राँची में कोरोना संक्रमित को दफनाने का विरोध, लाश लेकर भटकता रहा प्रशासन

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कोरोनो पूरी मानव जाति के लिए ख़तरे की घंटी है। इस महामारी से अबतक लाखों लोग मर चुके हैं. लेकिन भारत में इस बहाने घटिया राजनीति और अफ़वाहों का बाज़ार गर्म है। यहां तक कि लाशों को भी मोहरा बनाया जा रहा है। ताजा मामला रांची का है जहां कोरोना पीड़ित व्यक्ति के मौत के बाद उसके अंतिम संस्कार को लेकर जमकर हंगामा हुआ.

दरअसल 12 अप्रैल को दिन के लगभग 9 बजे झारखंड की राजधानी रांची के रिम्स अस्पताल में एक कोरोना संक्रमित व्यक्ति की मृत्यु हो गई. इनकी मृत्यु के बाद केन्द्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय व डब्ल्यूएचओ के गाइडलाइन के अनुसार रांची प्रशासन ने लाश को दफनाने की प्रक्रिया शुरू की. प्रशासन ने फैसला किया कि लाश को बरियातू स्थित जोड़ा तालाब के इन्द्रप्रस्थ कॉलोनी स्थित कब्रिस्तान में दफनाया जाएगा. वहां लाश को दफनाने के लिए जेसीबी से गड्ढा भी खोदा गया क्योंकि कोरोना संक्रमित को 15 फिट नीचे दफनाने का निर्देश है। लेकिन स्थानीय लोगों  ने अचानक विरोध शुरू कर दिया जिसके कारण वहां लाश दफनाने का विचार स्थगित कर दिया गया. वैसे, अंजुमन इस्लामिया के महासचिव हाजी मुख्तार अहमद का कहना है कि बरियातू के सत्तार कॉलोनी स्थित कब्रिस्तान में शव दफनाने को लेकर कोई विवाद नहीं था, प्रशासन ने कम जगह होने के कारण यहां शव दफनाना रद्द किया.

बहरहाल अखबारों में बरियातू में शव नहीं दफनाने को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शन की तस्वीर छपी है, इसका मतलब यही है कि यहां भी विरोध के कारण ही लाश को नहीं दफनाया जा सका. इसके बाद प्रशासन ने रातू रोड स्थित कब्रिस्तान में दफनाने का निर्णय लिया. लोगों का कहना है कि प्रशासन का यह निर्णय बहुत ही तेजी से रातू रोड पहुंच गया और प्रशासन के पहुंचने से पहले ही लॉकडाउन की धज्जियां उड़ाते हुए सैकड़ों महिला-पुरुष रातू रोड स्थित कब्रिस्तान पहुंच गये और कब्रिस्तान को घेरकर विरोध प्रदर्शन करने लगे. लोगों का कहना था कि हम जान दे देंगे लेकिन यहां शव दफनाने नहीं देंगे. यहां भी प्रशासन प्रदर्शनकारियों की मांगों को मानते हुए शव दफनाये बगैर वापस आ गया.

फिर प्रशासन ने डोरंडा स्थित कब्रिस्तान का रूख किया, लेकिन वहां भी स्थानीय लोगों के विरोध प्रदर्शन के कारण प्रशासन को पीछे हटना पड़ा. बाद में अफवाह उड़ी कि जोमार नदी के पास शव को दफनाया या जलाया जाएगा, वहां भी काफी संख्या में लोग जमा होकर विरोध प्रदर्शन करने लगे, लेकिन वहां प्रशासन पहुंचा ही नहीं. आखिरकार रात के लगभग एक-डेढ़ बजे मृतक के अपने मोहल्ले हिन्दपीढ़ी के बच्चों के कब्रिस्तान में ही दफनाया गया.

दरअसल कोरोना वायरस के संक्रमण से किसी की मृत्यु होने के बाद उसके शव का प्रबंधन कैसे किया जाए और क्या सावधानियां बरती जाएं, इस बारे में भारत के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कुछ दिशा-निदेश जारी किए हैं. राजधानी दिल्ली में एक बुज़ुर्ग महिला की COVID-19 के कारण मृत्यु होने के बाद लोगों में यह भ्रम देखने को मिला था कि उनके शव के अंतिम संस्कार से भी संक्रमण फैल सकता है.

