अखिलेश के क्षेत्र में कांग्रेस ने जीता ‘दलित संघर्ष’ का मोर्चा, प्रियंका मथेंगी यूपी!


तो क्या माना जाये कि कांग्रेस आगामी चुनाव में पूरी जान लगाने को तैयार है। तैयारियाँ तो यही बताती हैं लेकिन हमेशा ‘राष्ट्रीय’ नेताओं का आदी रहा उत्तर प्रदेश का कांग्रेसी सीधे प्रियंका गाँधी के नेतृत्व में युद्ध में उतरना चाहता है। उसके जोश को नयी ऊँचाई देने के लिए यह सबसे ज़रूरी चीज़ लगती है। क्या प्रियंका उसकी यह माँग पूरी करेंगी जबकि जीत की गारंटी नहीं है, सियासी गलियारों में इसका जवाब खोजा जा रहा है।


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आज लखनऊ से प्रकाशित होने वाले तमाम बड़े अख़बारों के पहले पन्ने से वह ख़बर नदारद है जिसने यूपी की हलचलों पर बारीक़ नज़र रखने वाले सियासी पंडितों के कान खड़े कर दिये हैं। दरअस्ल ‘बाइस में साइकिल’ की हवा पर सवार पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के संसदीय क्षेत्र, आज़मगढ़ में कांग्रेस ने दलित उत्पीड़न के मुद्दे पर एक अहम लड़ाई लड़ी और एक हद तक जीत भी ली। आज़मगढ़ में 12 जुलाई को पार्टी की ओर से ‘दलित पंचायत’ आयोजित की गयी जिसमें पंजाब और महाराष्ट्र के मंत्री समेत दलित समाज से ताल्लुक रखने वाले कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे। जबकि इस मुद्दे पर अखिलेश या उनकी पार्टी की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गयी। इसी के साथ 16 जुलाई से पार्टी प्रभारी प्रियंका गाँधी के यूपी प्रवास की भी ख़बर है।

ज़ाहिर है, यूपी चुनाव क़रीब आ रहा है तो राजनीतिक दल तैयारी में जुट गये हैं। लेकिन जहाँ सपा-बसपा की तैयारियाँ पारंपरिक ढंग से जाति-धर्म के गुणा-भाग पर आधारित हैं वहीं कांग्रेस ज़मीनी मुद्दों पर लगातार संघर्ष करती नज़र आ रही है। 12 जुलाई को प्रदेश के हर ज़िले में पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ते दाम और महँगाई के ख़िलाफ़ पार्टी की ओर से ज़ोरदार प्रदर्शन हुए जिसमें लंबे समय से सुस्त पड़े कार्यकर्ता भी सड़क पर दिखे। यह अलग बात है कि मीडिया ने इसको भी राज्य स्तरीय ख़बर नहीं माना और न वैसी तरजीह दी, लेकिन ज़मीन पर खड़े लोगों को कांग्रेस के नारे और तिरंगे का नया दौर साफ़ दिखा।

बहरहाल, बात आज़मगढ़ की जो एक नयी परिघटना के तौर पर कांग्रेस की कहानी में नये पन्ने जोड़ गयी। दरअसल, 29 जून को आज़मगढ़ के रौनापार थाने के पलिया गांव में पुलिस ने कई दलितों के घर तोड़ दिया था। आमतौर पर योगी की पुलिस के ऐसे कारनामों पर चुप्पी रहती है या फिर बयानबाज़ी तक मामला सीमित रहता है। लेकिन कांग्रेस ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया। कांग्रेस के प्रदेश संगठन सचिव अनिल यादव के साथ-साथ प्रदेश सचिव संतोष कटाई, यूथ कांग्रेस जिला अध्यक्ष अमर बहादुर यादव, एनएसयूआई सचिव मंजीत यादव और विशाल दुबे ने उपवास सत्याग्रह शुरू कर दिया।

अखिलेश यादव के संसदीय क्षेत्र में हुई दलित उत्पीड़न की इस घटना पर उम्मीद की जा रही थी कि वे पीड़ितों से मिलेंगे, कुछ करेंगे, लेकिन उनकी ओर से कोई पहल नहीं हुई। ऐसे में कांग्रेस नेताओं का भूख हड़ताल पर बैठना चर्चा का विषय बन गया। ख़ासतौर पर जाति ही जाति के मुद्दे उठाने वालों के दौर से जूझ रही यूपी की राजनीति में दलितों के मुद्दे पर सभी वर्गों का सक्रिय होना और उवपास का नेतृत्व किसी यादव द्वारा किया जाना भी चर्चा में रहा। दलित उत्पीड़न के मुद्दों पर दलितों का वोटबैंक रखने का दावा करने वाली मायावती और बीएसपी की चुप्पी तो किसी को अब चौंकाती भी नहीं। दलित भी उनसे संघर्ष की उम्मीद छोड़ चुके हैं, ख़ासतौर पर मोदी-योगी राज में।

