केदारनाथ सिंह: विदा हुआ मानवाधिकारवादी कविता का सिरमौर!

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हिंदी के बेहद महत्वपूर्ण कवि केदारनाथ सिंह का 19 मार्च की शाम निधन हो गया। वे काफ़ी दिनों से बीमार थे और दिल्ली के एम्स में उनका इलाज चल रहा था। बलिया ज़िले के चकिया गाँव में 1934 में जन्मे केदारनाथ सिंह ने शुरुआत गीतों से की थी और पडरौना के एक कॉलेज में प्राचार्य थे। बाद मे वे जेएनयू आ गए और लोकप्रिय शिक्षक और यशस्वी कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। 2013 में उन्हें ज्ञानपीठ सम्मान से विभूषित किया गया था। हम श्रद्धांजलि स्वरूप उनके तीन छात्रों के संस्मरण प्रकाशित कर रहे हैं। जगदीश्वर चतुर्वेदी 1980 के आस पास तो पंकज चतुर्वेदी और संजय जोशी नब्बे के दशक की शुरुआत में उनके छात्र थे- संपादक

 

मानवाधिकारवादी कविता के सिरमौर

 

गुरूवर केदारनाथ सिंह की मृत्यु मेरी निजी और सामाजिक क्षति है ‌। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा और उससे सारी जिंदगी बहुत बड़ी मदद मिली।मसलन्,उनका अपने छात्रों के प्रति समानतावादी नजरिया और कक्षा को गंभीर अकादमिक व्यवहार के रुप में देखने की दृष्टि उनसे मिली। यह निर्विवाद सत्य है कि कविता पढ़ाने वाला उनसे बेहतरीन शिक्षक हिंदी में नहीं हुआ।एक मर्तबा नामवर सिंह जी ने एमए द्वितीय सेमेस्टर में कक्षा में कविता पर बातें करते हमलोगों से पूछा कि आपको कौन शिक्षक कविता पढ़ाने के लिहाज से बेहतरीन लगता है,कक्षा में इस पर अनेक छात्रों ने नामवर जी को श्रेष्ठ शिक्षक माना, मैंने तेज स्वर में इसका प्रतिवाद किया और कहा कि केदारजी अद्वितीय काव्य शिक्षक हैं। इस पर मैंने तीन तर्क रखे,संयोग की बात थी कि गुरूवर नामवर जी मेरे तीनों तर्कों से सहमत थे और यह बात केदारजी को पता चली तो उन्होंने बुलाया और कॉफी पिलाई और पूछा नामवर जी के सामने मेरी इतनी प्रशंसा क्यों की ? मैंने कहा कि छात्र लोग चाटुकारिता कर रहे थे, वे गुरु प्रशंसा और काव्यालोचना का अंतर नहीं जानते, वे मात्र काव्य व्याख्या को समीक्षा समझते हैं,मैंने इन सबका प्रतिवाद किया था। इसी प्रसंग में यह बात कही कि आपकी काव्यालोचना छात्रों में कविता पढ़ने की ललक पैदा करती है। इसके विपरीत अध्यापकीय समालोचना काव्यबोध ही नष्ट कर देती है।
केदारजी का सबसे मूल्यवान गुण था उनके अंदर का मानवाधिकार विवेक, कविता और मानवाधिकार के जटिल संबंध की जितनी बारीक समझ उनके यहां मिलती है वह हिंदी में विरल है। उल्लेखनीय है हिंदी काव्य में कई काव्य परंपराएं हैं,मसलन्, प्रगतिशील काव्यधारा, शीतयुद्धीय काव्य धारा,अति-वाम काव्य धारा, जनवादी काव्य धारा, आधुनिकतावादी काव्य धारा आदि। इन सब काव्य धाराओं में मानवाधिकार की समग्र समझ का अभाव है। यही वजह है कि केदारजी उपरोक्त किसी भी काव्यधारा से अपने को नहीं जोड़ते।
हिंदी में लोकतंत्र के प्रति तदर्थवादी नजरिए से काफी कविता लिखी गयी है लेकिन गंभीरता से मानवाधिकारवादी नजरिए से बहुत कम कविता लिखी गयी है। यही बात उनको लोकतंत्र का सबसे बड़ा कवि बनाती है।यही वह बुनियाद है जहां से केदारनाथ सिंह के समग्र कवि व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
शीतयुद्धीय राजनीति , समाजवाद के आग्रहों और आधुनिकता के दवाबों से मुक्त होकर लोकतंत्र की आकांक्षाओं , मूल्यों और मानवाधिकारों से कविता को जोड़ना बडा काम है। वे हिंदी के कवियों में से एक कवि नहीं हैं,बल्कि वे मानवाधिकारवादी कविता के सिरमौर हैं। आज के दौर में उनका जाना मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आंदोलन की सबसे बड़ी क्षति है।