इस घटना के बाद दिल्ली के स्वास्थ्य विभाग ने यह दावा किया कि शव के अंतिम संस्कार से कोरोना वायरस नहीं फैलता और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के दख़ल के बाद चिकित्सकों की एक टीम की निगरानी में महिला का अंतिम संस्कार किया गया था. इस पूरे मामले को देखते हुए ही भारत सरकार ने नेशनल सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल (एनसीडीसी) की मदद से ये दिशा-निदेश तैयार किए हैं.

18 मार्च 2020 को प्रेस से बात करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने एनसीडीसी के हवाले से कहा कि ‘जिस तरह की गाइडलाइंस निपाह वायरस के संक्रमण के समय जारी की गई थीं, COVID-19 के लिए उन्हीं में कुछ बदलाव किए गए हैं.

अधिकारी ने कहा कि चूंकि COVID-19 एक नई बीमारी है और वैज्ञानिकों के पास फ़िलहाल इसकी सीमित समझ है. इसलिए महामारियों से संबंधित जो समझ अब तक हमारे पास है, उसी के आधार पर ये गाइडलाइंस तैयार की गई हैं.’

क्या हैं गाइडलाइंस

1- दिशा-निर्देश में इस बात पर बहुत ज़ोर दिया गया है कि COVID-19 हवा से नहीं फैलता बल्कि बारीक कणों के ज़रिए फैलता है.

2- मेडिकल स्टाफ़ से कहा गया है कि वो COVID-19 के संक्रमण से मरे व्यक्ति के शव को वॉर्ड या आइसोलेशन रूम से नीचे लिखी गईं सावधानियों के साथ ही शिफ़्ट करें

3- शव को हटाते समय पीपीई का प्रयोग करें. पीपीई एक तरह का ‘मेडिकल सूट’ है जिसमें मेडिकल स्टाफ़ को बड़ा चश्मा, एन95 मास्क, दस्ताने और ऐसा एप्रन पहनने का परामर्श दिया जाता है जिसके भीतर पानी ना जा सके.

4- मरीज़ के शरीर में लगीं सभी ट्यूब बड़ी सावधानी से हटाई जाएं. शव के किसी हिस्से में घाव हो या ख़ून के रिसाव की आशंका हो तो उसे ढका जाए.

5- मेडिकल स्टाफ़ यह सुनिश्चित करे कि शव से किसी तरह का तरल पदार्थ ना रिसे.

6- शव को प्लास्टिक के लीक-प्रूफ़ बैग में रखा जाए. उस बैग को एक प्रतिशत हाइपोक्लोराइट की मदद से कीटाणुरहित बनाया जाए. इसके बाद ही शव को परिवार द्वारा दी गई सफेद चादर में लपेटा जाए.

7- केवल परिवार के लोगों को ही COVID-19 के संक्रमण से मरे व्यक्ति का शव दिया जाए.

8- कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति के इलाज में इस्तेमाल हुईं ट्यूब और अन्य मेडिकल उपकरण, शव को ले जाने में इस्तेमाल हुए बैग और चादरें, सभी को नष्ट करना ज़रूरी है.

9- मेडिकल स्टाफ़ को यह दिशा-निर्देश मिले हैं वे मृतक के परिवार को भी ज़रूरी जानकारियां दें और उनकी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए काम करें.

शवगृह से जुड़ी गाइडलाइंस

1- भारत सरकार के अनुसार COVID-19 से संक्रमित शव को ऐसे चेंबर में रखा जाए जिसका तापमान क़रीब चार डिग्री सेल्सियस हो.

2- शवगृह को साफ़ रखा जाए और फ़र्श पर तरल पदार्थ ना हो.

3- COVID-19 से संक्रमित शव की एम्बामिंग पर रोक है. यानी मौत के बाद शव को सुरक्षित रखने के लिए उस पर कोई लेप नहीं लगाया जा सकता.

