बड़वानी: CAA-NRC के खिलाफ आदिवासी, दलित और किसानों की रैली, जन सभा

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सोमवार, 27 जनवरी को मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ दलित, आदिवासी, तथा अन्य नागरिक समूहों द्वारा ‘संविधान बचाओ जन आन्दोलन’ के नाम से एकजुट हो कर, मध्य प्रदेश सरकार से प्रदेश में एनपीआर नहीं लागू करने के सम्बन्ध में विधान सभा में प्रस्ताव पारित करने की मांग भी उठाई. एनपीआर तथा एनआरसी से गरीब एवं आम नागरिकों को प्रताड़ित किया जाएगा, तथा धर्म आधारित भेदभाव करने वाला सीएए संविधान विरोधी है. इसलिए ये तीनों किसी एक समाज का मुद्दा नहीं है, बल्कि हर नागरिक का है. एनपीआर एनआरसी तथा सीएए को एक ही कड़ी का हिस्सा बताते हुए इनको हर नागरिक के संवैधानिक और लोकतान्त्रिक अधिकारों पर एक बड़ा खतरा बताया गया.

दूर-दराज़ ग्रामों से आए आदिवासी महिला-पुरुष सहित लगभग पंद्रह हज़ार से ज्यादा लोगो ने रैली एवं जन सभा में भाग लिया जिसमें जागृत आदिवासी दलित संगठन, आदिवासी मुक्ति संगठन, आदिवासी छात्र संगठन भीम आर्मी, नर्मदा बचाओ आंदोलन, सेंचुरी मिल संघर्ष जैसे संगठनों ने भाग लिया.

कई जनसंगठनों के प्रतिनिधियों द्वारा जनसभा को संबोधित किया गया, तथा जनसभा में वरिष्ट सामाजिक कार्यकर्त्ता श्री योगेन्द्र यादव, श्री हर्ष मंदर (पूर्व आइएएस अधिकारी) तथा सुश्री. मेधा पाटकर ने भी विरोध जनसभा में भाग लेकर सभा ने संबोधित किया.

श्री योगेन्द्र यादव ने बताया कि – “प्रधान मंत्री कहते है कि विरोध करने वालों को कपड़े से पहचाना जा सकता है. काश प्रधान मंत्री इस एतिहासिक सभा को देख पाते, तो आज यहां तो आज यहां नौजवान, आदिवासी महिलाओं के कपड़े देख पाते, कैसे सब आज यहां है. पर अफसोस, कि प्रधान मंत्री सिर्फ सिर पर टोपी और हिजाब ही दिखता है, काश एक और कपड़ा देख लेते, पर उन्हें तिरंगे का कपड़ा नहीं दिखता.” एनपीआर और एनआरसी के बारे में उन्होंने कहा – “गांधी जी को याद करते हुए एनपीआर की प्रक्रिया में असहयोग करना है, बहिष्कार करना है. बाबासाहब का संविधान हमारे साथ है.”


बड़वानी के पूर्व अनुविभागीय अधिकारी रह चुके हर्ष मंदर ने अपने आसाम के नज़रबंदी केन्द्रों (डीटेंशन सेंटर) के अपने अध्ययनों के अनुभव को बाटां और कहा कि एनआरसी की प्रक्रिया में केवल एक समाज के लोग नहीं निकाले गए, जिसमें 14 लाख हिन्दू एवं आदिवासी थे, सिर्फ इसी कारण की वह अपने काग़ज़ से अपनी भारतीयता साबित नहीं कर पाए. आज बड़वानी में हमने साबित कर दिया किया कि हम आज भी गांधी के संतान है, गोडसे के नहीं और हम इसी तरह संविधान के बचाव में डटे रहेंगे’.

नर्मदा बचाओ आन्दोलन की मेधा पाटकर ने कहा कि -जब वोट मांगने आए थे, तब हमसे कोई काग़ज नहीं मांगे थे.. आज असम जल रहा है इस कानून के विरोध में, धर्म के आधार पर देश को बांटने वाला सीएए हमे नामंजूर है.

धरने में विरोध कर रहे आदिवासी किसान-मजदूरों ने केंद्र सरकार के द्वारा खेती, रोजगार तथा पलायन के मौजूदा संकट को नज़रंदाज़ कर एन.पी.आर. और एन.आर.सी. के जरिए आम जनता के नागरिकता पर ही सवाल खड़ा करने के इस मुहिम को बेतुका तथा जन विरोधी कहा. जागृत आदिवासी दलित संगठन की नासरी बाई के मुताबिक- “हमारे मूलभूत अधिकारों एवं ज़रूरतों, जैसे स्वास्थ, शिक्षा, रोजगार, कृषि संकट और विकास पर क्यूँ नहीं ध्यान देती है?

जाति-प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, आधार, जैसे सरकारी कागज़ में आने वाली समस्याओं से आम जनता अच्छी तरह वाक़िफ़ है. सरकारी कागज़ बनाने में दफ्तरों और कमीशन कि ताक में बैठे दलालों से पहले से परेशान आम जनता की नागरिकता ही किसी भ्रष्ट बाबू के मन-मर्ज़ी पर टिके, यह हमें मंज़ूर नहीं, हम काग़ज नहीं दिखाएंगे!”

विरोध में उपस्थित लोगों के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा धर्म के आधार पर भेदभाव कर नागरिकता संशोधन अधिनियम (सी.ए.ए.) के ज़रिए नफ़रत और साम्प्रदायिकता कि राजनीति करने के इस गैर संविधानिक प्रयास को खारिज करना ज़रूरी है. संविधान के आजादी, बराबरी तथा भाईचारे के मौलिक सिद्धांतों के ऊपर सी.ए.ए. के हमले का पूरजोर विरोध करने के लिए सभी संविधान तथा देश प्रेमी नागरिक खड़े है.

अगर संविधान पर इस हमले का विरोध नहीं किया जाएगा तो आगे चल हमारे सभी लोकतांत्रिक तथा संवैधानिक अधिकार खतरे में पड़ जाएंगे. इस विरोध प्रदर्शन को एन.पी.आर, एन.आर.सी. तथा सी.ए.ए. के खिलाफ संविधानिक मूल्यों को बचाने के लिए एक लम्बे आन्दोलन कि शुरुआत बताई.

संवैधानिक मूल्यों को बचाने का प्रण लेते हुए उपस्थित सभी आन्दोलनकारियों ने संविधान की प्रस्तावना को पढ़ संविधान पर होने वाले हमलों के खिलाफ आवाज उठाने की शपथ ली.


विज्ञप्ति: संविधान बचाओ जन आन्दोलन, बड़वानी द्वारा जारी 


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