सुप्रीम कोर्ट: सरकारी आवास रिटायर्ड स्टाफ़ को बख्शीश देने के लिए नहीं

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सुप्रीम कोर्ट ने रिटायरमेंट के बाद भी सरकारी आवास ख़ाली न करने वाले अधिकारियों को तगड़ा दिया है। कोर्ट ने कहा है की सरकारी आवास केवल सर्विस में मौजूद स्टाफ के लिए है। सेवा समाप्त होने पर अधिकारी इसमें नही रह सकते हैं। यह आदेश कोर्ट ने कश्मीर मूल के और खुफिया विभाग से एक रिटायर्ड अधिकारी के सरकारी आवास खाली न करने पर सुनाया है।

आवास सेवारत स्टाफ़ के लिए नही..

अधिकारी पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट से सरकारी आवास में रहने के आदेश लाया था। उसका कहना था कि कश्मीर में स्थिति सामान्य होने के बाद लौटेगा। लेकिन केंद्र ने हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ अपील कर दी, सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया और कहा कि सरकारी आवास रिटायर्ड स्टाफ को परोपकार या बख्शीश में देने के लिए नहीं, यह आवास सेवारत स्टाफ के लिए है। एक राज्य से विस्थापित लोगों को उन लाखों नागरिकों से अधिक प्राथमिकता नहीं दी जा सकती जिनके सिर पर छत नहीं है। सरकारी आवास केवल थोड़े समय के लिए अस्थायी रूप से प्रदान किया जाता है।

आवास की व्यवस्था सरकार की जिम्मेदारी नहीं..

जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस ए.एस.बोपन्ना की पीठ ने 31 अक्तूबर तक रिटायर्ड अधिकारी को फरीदाबाद स्थित सरकारी आवास खाली कर उसका कब्जा सरकार को सौंपने को कहा है।

पीठ ने कहा, जम्मू-कश्मीर में विकट हालात हैं, लेकिन फिर भी सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वह आप के लिए सरकारी आवास की व्यवस्था करे। लोग सेवानिवृत्ति के सभी लाभों का आनंद लेते हैं। उन्हें ऐसी स्थिति में नहीं माना जा सकता, जिन्हें सरकार द्वारा हमेशा के लिए आवास मुहैया करवाए जाए।

सेवानिवृत्त अधिकारियों की रिपोर्ट 15 नवंबर तक दे केंद्र सरकार..

सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर सुनवाई करने हुए उन लोगों पर भी कार्रवाई को कहा जो रिटायर होकर भी सरकारी आवास में रह रहे है। कोर्ट ने कहा ऐसे सभी कर्मचारियों व अधिकारियों की रिपोर्ट 15 नवंबर तक केंद्र सरकार कोर्ट में पेश करे।

दरअसल, कश्मीर मूल का यह अधिकारी 2006 में रिटायर हो गया था। लेकिन उसने सेवा के दौरान मिला सरकारी निवास खाली नही किया। उसने अपने खुफिया विभाग में आवेदन कर एक साल और रहने देने का आग्रह किया था। जून 2007 में दूसरा आवेदन कर अधिकारी ने कहा कि उसे नाम मात्र के शुल्क पर सरकारी आवास में रहने दिया जाये।

उसका कहना था कि कश्मीर में हालात सामान्य होने तक वह वापस नहीं लौट सकता। उसे आवास खाली करने के नोटिस भेजे गए लेकिन जब उसने नोटिस का पालन नहीं किया तो इसे निकालने का निर्णय लिया गया। लेकिन वह दिल्ली की एक जिला अदालत से स्टे का आदेश ले आया। इसे दिल्ली अदालत के अधिकार क्षेत्र का मामला न मानते हुए विभाग ने आपत्ति जताई, तो व्यक्ति ने मामला दिल्ली से वापस लेकर फरीदाबाद अदालत में दायर किया। लेकिन मामला वहां भी खारिज हो गया था।


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