा के इस बयान के एक दिन बाद जाफराबाद में दंगे शुरू हो गए। जिसमें 50 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई है।


 


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