न्यायपालिका की आज़ादी प्रभावित कर रही है सरकार! सुप्रीमकोर्ट के 8 पूर्व जजों ने चिंता जताई!

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मोदी सरकार ने जस्टिस के.एम.जोज़ेफ़ को सुप्रीम कोर्ट का जज होन से रोकने के लिए जो तर्क दिए हैं, उन्होंने इस विवाद का और गहरा दिया है। चार पूर्व मुख्य न्यायाधीशों समेत सुप्रीम कोर्ट के आठ पूर्व जजों ने सरकार के रुख़ को लेकर गहरी चिंता जताई है। पूर्व मुख्य न्यायधीश आर.एम.लोढ़ा ने कहा है कि सरकार न्यायपालिका की आज़ादी को प्रभावित कर रही है जबकि दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस ए.पी.शाह ने सवाल किया है कि क्या मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्र ने कॉलेजियम की सिफ़ारिशों को वापस भेजने के सरकार के अधिकारी की पैरवी करने से पहले कॉलेजियम से सलाह-मशविरा किया था।

सरकार की ओर से क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जस्टिस के.एम.जोज़ेफ़ को सुप्रीम कोर्ट का जज न बनाने को लेकर जो तर्क दिए हैं, उन्हें न्यायिक हलक़ों मे अचरज से देखा जा रहा है। इंडियन एक्सप्रेस में आज छपी वरिष्ठ पत्रकार सीमा चिश्ती की रिपोर्ट के मुताबिक पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आर.एम.लोढ़ा ने कहा है कि ” सरकार का कॉलेजियम की सिफ़ारिश को तोड़कर स्वीकार करना (एडवोकेट इंदू मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने की सिफ़ारिश मान लेना और जस्टिस के.एम.जोज़ेफ़ की नियुक्ति से इंकार करना) वास्तव मे न्यायपालिका की आज़ादी को प्रभावित करना है….इस मामले में चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्र को तत्तकाल कॉलेजियम की मीटिंग बुलानी चाहिए। सरकर के रुख का प्रतिवाद करना है, तो तुरंत किया जाए। न सरकार लंबे समय तक फ़ाइल दबा कर बैठ सकती है और न ही मुख्य न्यायधीश…यह स्थापित परंपरा है कि सरकार कॉलेजियम की सिफ़ारिश को पृथक नहीं कर सकती।”

2014 के घटनाक्रमों को याद करते हुए जस्टिस लोढ़ा ने कहा कि सरकार ने जजों की नियुक्ति को लेकर की गई कॉलेजियम की सिफ़ारिश में से एडवोकेट गोपाल सुब्रह्मण्यम की नियुक्ति को अलग कर दिया था जब वे देश से बाहर थे। लौटकर उन्होंने क़ानून मंत्री को सख़्त चिट्ठी लिखकर इसे ग़लत बताया था और भविष्य में ऐसा न करने की चेतावनी दी थी। बहरहाल, गोपाल सुब्रह्मण्यम ने अपना नाम ख़ुद ही वापस ले लिया और मामला ख़त्म हो गया।

जस्टिस लोढ़ा ने कहा कि सरकार के रुख़ से बहुत ग़लत संकेत जा रहा है। वरिष्ठता का मसला उठाना ग़लत है। यह सवाल पहले कभी नहीं उठा।

वहीं, पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टी.एस.ठाकुर ने इस पूरे मामले और जस्टिस जोज़ेफ़ का नाम वापस किए जाने  को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है।

इसके अलावा एक्सप्रेस ने दो अन्य पूर्व मुख्य न्यायाधीशों सहित छह और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जजों से  इस संबंध में से बात की। उन्होंने  अपना नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर बात की और इस पर गहरी चिंता जताई कि कॉलेजियम की सिफ़ारिशों को सरकार तीन महीने तक दबाए बैठे रही लेकिन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र ने इस सिलसिले में कोई बातचीत भी शुरू नहीं की।

वहीं,दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस ए.पी.शाह ने भी मौजूदा हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि ‘धीरे-धीरे सुप्रीकोर्ट की प्रधानता को कमज़ोर किया जा रहा है…मैं हैरान हूँ कि मुख्य न्यायाधीश ने खुली अदालत में कहा कि कॉलेजियम की सिफ़ारिश की फ़ाइल लौटाकर सरकार ने कुछ ग़लत नहीं किया। मुझे संदेह है कि ऐसा बयान देने के पहले उन्होंने कॉलेजियम के साथियों से विचार-विमर्श किया होगा।’

जस्टिस शाह ने साफ़ कहा -” इसका कारण (जस्टिफ़ जोज़ेफ़ की नियुक्ति की फ़ाइल रिजेक्ट होना) साफ़तौर पर केंद्र के ख़िलाफ़ उनका 2016 का फ़ैसला है (जिससे उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार को बरख़ास्त करने का फ़ैसला रद्द हुआ था)। तथाकथित वरिष्ठता को लेकर उठाए गए बिंदु प्रासंगिक नहीं हैं और वे इस पद के लिए बेहद उपयुक्त व्यक्ति हैं। जहाँ तक केरल के प्रतिनिधित्व का मसला है तो जस्टिस कुरियन जोज़ेफ़ ही अकेले जज है सुप्रीम कोर्ट में जो कुछ ही महीनों में रिटायर हो जाएँगे।”

जस्टिस शाह ने मुख्य नयायाधीश जस्टिस दीपक मिश्र की आलोचना करते हुए कहा कि न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में हो रहे इस अतिक्रमण के लिए वही ज़िम्मेदार हैं। वे इस मुद्दे पर एक मीटिंग तक नहीं बुला रहे हैं।

 

 



 


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