ज़किया जाफ़री मामले में सुप्रीम कोर्ट का फै़सला बेहद निराशाजनक: कांग्रेस

मीडिया विजिल मीडिया विजिल
ख़बर Published On :


पार्टी इस बात पर जोर देती है कि भाजपा चाहे जितना ही प्रचार कर ले 2002 की गुजरात हिंसा और इसे संभालने में मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की विफलता के दाग नहीं ढंक सकते हैं!

द टेलीग्राफ में आज प्रकाशित संजय के. झा की खबर का अनुवाद-

कांग्रेस ने सोमवार को जाकिया जाफरी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को “बेहद निराशाजनक” बताया और इस बात पर जोर दिया कि 2002 की गुजरात हिंसा या इसे संभालने में मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की विफलता के दाग भाजपा के किसी प्रचार से नहीं ढंक सकते हैं।

पार्टी के संचार प्रमुख जयराम रमेश ने कुछ “बुनियादी सवाल” करने से पहले कहा, “जकिया जाफरी मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बेहद निराशाजनक है।”
उन्होंने कहा, “24 जून 2022 के फैसले के बावजूद, निम्नलिखित मूलभूत प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं:

1. बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगों के मामलों में मुख्यमंत्री और राज्य सरकार की संवैधानिक तथा नैतिक जिम्मेदारी क्या है?
2. क्या ऐसे मामलों में जिम्मेदारी केवल कलेक्टर और पुलिस प्रमुख की है, राजनीतिक कार्यकारिणी का नहीं?
3. क्या मुख्यमंत्री, कैबिनेट और राज्य सरकार को कभी भी जवाबदेह नहीं ठहराया जाएगा, भले ही एक राज्य को हिंसा और दंगों के दुष्चक्र में डाल दिया जाए?

जयराम रमेश ने भाजपा के उस समय के प्रधान मंत्री, अटल बिहारी वाजपेयी की सलाह, मोदी को “राजधर्म” निभाना चाहिए और 2004 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उस समय के गुजरात के शासकों को “आधुनिक-समय के नीरो” कहे जाने का उल्लेख किया। इसकी वजह यही थी कि राज्य जल रहा था तो ‘सरकार’ ने कुछ नहीं किया।

शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को एक विशेष जांच दल (एसआईटी) के निष्कर्षों को स्वीकार कर लिया और मोदी तथा 63 अन्य को हिंसा के लिए एक बड़ी साजिश के आरोपों से मुक्त कर दिया था। जकिया जाफरी ने यह आरोप लगाया था। 28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसाइटी नाम के आवासीय कांपलेक्स में भीड़ ने जकिया के पति, पूर्व कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी और 68 अन्य लोगों को जिंदा जला दिया था।

कांग्रेस ने गुजरात दंगों से संबंधित सभी आरोपों से मोदी को बरी करने के रूप में फैसले की भाजपा की व्याख्या को चुनौती दी है। कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक सिंघवी ने तर्क दिया है कि फैसले का संदर्भ गुलबर्ग सोसाइटी नरसंहार तक सीमित है।

सोमवार को जयराम रमेश का बयान कांग्रेस के इस रुख को दर्शाता है कि मोदी और उनकी तत्कालीन गुजरात सरकार ने दंगों और उसके बाद के दौरान गैर-जिम्मेदाराना तरीके से काम किया था, जब पीड़ितों को राहत और न्याय देने की जरूरत थी।

“इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने जब अपना फैसला सुना दिया है, पांच ऐसे सवाल हैं जो प्रधानमंत्री को परेशान करते रहेंगे।” उन्होंने कहा ये प्रश्न है:

** 2002 में जब भीषण दंगे हुए तब क्या नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं थे?
** 2002 की हिंसा के दौरान मोदी की कार्रवाई में कमी पर तत्कालीन प्रधान मंत्री वाजपेयी इतने चिंतित क्यों थे कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से उन्हें अपने “राजधर्म” का पालन करने के लिए कहा था?
** अगर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने गुजरात की उस समय की मोदी सरकार को “आधुनिक-समय का नीरो नहीं कहा होता (जो) निर्दोष बच्चों और असहाय महिलाओं को जलाए जाने के समय कहीं और देख रही थी और शायद विचार कर रही थी कि इस अपराध के दोषियों को कैसे बचाया जा सकता है”?
** यदि वे किसी गलत काम के दोषी नहीं थे तो स्मृति ईरानी जो अब मोदी की केंद्र सरकार की सदस्य हैं, समेत भाजपा के भीतर के कुछ लोगों ने विरोध क्यों किया और अगर वे किसी गलत काम के दोषी नहीं थे तो इसकी क्या जरूरत थी?
** गुजरात दंगों से संबंधित एसआईटी के सबूतों के आधार पर सभी दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की गई थी? क्या भाजपा यह दावा कर सकती है कि वे भी अवैध हैं?

जयराम रमेश ने कहा: “हम इस घड़ी में अपने सहयोगी दिवंगत एहसान जाफरी और उनके परिवार के साथ खड़े हैं। उनके साथ जो हुआ वह सबसे दुखद तरीके से हुआ और राज्य सरकार की ओर से एक बुनियादी चूक का परिणाम था।”

जकिया जाफरी ने आरोप लगाया है कि भीड़ ने जब गुलबर्ग सोसाइटी पर हमला किया तब एहसान जाफरी ने गुजरात के भिन्न अधिकारियों को बार-बार कई कॉल कीं लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।

जयराम रमेश ने एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड़ और पुलिस अधिकारी आरबी श्रीकुमार की गिरफ्तारी पर कोई टिप्पणी नहीं की, जिन्होंने दंगों के दौरान गुजरात सरकार की भूमिका पर सवाल उठाया था।

पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के एक हिस्से का हवाला देते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई का बचाव किया है। बड़ी साजिश के आरोपों के संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह “मामले को लगातार गर्म रखने की कुटिल चाल है।”

टेलीग्राफ़ की इस ख़बर का अनुवाद वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह ने किया है। उनकी फ़ेसबुक दीवार से साभार प्रकाशित।