आख़िरकार फ़र्ज़ी आरोपों के जंजाल से मुक्त हुए डॉ. कफ़ील खान, हाईकोर्ट ने दी राहत!

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डॉक्टर कफ़ील खान 2017 से आज तक चर्चा का विषय बने हुए हैं और इसका कारण यूपी सरकार द्वारा उनपर लगाए गए संगीन आरोप है। 2017 से अब तक इन आरोपों में वह जेल तो कई बार गए, लेकिन इसके बावजूद पूरी तरह दोषी साबित नहीं हुए। अब कफील को अदालत की तरफ से राहत मिल गई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ लंबित सभी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

इस मामले पर चल रही थी करवाई..

दिसंबर 2019 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में सीएए और एनआरसी विरोधी प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर भड़काऊ भाषण के ख़िलाफ़ यह केस दर्ज किया गया था, इस मामले में आपराधिक कार्यवाही लंबित थी। अब न्यायमूर्ति गौतम चौधरी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कथित भड़काऊ भाषण के बाद शुरू पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है।

इसी मामले में यूपी सरकार द्वारा डॉ. खान के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) भी लगाया गया था।  हालांकि, पिछले साल इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया था। बता दें की डॉ. खान के खिलाफ एक प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई थी और बाद में उन्हें अलीगढ़ में दिए गए भाषण के लिए गिरफ्तार कर लिया गया था।

गंभीर धाराओं के तहत दर्ज था मुकदमा..

उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 153 ए (धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) के तहत FIR दर्ज़ की गई थी। बाद में, धारा 153बी (आरोप, राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक दावे) और 505(2) (वर्गों के बीच शत्रुता, घृणा या दुर्भावना पैदा करने वाले बयान) को भी FIR में जोड़ा गया। इसके बाद, मार्च 2020 में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, अलीगढ़ की अदालत में उनके खिलाफ चार्जशीट दायर की गई था। अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, अलीगढ़ के संज्ञान आदेश को भी रद्द कर दिया।

इस वजह से रद्द किया गया है मुकदमा..

डॉ कफील के वकील ने कोर्ट को दलील दी थी कि चार्जशीट दाखिल करते वक़्त अनुमति नहीं ली गई थी। जबकि क्लास वन ऑफिसर के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने के पहले शासन से अनुमति लेना जरूरी है। डॉ. कफ़ील की तरफ से यह भी दलील दी गई कि उन्होंने कोई भड़काऊ भाषण नहीं दिया था, सिर्फ सामान्य बातें ही कही थीं। इसीलिए इस मामले को पूर्ण रूप से ख़त्म कर दिया है। कोर्ट ने कहा है इस मामले में जब तक अभियोजन पूर्व स्वीकृति नहीं लेंगे, तब तक यह मामला नहीं चलेगा। जिस आधार पर एनएसए को रद्द किया था, उसी आधार पर इसे भी रद्द कर दिया है।

बता दें, डॉ. कफील खान ने सरकार की अनुमति बगैर मुकदमा चलाने पर ही एफ़आईआर और एनएसए को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। याचिका में मुख्य रूप से तर्क दिया गया था कि उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने से पहले सरकार की पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी। जबकि सीआरपीसी की धारा 196 में अनुसार, आईपीसी की धारा 153 ए, 153 बी, 505 (2) के तहत अपराध का संज्ञान लेने से पहले, केंद्र सरकार , राज्य सरकार या ज़िला मजिस्ट्रेट से अभियोजन स्वीकृति की पूर्व अनुमति लेनी होती है। इस मामले को हाईकोर्ट ने निचली कोर्ट में वापस कर दिया है, और कहा है की अगर सरकार मुकदमा चलाने की स्वीकृति देती है तो निचली अदालत उस पर फैसला लेगी।

भड़काऊ भाषण के लिए ऐसे हुए थे गिरफ्तार..

  • भड़काऊ भाषण केस के आधार पर 29 जनवरी 2020 को डॉ कफ़ील ख़ान को यूपी एसटीएफ़ ने मुंबई से गिरफ़्तार किया था।
  • 10 फ़रवरी 2020 को अलीगढ़ की सीजेएम कोर्ट ने इस मामले में ज़मानत के आदेश दिए थे लेकिन डॉक्टर खान की रिहाई से पहले ही यूपी सरकार ने उन पर एनएसए लगा दिया गया। बता दें यूपी पुलिस की ओर से कफील खान को खिलाफ हिस्ट्रीशीट भी खोल दी गई थी।

2017 में सबसे पहले कफील का चर्चा में आने का कारण..

सबसे पहले डॉक्टर कफील उस समय चर्चा में आए थे, जब गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में प्रोफ़ेसर रहे डॉ कफ़ील को 2017 में ऑक्सीजन की कमी से हुई बच्चों की मौत का जिम्मेदार ठहराया गया था, और उन्हें निलंबित कर दिया गया था। हालांकि जांच के बाद डॉक्टर कफ़ील के अलावा उनके साथ ही निलंबित किए गए अन्य सभी अभियुक्तों को बहाल कर दिया गया है। इस मामले में डॉ. ख़ान को सितंबर 2017 में गिरफ़्तार किया गया। यह केस हाई कोर्ट में चल रहा था और अप्रैल 2018 में ज़मानत पर कोर्ट की तरफ से कफील को रिहा कर दिया गया था। अदालत ने कहा था कि डॉ कफ़ील ख़ान के ख़िलाफ़ लापरवाही के आरोपों को स्थापित करने के लिए कोई सबूत मौजूद नहीं हैं।

कफील को किस बात की मिली थी सज़ा?

साल 2019 में विभागीय जांच की एक रिपोर्ट ने भी डॉ कफ़ील को क्लीन चिट दे दी थी। हालांकि बाद में यह बात भी सामने आई थी कि डॉ कफ़ील ने अपने स्तर पर अस्पताल में ऑक्सीजन सिलेंडर पहुंचे थे। इस मामले में अदालत ने उन्हें निर्दोष साबित कर दिया, उन्हें क्लीनचिट भी मिल गई लेकिन अभी तक उनका निलंबन वापस नहीं लिया गया है। डॉ कफ़ील इसके लिए कई बार सरकार को पत्र भी लिख चुके हैं। अस्पताल में ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी से होने वाली मौत सरकार की लापरवाही को भी उजागर करती थी शायद यही कारण है कि डॉक्टर कफील अहमद खान को सरकार की लापरवाही उजागर करने की सज़ा मिली थी। जिसे वह कई सालों से भुगत रहे थे।

हालांकि कई साल बाद अब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने डॉ. कफील अहमद खान के खिलाफ क्रिमिनल प्रोसीडिंग पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने मामले को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, अलीगढ़ की अदालत में इस निर्देश के साथ वापस भेज दिया है कि धारा 196 (ए) सीआरपीसी के प्रावधानों के अनुसार, केंद्र सरकार या राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अभियोजन की पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने के बाद ही उक्त धाराओं के तहत डॉ कफील के खिलाफ संज्ञान लिया जाए।


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