.जगदीश्वर चतुर्वेदी

 

कम शब्दों में महान कथन 

कुछ कवि इतने मूल्यवान् होते हैं कि उनका जाना सिर्फ़ शोक-संविग्न नहीं करता, बल्कि दहशत भी पैदा करता है. उनका न रहना किसी एक भाषाई समाज की नहीं, समूची मानव-सभ्यता की क्षति होती है. मशहूर कवि केदारनाथ सिंह की विदाई ऐसी ही है. बिरले कवि होते हैं, जो बहुत कम शब्दों में महान कथन संभव करते हैं, जिनके चिंतन में ज़िंदगी का सारभूत सच समाहित रहता है और जो सहजतम ढंग से मनुष्यता को उसके उदात्त लक्ष्यों की पहचान कराते हैं. इन विशेषताओं की बदौलत केदारनाथ सिंह की कविताएँ मुहावरों की तरह लोकप्रिय हुईं और जाने कितनी पीढ़ियों की ज़बान पर रहती आयी हैं.

उनकी कविता में बराबर प्रेम को मौजूदा समय में असंभव बना दिये जाने के यथार्थ से जनमी एक उदासी अन्तःसलिल है. यह लिखकर उन्होंने हमारी सभ्यता की केंद्रीय विडम्बना की शिनाख्त की थी कि ”…..सच तो यह है कि यहाँ / या कहीं भी फ़र्क़ नहीं पड़ता / तुमने जहाँ लिखा है ‘प्यार’ / वहाँ लिख दो ‘सड़क’ / फ़र्क़ नहीं पड़ता / मेरे युग का मुहाविरा है / फ़र्क़ नहीं पड़ता.” उनकी शायद सबसे अच्छी कविताएँ प्रेम के संदर्भ में indifference या बेज़ारी के इसी रवैये से चुपचाप जूझते रहने की उनकी फ़ितरत का नतीजा हैं. मसलन ‘हाथ’ :

”उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए.”

इसीलिए अपने प्रिय के जाने से अधिक स्तब्ध और विचलित करनेवाली जीवन की कोई घटना नहीं हो सकती, इस सच को जितने सांद्र और ख़ूबसूरत ढंग से केदारनाथ सिंह ने बयान किया, आधुनिक कविता में वह बेमिसाल है :

”मैं जा रही हूँ—उसने कहा
जाओ—मैंने उत्तर दिया
यह जानते हुए कि जाना
हिंदी की सबसे ख़ौफ़नाक क्रिया है.”

.पंकज चतुर्वेदी

 

 

स्टार गुरु

 

मैंने 1989 के जुलाई महीने में जे एन यू के भारतीय भाषा विभाग के हिंदी विषय में एडमिशन लिया. कोर्स एम ए का था. इससे पहले मैं इलाहाबाद में गधा पचीसी के 23 साल बिता चुका था पूरब के तथाकथित ऑक्सफ़ोर्ड से काफ़ी अच्छी तरह से ऊब चुका था. जे एन यू के हिंदी विभाग में एडमिशन के लिए कोशिश का बड़ा आकर्षण नामवर जी, केदार नाथ सिंह और मैनेजर पाण्डेय थे जो न सिर्फ़ भारतीय भाषा केंद्र के आकर्षण थे बल्कि समाज विज्ञान, इतिहास और विज्ञान के छात्र –छात्राएँ भी अक्सर हमारी कक्षाओं में पाए जाते. इलाहाबाद की रटंत प्रैक्टिस की सालाना परीक्षाओं के विपरीत जे एन यू में बहुत मौज थी. सेमेस्टर शुरू होते ही टर्म पेपर, सेमीनार पेपर और फिर एंड सेमेस्टर का सिलसिला शुरू हो जाता जो रटंत प्रैक्टिस की तुलना में ज्यादा रोचक था और परीक्षा के भूत से हमें एकदम दूर रखता.