आज़मगढ़ में दलित उत्पीड़न को मुद्दा बनाने के कांग्रेस की कोशिश का असर ये रहा कि उत्पीड़न पुलिस क्षेत्राधिकारी हटाया गया और प्रशासन बैकफुट पर नज़र आया। कांग्रेस ने बड़ा संदेश देने के लिहाज़ से 12 जुलाई को ‘दलित पंचायत’ आयोजित की जिसमें महाराष्ट्र के चर्चित दलित नेता और ऊर्जा मंत्री नितिन राउत, पंजाब सरकार के कैबिनेट मंत्री राजकुमार वैरका और बड़े दलित नेता और पूर्व सांसद उदित राज भी शामिल हुए। इन नेताओं ने उपवास सत्याग्रह पर बैठे नेताओं को जूस पिलाकर अनशन समाप्त कराया। यह अनशन छह दिन चला।

दलित पंचायत को संबोधित करते हुए नितिन राउत ने कहा कि यह कांग्रेस पार्टी के आंदोलन की जीत है कि पलिया में दलित परिवार की कुछ मांगे जिला प्रशासन ने पूरी कर दी है। अभी इस लड़ाई को और व्यापक बनाना है। उदित राज ने कहा कि दलित समाज कांग्रेस के झंडे के नीचे लामबंद होंगे। कांग्रेस ने दलितों के लिए जितना किया, किसी ने नहीं किया है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने कहा कि कांग्रेस पार्टी हर लड़ाई लड़ने को तैयार है। पूरे प्रदेश में दलितों पिछड़ों की लड़ाई को मजबूत किया जाएगा। वहीं उपवास का नेतृत्व करने वाले प्रदेश संगठन सचिव अनिल यादव ने कहा कि 6 दिन नहीं 60 दिन की भी भूख हड़ताल करनी होती तो करता, हमारे लिए यह लड़ाई स्वाभिमान की है। आज़मगढ़ को सपा ने चारागाह बना दिया। अब यह नहीं चलेगा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस जल्द ही आज़मगढ़ से दलित स्वभिमान यात्रा निकालेगी।

बहरहाल, कांग्रेस की यह पहलक़दमी कोई अलग-थलग घटना नहीं है। सियासी पंडित वोट के लिहाज़ से कांग्रेस को काफ़ी कमज़ोर मान रहे हैं, लेकिन यह स्वीकार कर रहे हैं कि प्रियंका गाँधी के यूपी प्रभारी बनने के बाद पार्टी संघर्ष के नये मोड में है जिसकी तुलना उस कांग्रेस से नहीं की जा सकती जिसके नेताओं को सत्ता विरासत में मिली थी। नयी कांग्रेस बनाने के लिए तो ज़मीन पर संघर्ष करना होगा जो दिख रहा है। चाहे कोरोना की पहली लहर के समय हुए पलायन का मुद्दा हो या फिर किसानों का, या फिर दलित वंचित समाज के उत्पीड़न का। पार्टी हर समय संघर्ष की मुद्रा में रही और प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू तो जेल जाने का रिकॉर्ड ही बना रहे हैं।

इसी परिप्रेक्ष्य में प्रियंका गाँधी का 16 जुलाई को लखनऊ पहुँचना भी देखा जा रहा है। ख़बर है कि वे दो-तीन दिन लखनऊ में रहेंगी और कार्यकर्ताओं और संगठन पदाधिकारियों से मिलेंगी। हाल ही में प्रदेश में क्षेत्रवार प्रशिक्षण शिविर आयोजित हुए जिसमें प्रियंका ने ऑनलाइन संबोधन किया था। इन प्रशिक्षण शिविरों के बाद निकली प्रभात फेरियाँ कभी चर्चा में रहीं थीं। ख़ास बात यह भी है कि वे लखनऊ में दीपा कौल के घर में ठहरेंगी जो काफ़ी दिनों से उनके इंतज़ार में है। पार्टी की ओर से उनके स्वागत की ज़ोरदार तैयारियाँ की जा रही हैं। उन्हें जुलूस की शक्ल में एयरपोर्ट से पार्टी मुख्यालय लाया जायेगा।

तो क्या माना जाये कि कांग्रेस आगामी चुनाव में पूरी जान लगाने को तैयार है। तैयारियाँ तो यही बताती हैं लेकिन हमेशा ‘राष्ट्रीय’ नेताओं का आदी रहा उत्तर प्रदेश का कांग्रेसी सीधे प्रियंका गाँधी के नेतृत्व में युद्ध में उतरना चाहता है। उसके जोश को नयी ऊँचाई देने के लिए यह सबसे ज़रूरी चीज़ लगती है। क्या प्रियंका उसकी यह माँग पूरी करेंगी जबकि जीत की गारंटी नहीं है, सियासी गलियारों में इसका जवाब खोजा जा रहा है।

 


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