विकास दुबे केस: न्यायिक आयोग की जांच रिपोर्ट में पुलिस को क्लीन चिट

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कानपुर के कुख्यात बिकरू कांड की जाँच के लिए गठित न्यायिक आयोग ने पुलिस को क्लीन चिट दे दी है। आरोप था कि पुलिस ने आत्मसमर्पण कर चुके कुख्यात विकास दुबे को मुठभेड़ का नाटक रचकर मार डाला। आयोग के मुताबिक मुठभेड़ के फर्जी होने का कोई सबूत नहीं मिला है।  इस न्यायिक आयोग की स्थापना 2/3 जुलाई 2020 को बिकरू गाँव में आठ पुलिस कर्मियों की हत्या और उसके बाद पुलिस मुठभेड़ में इस हत्याकांड में शामिल आरोपियों के मारे जाने की घटनाओं की जाँच के लिए की गई थी। जांच आयोग की रिपोर्ट प्रदेश सरकार ने गुरुवार को विधानसभा में पेश कर दी है। जांच आयोग ने अपनी 132 पन्नों की जांच रिपोर्ट में पुलिस और न्यायिक सुधारों के संबंध में कई महत्वपूर्ण सिफारिशें भी की हैं। रिपोर्ट के साथ 665 पन्नों की तथ्यात्मक (factual) सामग्री भी राज्य सरकार को सौंपी गई है।

ऐसे हुआ था एनकाउंटर जिसमे घिरी थी पुलिस टीम..

विकास दुबे ने अपने गैंग से साथ मिल कर छापा मारने आये आठ पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी और फरार हो गया था। लेकिन सात दिन की तलाश के बाद मध्य प्रदेश के उज्जैन से गैंगस्टर को गिरफ्तार कर लिया गया था। विकास ने एक मंदिर में खुद आत्मसमर्पण किया था। मध्य प्रदेश के उज्जैन से कानपुर ले जाते समय विकास दुबे को ले जा रही कार पलट गई थी।  पुलिस का कहना था की कार पलटने का फायदा उठाकर विकास दुबे गाड़ी से उतरा, एसटीएफ के एक जवान से पिस्टल छीन ली और भागने का प्रयास किया। जिसके बाद पुलिस ने जवाबी फायरिंग की जिसमें विकास दुबे घायल हो गया। अस्पताल ले पर उसे मृत घोषित कर दिया गया। इस हादसे के बाद विपक्ष ने पुलिस टीम पर कई सवाल भी उठाए थे।

उस समय, पुलिस के बयान पर संदेह जताते हुए कांग्रेस ने  एनकाउंटर के पूरे प्रकरण में कई सवाल खड़े किए थे। कांग्रेस का कहना था की उत्तर प्रदेश एसटीएफ के काफिले में विकास दुबे को ले जा रही कार ही क्यों पलटी? कांग्रेस का कहना था कि उज्जैन में विकास दुबे ने आत्मसमर्पण किया था उसके बाद उसने भागने का प्रयास क्यों किया? उस समय इस एनकाउंटर पर काफी सवाल खड़े हुए थे जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी यूपी पुलिस पर परोक्ष रूप से हमला करते हुए कहा था की, “मृत लोग कोई कहानी नहीं बताते।” लेकिन अब इस मामले में पुलिस टीम को क्लीन चिट मिल गई है।

आयोग ने कहा कोई भी सबूतों का खंडन करने के लिए आगे नहीं आया..

विकास दुबे मुठभेड़ के सभी पहलुओं की जांच करने के बाद, आयोग ने कहा है कि जनता या मीडिया, कोई भी  पुलिस के पक्ष और घटना से संबंधित सबूतों का खंडन करने के लिए आगे नहीं आया।  मृतक विकास दुबे की पत्नी रिचा दुबे ने पुलिस मुठभेड़ में हुए एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए हलफनामा दिया था लेकिन वह आयोग के सामने पेश नहीं हुईं। ऐसे में घटना के संबंध में पुलिस के पक्ष पर संदेह नहीं किया जा सकता है। मजिस्ट्रेटी जांच में भी ऐसा ही खुलासा हुआ था।

पैनल ने की जांच की मांग..