1989 के सत्र का पहला सेमेस्टर जे एन यू के नीचे वाले कैम्पस में ही चला जिसका लोकप्रिय नाम डाउन कैम्पस था. डाउन कैम्पस में घुसते ही बायें हाथ की तरफ़ हमारा हाल था जिसमे एम ए की कक्षाएँ चलती थीं. पहले ही सेमेस्टर में केदार जी हमारे निर्विवाद स्टार हो गए. अक्सर उनकी कक्षा के लिए लेट लतीफ़ रहने वाले विद्यार्थी भी समय से पहले पहुँच जाते. कुछ –कुछ यही रूतबा नामवर जी और मैनेजर जी का भी था. नामवर जी साहित्य के बहाने दुनिया की सैर कराते और मैनेजर जी अपनी मजेदार टिप्पणियों से सबको खूब आनंदित करते. केदार जी का रुतबा लेकिन अपने तीनों सहकर्मियों में सबसे अलहदा था. नामवर जी उत्तर पुस्तिका देते समय अक्सर यह कहके हमारे प्रतिरोध को स्वर न बनने देते कि ‘आप सबको एक ग्रेड मैंने पहले ही ज्यादा दिए हैं इसलिए कोई शिकायत न करें’. मैनेजर जी समय सीमा का पालन न होने पर ठीक –ठाक त्रीवता के साथ कुपित होते और कई बार उत्तर पुस्तिका को हवा में फेंक भी देते. केदार जी ने शायद ही कभी किसी तरह के नियमों का पालन किया. वे किसी कविता की व्याख्या करते ओडिसी के महान गुरु केलुचरण महापात्र की तरह अपने दाहिने हाथ की अँगुलियों से नृत्य की मुद्राओं का सृजन करते और फिर उनकी आवाज भी धीमी हो जाती.

1990 में दूसरे सेमेस्टर से ही हमारा विभाग भी न्यू कैम्पस में आ गया. अब हम सारे विभागों के साथ थे और इस तरह जे एन यू की हलचल से पूरी तरह वाकिफ़. लेकिन ऊपर आना हमारी हिंदी की कक्षा के लिए बहुत घातक साबित हुआ. असल में डाउन कैम्पस वाले हाल में एक बड़ी खिड़की भी थी जिसका उपयोग यदा –कदा हम ऊबाऊ कक्षाओं से मुक्ति पाने के लिए करते और बाहर स्थित जॉर्ज के ढाबे में केले के शेक से मन बहलाते. अब हमारी मुक्ति का रास्ता बंद हो गया लेकिन दूसरा फ़ायदा यह हुआ कि विशेष कक्षाओं के रूप में अब हमें केदार जी की क्लास मिल गयी. केदार जी स्पेशल पेपर के रूप में हमें निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ पढ़ाने लग गए. यह एक बेहद छोटी क्लास थी जिसमे बमुश्किल आठ छात्र –छात्राएं होते थे. अब पूरे सेमेस्टर केदार जी की अभिनव मुद्राओं से हम रोमांचित होते रहे.

एम ए करने के बाद मैंने जे एन यू छोड़कर जामिया मिलिया इस्लामिया के मास कम्युनिकेशन में प्रवेश लिया इस कारण केदार जी के जादू से वंचित होता गया लेकिन स्मृति के आधार पर कम से कम दो व्यक्तियों को जानता हूँ जो केदार जी से इस कदर प्रभावित थे कि लगभग उन्हीं की तरह रचनायें करते. अच्छी बात यह है कि इन दोनों व्यक्तियों ने बाद में अपना अलग काव्य व्यक्तित्व निर्मित किया.

तपती दुपहरी में जब जे एन यू में खूब जमकर अमलतास खिलता था केदार जी अचानक सलीक़े से पहने हुए कुर्ता –पजामे में पैदल चलते सड़क पार करते हुए अपनी ही किसी कविता के प्रभाव जैसे दिखते.

अपने स्टार गुरु को नमन.

.संजय जोशी

(संजय जोशी की टिप्पणी समकालीन जनमत से साभार)



 

 


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