पहला पन्ना: ट्वीटर को कसना एक सूत्री कार्यक्रम है सरकार और गोदी मीडिया का!


दूसरी ओर यह भी सही है कि दिल्ली दंगों में गलत ढंग से गिरफ्तार तीन लोगों को हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बावजूद उन्हें तुरंत नहीं छोड़ा नहीं गया। पुलिस के अपने कारण हैं, वह सुप्रीम कोर्ट में भी गई है। लेकिन 1932 से जर्नलिज्म ऑफ करेज का झंडा ढो रहे इंडियन एक्सप्रेस को सरकारी खबर ही बड़ी लगी और दिल्ली पुलिस की महानता की खबर नीचे दो कॉलम में है जबकि द हिन्दू ने इसे लीड बनाया है। 


संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
मीडिया Published On :


छात्रों की जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने वाली सरकार समझौता ब्लास्ट में नहीं गई थी

 

आज के पांच अखबारों से साफ है कि सरकार (या उसकी पुलिस) अगर अपने विरोधियों को एक साल बाद हाईकोर्ट से जमानत मिलने पर छोड़ने को तैयार नहीं है तो अपने समर्थकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की भी जरूरत नहीं समझती। धन के गबन के मामले में सीधी चुनौती दिए जाने पर भी। दूसरी ओर, सरकार का सारा जोर ट्वीटर को दुरुस्त करने के लिए उसके खिलाफ माहौल बनाने में भी है। इस क्रम में आज ट्वीटर पर ये खबरें हैं। 

  1. “ट्वीटर ने (कानून का) अनुपालन नहीं करने का निर्णय किया, केंद्र ने कहा।” दूसरी खबर, “परस्पर विरोधी विवरणों के बीच (उत्तर प्रदेश) पुलिस ने ट्वीटर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की”, इसके साथ ही है। (हिन्दुस्तान टाइम्स)
  2. “अपुष्ट वीडियो शेयर करने के लिए पुलिस ट्वीटर और अन्य के खिलाफ नोटिस भेज सकती है।” इसके साथ दो और छोटी-छोटी खबरें हैं। विस्तार अन्दर होने की सूचना है। पहली खबर का शीर्षक है, “ट्वीटर ने जानबूझकर अनुपालन नहीं किया : प्रसाद” सिंगल कॉलम की दूसरी खबर का शीर्षक है, “केंद्र मध्यस्थ का दर्जा नहीं हटा सकता है।”। (टाइम्स ऑफ इंडिया)
  3. “यूपी पुलिस ने ट्वीटर, न्यूज पोर्टल, पत्रकारों के खिलाफ मामला दर्ज किया।” उपशीर्षक है, “बुजुर्ग पर हमले को लेकर विवाद” (द हिन्दू)। 
  4. इंडियन एक्सप्रेस ने पांच कॉलम में दो लाइन के शीर्षक के साथ लीड बनाया है। शीर्षक है, “प्रसाद ने ट्वीटर के खिलाफ माहौल गर्म किया, उपेक्षा करता है, नियम नहीं मानने का निर्णय करता है।” इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, “मंत्री ने कहा कि मंच की कानूनी सुरक्षा पर सवाल उठे हैं।” उपशीर्षक हैं, “मंत्री ने ट्वीटर के खिलाफ गाजियाबाद पुलिस की एफआईआर का उल्लेख किया और इस बात को रेखांकित किया कि वह फर्जी खबरों से लड़ने में मनमानी कर रहा है।”
  5. आज ट्वीटर से संबंधित खबर द टेलीग्राफ में भी है। पहले पन्ने पर छपी इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, “(वेब) साइट, पत्रकार और राजनीतिज्ञों के खिलाफ एफआईआर।”मुख्य शीर्षक है, “ट्वीटर के खिलाफ यूपी से कार्रवाई शुरू।” 

आप जानते हैं कि सरकार नए आईटी कानून को लागू करने के लिए पूरा जोर लगा रही है। इसके तहत वह चाहती है कि ‘देश के कानून’ के खिलाफ सामग्री हो तो उसे हटाने के लिए कहने पर ट्वीटर हटा ले। मेरी समझ से देश के कानून के खिलाफ सामग्री के मामले में कार्रवाई सरकार को करनी चाहिए। बगैर किसी कार्रवाई के ट्वीटर से पोस्ट हटाने के लिए कहना सरकार में होने का बेजा फायदा उठाना है, अनुचित तो है ही। गाजियाबाद के मामले में एफआईआर होने के बाद इंडियन एक्सप्रेस की खबर देखिए और टेलीग्राफ की खबर को फिर से देखिए। आप समझ जाएंगे कि उत्तर प्रदेश के इस मामले से ट्वीटर को घेरने की कोशिश हो सकती है। अखबार का शीर्षक इसी ओर इशारा कर रहा है। 