4- कहा गया है कि ऐसे व्यक्ति की ऑटोप्सी यानी शव-परीक्षा भी बहुत ज़रूरी होने पर ही की जाए.

5- शवगृह से COVID-19 संक्रमित शव निकाले जाने के बाद सभी दरवाज़े, फ़र्श और ट्रॉली सोडियम हाइपोक्लोराइट से साफ़ किए जाएं.

शव को ले जाने वालों के लिए गाइडलाइंस

1- सही तरीक़े से, यानी प्लास्टिक बैग और चादर में बंद किए गए शव से उसे ले जाने वालों को कोई ख़तरा नहीं है.

2- लेकिन जिस वाहन को ऐसा शव ले जाने के लिए इस्तेमाल किया जाए, उसे भी रोगाणुओं से मुक्त करने वाले द्रव्य से साफ़ करना ज़रूरी है.

अंत्येष्टि या दफ़्न करने से संबंधित गाइडलाइंस

1- अंतिम संस्कार की जगह और क़ब्रिस्तान को संवेदनशील जगह मानें. भीड़ को जमा ना होने दें ताकि कोरोना वायरस के ख़तरे को कम रखा जा सके.

2- परिवार के अनुरोध पर मेडिकल स्टाफ़ के लोग अंतिम दर्शन के लिए मृतक का चेहरा प्लास्टिक बैग खोलकर दिखा सकते हैं, पर इसके लिए भी सारी सावधानियां बरती जाएं.

3- अंतिम संस्कार से जुड़ीं सिर्फ़ उन्हीं धार्मिक क्रियाओं की अनुमति होगी जिनमें शव को छुआ ना जाता हो

4- शव को नहलाने, चूमने, गले लगाने या उसके क़रीब जाने की अनुमति नहीं होगी.

5- शव दहन से उठने वाली राख से कोई ख़तरा नहीं है. अंतिम क्रियाओं के लिए मानव-भस्म को एकत्र करने में कोई ख़तरा नहीं है.

कोरोना संक्रमित व्यक्ति की मौत के बाद की प्रक्रिया पर केन्द्र सरकार की एक स्पष्ट गाइडलाइन है, फिर भी रांची प्रशासन बार-बार भीड़ के सामने क्यों बेबस नजर आया? झारखंड सरकार के एक भी मंत्री ने कोरोना संक्रमण के बारे में फैले हुए झूठे अफवाह से आक्रोशित जनता को समझाने का प्रयास क्यों नहीं किया? प्रशासन की हर अगली योजना के बारे में मोहल्ले वाले कैसे अवगत होते रहे? वे कौन लोग थे, जो जनता को लाश नहीं दफनाने को लेकर उकसा रहे थे? आखिर कोरोना से संक्रमित व्यक्ति की मृत्यु के बाद की गाइडलाइन को लेकर अबतक जनता को जागरूक क्यों नहीं किया गया है? ऐसे कई सवाल हैं, जो झारखंड सरकार को कठघरे में खड़ा करते हैं.

लाश को दफनाने को लेकर देर रात तक चले इस घटनाक्रम ने इंसानियत को तो तार-तार किया ही, साथ में आने वाले समय की भयावहता को लेकर भी लोगों को सोचने को मजबूर कर दिया है. कुछ लोग सोशल साइट्स पर इस विरोध प्रदर्शन को उचित ठहराने लगे और कोरोना संक्रमित शव को इलेक्ट्रिक शवदावगृह में जलाने की वकालत भी करने लगे. इसके पीछे यह तर्क दिया जाने लगा कि साइन्टिफिक तरीके से यही सही है. लेकिन जब ऐसे लोगों से कोरोना संक्रमित शव के बारे में डब्ल्यूएचओ या किसी स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन मांगी गयी, तो जवाब नहीं दिया. रांची स्थित ‘श्री महावीर मंडल डोरंडा केन्द्रीय समिति के अध्यक्ष संजय पोद्दार व मंत्री पप्पू वर्मा ने तो उपायुक्त को आवेदन देकर किसी भी कोरोना संक्रमित शव की अंत्येष्टि शहर से बाहर करने की ही मांग कर डाली.


 

रूपेश कुमार सिंह

(रूपेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं)


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