एक साल से अधिक समय तक मामले की जांच करने के बाद, न्यायमूर्ति चौहान जांच आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि यूपी पुलिस के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। हालांकि, पैनल ने कहा है कि इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि दुबे और उनके गिरोह को स्थानीय पुलिस, राजस्व और प्रशासनिक अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त था, पैनल ने गैंगस्टर के साथ मिलीभगत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ जांच की सिफारिश की है।

न्यायिक रिपोर्ट में कही गई बातें..

  • सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज जस्टिस डॉ. बीएस चौहान की अध्यक्षता में गठित जांच आयोग ने 132 पन्नों की जांच रिपोर्ट में पुलिस और न्यायिक सुधारों के संबंध में कई बड़ी बाते कहीं हैं। रिर्पोट में कहा गया है की विकास दुबे और उनके गिरोह को स्थानीय पुलिस के अलावा जिले के राजस्व और प्रशासनिक अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त था। स्थानीय थाना और राजस्व के अधिकारी विकास गैंग के संपर्क में थे और उनसे तरह-तरह की सुविधाएं ले रहे थे। उनके संरक्षण में ही विकास फला-फूला, पुलिस और प्रशासन की उपेक्षा के कारण उनका वर्चस्व बढ़ता ही गया।
  • पुलिस ने सांप्रदायिक मामलों को निपटाने के लिए बनाई गई शांति समितियों में भी गिरोह के सदस्यों को शामिल कर रखा था।
  • संरक्षण के चलते विकास दुबे का नाम सर्कल के टॉप-10 अपराधियों की सूची में शामिल था लेकिन जिले के टॉप-10 अपराधियों की सूची में नहीं था। जबकि उनके खिलाफ 64 आपराधिक मामले दर्ज थे।
  • विकास दुबे के खिलाफ दर्ज मामलों की कभी निष्पक्ष जांच नहीं हुई। चार्जशीट से पहले ही गंभीर धाराओं को हटा दिया गया।
  • कोर्ट में सुनवाई के दौरान गवाह मुकरते रहे और विकास दुबे और उसके गिरोह के सदस्यों को आसानी से जमानत मिलती रही। राज्य सरकार ने कभी भी जमानत रद्द करने के लिए उच्च न्यायालयों में अपील तक नहीं की।

रिपोर्ट के हिसाब से देखें तो साफ है कि विकास पर प्रशासन का हाथ था। वहीं रिपोर्ट में न्यायिक सुधारों के संबंध में कई महत्वपूर्ण सिफारिशें भी की गई हैं। जिससे साफ होता है की अपराधों और अपराधियों को कही न कही पुलिस और प्रशासन से थी बढ़ावा मिलता है। जो भी हो पर अब एक साल बाद पुलिस टीम को क्लीन चिट मिल ही गई।

राज्य में अपराधियों, प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के बीच सांठगांठ: सपा

इस बीच समाजवादी पार्टी ने रिपोर्ट को लेकर बीजेपी सरकार पर हमला बोला है और आरोप लगाया है कि राज्य में अपराधियों, प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के बीच सांठगांठ है. समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अनुराग भदौरिया ने कहा है, ‘यूपी विधानसभा में पेश की गई रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि पुलिस अधिकारी विकास दुबे को छापेमारी के बारे में पहले ही बता देते थे. समाजवादी पार्टी का मानना ​​है कि राज्य में अपराधियों, प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों का बड़ा गठजोड़ है. सरकार सिर्फ कागजों पर गठजोड़ तोड़ पाई लेकिन हकीकत में यह गठजोड़ अब बड़ा हो गया है।