अदालत में ताजमहल – हाईकोर्ट की डांट – ताजमहल पर पीएचडी कीजिए, कोई रोके तो हमारे पास आएं!

मयंक सक्सेना मयंक सक्सेना
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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में ताजमहल को लेकर दायर याचिका पर चल रही सुनवाई में माननीय हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को तंज़ भरी फटकार लगाई है। अदालत ने याचिकाकर्ता को अपना मक़सद साफ़ करने के साथ ही ये भी कह दिया कि आपको अगर इस बात पर शक़ है कि ताजमहल, मुग़ल बादशाह शाहजहां ने नहीं बनवाया तो आप इसके शोध के लिए एमए करें, फिर पीएचडी करें…

क्या है ये याचिका?

दरअसल यह याचिका ताजमहल में बंद पड़े 22 कमरों को खोलने की मांग को लेकर दायर की गई है। इसे बीजेपी नेता रजनीश सिंह ने दायर किया और मांग की, कि अदालत आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) को ये कमरे खोलने का आदेश दे। रजनीश सिंह का कहना है कि वहां हिंदू मूर्तियों और शास्त्रों के अस्तित्व का पता लग सकता है।

क्या हुआ अदालत में?

अदालत में आज इसकी सुनवाई की शुरुआत से ही जस्टिस डीके उपाध्याय और सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने याचिकाकर्ताओं से कड़े सवाल किए। याचिकाकर्ता डॉ. रजनीश सिंह के वकील ने अदालत से कहा कि एक ऐसा सच है, जो ताजमहल के बारे में देश के नागरिक जानना चाहते हैं। इसके आगे याचिकाकर्ता ने कहा, “मैंने कई सारी आरटीआई याचिकाएं दाखिल की। मुझे बताया गया कि कई सारे कमरे हैं, जो कि बंद कर के रखे गए हैं और प्राधिकरण ने कहा कि वे कमरे, सुरक्षा कारणों से बंद रखे गए हैं। अगर ताजमहल के अंदर कई सारी छुपी चीज़ें हैं, तो वे जनता के सामने होनी चाहिए।” इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि उन्होंने औरंगज़ेब का एक पत्र देखा है, जो उसने अपने पिता के नाम लिखा था।

इस पर उत्तर प्रदेश सरकार के वकील ने कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता के पास अपील का अधिकार नहीं है, ये उनके न्यायिक अधिकार-क्षेत्र से बाहर का मामला है। इस पर पहले ही आगरा में एक मामला चल रहा है।

इस पर याचिकाकर्ता ने जवाब दिया कि वे इस बारे में बात ही नहीं कर रहे हैं कि वह भूमि ‘भगवान शिव की है या फिर अल्लाह ओ अक़बर की’…वे तो उन कमरों की बात कर रहे हैं, जिनको बंद कर के रखा गया है और हम सबको ये जानने का हक़ है कि उनके अंदर क्या है? याचिकाकर्ता ने कहा कि उन्होंने एक लेख भी संलग्न किया है कि इस इमारत की वास्तविक उम्र क्या है, इमारतों की उम्र जांचने का एक वैज्ञानिक तरीका होता है।

इस पर अदालत ने कड़े शब्दों में याचिकाकर्ता से सवाल किया, “आप कहना चाहते हैं कि ये इमारत शाहजहां ने नहीं बनवाई? क्या हम इस पर फ़ैसला देने, यहां आए हैं कि ताजमहल किसने बनवाया या फिर उसकी उम्र क्या है? आप जिन ऐतेहासिक तथ्यों पर यक़ीन करते हैं, हमारे ऊपर उनको न थोपें” अदालत ने याचिकाकर्ता से कहा कि वे अपनी प्रार्थना स्पष्ट करें कि वे क्या एक जांच समिति बनवाने की अपील कर रहे हैं? क्या वे बंद कमरों को खुलवाने का आदेश चाहते हैं? और ये तब ही हो सकता है, जब किसी तरह से इसके न होने पर अधिकारों का उल्लंघन होता हो।

आपका अधिकार क्या है?

आगे अदालत ने कहा, “क्या इस तरह के मामलों का फ़ैसला अदालत में होगा? क्या हम जज, इसके लिए प्रशिक्षित हैं? हम इस पर फ़ैसला कैसे दे सकते हैं? और इसमें आपका अधिकार क्या है?”

इस पर याचिकाकर्ता ने कहा कि वे इस पर सूचना की आज़ादी के एक्ट के तहत अधिकार रखते हैं और अदालत ने पलट कर उनसे पूछा कि ये कौन सा एक्ट है?

अदालत ने सूचना के अधिकार एक्ट को परिभाषित करते हुए कहा, “सूचना के अधिकार के एक्ट के तहत, आपके पास सूचना पाने और अन्य कई उपचारों का अधिकार है। पर इसमें किसी विशेष तरह के शोध को करवाने का अधिकार कहां से आ गया?”
इस पर याचिकाकर्ता ने कहा कि इसी कारण से वे अदालत से जांच कमेटी बनाने का आदेश देने का अनुरोध कर रहे हैं। अदालत ने उनसे कहा, “प्रश्न से बचिए मत, ये बताइए कि ये आपका अधिकार कैसे है?”

याचिकाकर्ता: अगर हम को कोई ग़लत इतिहास पढ़ाया गया हो तो?

अदालत : ये आपका नज़रिए है। आप कह रहे हैं कि ये ग़लत है। क्या हम कह सकते हैं कि आप सही हैं और कोई और ग़लत है?

वकील राम प्रकाश शुक्ला: मैं आरटीआई एक्ट पढ़ रहा हूं।

अदालत: नहीं, हमने वो पढ़ा हुआ है।

याचितकाकर्ता: हमारे पास सूचना की आज़ादी है।

अदालत: आप किसी प्रकार का शोध चाहते हैं, ये सूचना के अधिकार से कैसे जुड़ा है? हम जानना चाहते हैं कि आप अपनी अपील को आरटीआई से जोड़ कर कैसे देख रहे हैं।

अदालत : आप किससे जानकारी मांग रहे हैं?

वकील : अथॉरिटीज़ से

अदालत : अगर उन्होंने कहा है कि कमरे सुरक्षा कारणों से बंद हैं, तो ये ही जानकारी है। अगर आप इससे संतुष्ट नहीं हैं, तो इसे चुनौती दें।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच

जाइए और जाकर पढ़ाई कीजिए!!

और इसके बाद अदालत ने बेहद सख़्ती से याचिकाकर्ता से कहा कि उनको अगर शोध की वाकई इतनी आवश्यकता लगती है तो उनको वो ख़ुद करना चाहिए।

अदालत: जाइए और शोध कीजिए। एमए की कीजिए, फिर नेट या जेआरएफ पास कीजिए, शोध के लिए, पीएचडी का ये विषय चुनिए और अगर कोई संस्थान आपको इस विषय पर शोध की अनुमति नहीं देता है, तो हमारे पास आइए।

याचिकाकर्ता के वकील : मैं एक फ़ैसला दिखा सकता हूं पर मुझे थोड़ा समय चाहिए।

अदालत : हम इस मामले को एडजर्न करने नहीं जा रहे।

इसके बाद अदालत की सुनवाई को 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया। 

 

 


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