इलाहाबाद हाईकोर्ट से यूपी ‘लव जिहाद’ क़ानून के आरोपी को ज़मानत, कहा- राज्य के पास ठोस तर्क नहीं!

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उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश के तहत हिरासत में लिए गए एक व्यक्ति को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जमानत दे दी है। इस धर्म निषेध अध्यादेश को यूपी के ‘लव जिहाद’ अधिनियम के रूप में जाना जाता है।

विशेष न्यायाधीश SC/ST ने याचिका की थी ख़ारिज..

कोर्ट ने आरोपी को यह देखते हुए जमात दी है की शिकायतकर्ता / राज्य की ओर से जमानत न दिए जाने के संबंध में कोई भी पुख़्ता तर्क नहीं दिया गया था। आरोपी की जमानत याचिका इससे पहले विशेष न्यायाधीश एस.सी./एस.टी. ने खारिज कर दी थी। जिसके बाद उसने हाई कोर्ट के समक्ष धारा 14-ए (2) एससी / एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के तहत एक आपराधिक अपील दायर की थी। जिसपर सुनवाई करते हुए जस्टिस अरविंद कुमार मिश्रा की पीठ ने अपीलकर्ता/आरोपी मोतीराम की जमानत याचिका को मंजूरी दे दी।

आरोपी पर इन धाराओं के तहत मुक़दमा..

बता दें की आरोपी पर धारा – 342, 366, 384, 506 I.P.C,उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश एवं आईटी ऐक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। अपीलकर्ता ने यह दावा किया की उसका मामला उन अन्य सह-आरोपियों से एकदम अलग है। जो कथित तौर पर धर्म परिवर्तन की उस प्रक्रिया में सीधे तौर पर शामिल थे।

आवेदक की ओर कहा गया की उसके खिलाफ सिर्फ यही मामला था की जब पीड़िता का कथित रूप से धर्म परिवर्तन किया जा रहा था, तब वह मौके पर मौजूद था। सीआरपीसी की धारा-161 के तहत दर्ज पीड़िता के बयान में उसकि एकमात्र यही भूमिका बताई गई थी। आगे यह तर्क दिया गया कि अपीलकर्ता के खिलाफ इसके अलावा कोई भी ठोस सामग्री मौजूद नहीं थी। केवल पीड़िता के पड़ोसी होने के नाते, उसे इस मामले में दुश्मनी के कारण शामिल किया गया था।

एक भी तर्क नही जिससे जमानत अर्जी खारिज की जाए: HC

कोर्ट ने पूरे मामले को देखते हुए कहा “इस तरह की गई प्रतिद्वंद्वी प्रस्तुतियों पर विचार किया और उस आदेश सहित पूरे रिकॉर्ड को देखा है जिसके द्वारा अपीलकर्ता की जमानत याचिका खारिज कर दी गई।  राज्य की ओर से एक भी ऐसा तर्क नहीं है जिससे अपीलकर्ता की जमानत अर्जी खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा पारित आदेश को सही ठहराया जाए या उनके फैसले पर टिके रहा जाए” कोर्ट ने इस मामले के तथ्यों, परिस्थितियों और सबूतों को ध्यान में रखते हुए माना कि आरोपी की ज़मानत याचिका स्वीकार करने योग्य है।

क्या है विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश?

 उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश 2020 के तहत मिथ्या, झूठ, जबरन, प्रभाव दिखाकर, धमकाकर, लालच देकर, विवाह के नाम पर या धोखे से किया या कराया गया धर्म परिवर्तन अपराध की श्रेणी में आएगा। पिछले साल यूपी कैबिनेट की बैठक में इसे हरी झंडी दी गई थी।


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