अगर आप मामले को समझ गए तो बाकी अखबारों के रवैये को भी समझ जाएंगे। आप जानते हैं कि ट्वीटर का मामला केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद देख रहे हैं और यहां, सरकार या केंद्र के हवाले से जो कहा गया है वह सब उनका ही कहा है। उनकी भाषा या शब्द का चयन कानून के अनुसार होगा और अनुवाद बिल्कुल वही तो हो नहीं सकता है, निकटतम है। एक संकट और है कि मंत्री जी हिन्दी भी बोलते हैं। इसलिए अगर उन्होंने हिन्दी में कुछ कहा हो, अंग्रेजी अखबार ने अनुवाद छापा हो और मैं फिर अनुवाद करूं तो जरूरी नहीं हैं कि शब्द या शैली वही हो। इसलिए कृपया इसका ख्याल रखें। किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले मूल अंग्रेजी या हिन्दी देख लें। 

कहने की जरूरत नहीं है कि आज के अखबारों ने ट्वीटर के खिलाफ माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इस चक्कर में वेबसाइट और पत्रकारों के खिलाफ मामला दर्ज कराने को भी प्राथमिकता नहीं दी है। मामला क्या है वह तो भूल जाइए। उसकी चर्चा सांप्रदायिकता फैला सकती है और सरकार एफआईआर करवा सकती है तो बेचारे गोदी वाले खबर कैसे करें। दूसरी ओर यह भी सही है कि दिल्ली दंगों में गलत ढंग से गिरफ्तार तीन लोगों को हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बावजूद उन्हें तुरंत नहीं छोड़ा नहीं गया। पुलिस के अपने कारण हैं, वह सुप्रीम कोर्ट में भी गई है। लेकिन 1932 से जर्नलिज्म ऑफ करेज का झंडा ढो रहे इंडियन एक्सप्रेस को सरकारी खबर ही बड़ी लगी और दिल्ली पुलिस की महानता की खबर नीचे दो कॉलम में है जबकि द हिन्दू ने इसे लीड बनाया है। 

द हिन्दू का शीर्षक है, दंगा मामले में तीन छात्रों (दो लड़कियां हैं) को जमानत के खिलाफ दिल्ली पुलिस सुप्रीम कोर्ट गई। निश्चित रूप से यह बड़ी खबर है। छात्रों और उनमें भी दो लड़कियों के खिलाफ यूएपीए लगाना और हाईकोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियों के बावजूद पुलिस का सुप्रीम कोर्ट जाना असाधारण है। यहां उल्लेखनीय है कि समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट मामले में फैसला 20 मार्च 2019 को सुनाया गया था, उस समय के केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से “यह पूछे जाने पर कि क्या अभियोजन पक्ष इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करेगा, कहा था नहीं, सरकार को क्यों अपील करना चाहिए? इसका कोई मतलब नहीं है। राजनाथ सिंह ने इस मामले में नए सिरे से जाँच को भी ख़ारिज कर दिया।  उन्होंने कहा, “एनआईए ने इस मामले की जाँच की। इसके बाद ही उसने आरोप पत्र दाखिल किया। अब जबकि कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुना दिया है, उस पर भरोसा किया जाना चाहिए।” गौर करने वाली बात है कि आतंकवाद के मामले में (निचली) अदालत के फैसले पर भरोसा करना चाहिए और जमानत के मामले में दिल्ली पुलिस हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई। दरअसल दिल्ली पुलिस नहीं, केंद्र की भाजपा सरकार गई है। पुलिस राज्य के लिए ही काम करती है और राज्य का रवैया प्रज्ञा ठाकुर और केशवानंद के मामले में कुछ और होता है तथा नताशा नरवल और देवयानी कलीता के मामले में कुछ और। दिलचस्प यह है कि अखबारों को मौके पर याद नहीं आता है। 

बात इतनी ही नहीं है, गृहमंत्री और भाजपा नेता अमित शाह कह चुके हैं कि  “समझौता (एक्सप्रेस ब्लास्ट) मामले में गड़बड़ी की गई थी।” इस खबर के मुताबिक, ब्लास्ट को एक धर्म से जोड़ने की कोशिश हुई थी और अदालत द्वारा आखिरकार छोड़ दिए गए अभियुक्तों के खिलाफ कोई सबूत नहीं था। अगर देश के गृहमंत्री की बात मान ली जाए तो क्या यह चिन्ताजनक नहीं है कि अपराध और आतंकवाद के एक बड़े और गंभीर मामले में देश की जांच एजेंसी ने जानबूझकर एक खास धर्म से जोड़ने की कोशिश की। और उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। अखबारों को तो यह भी याद नहीं है या याद दिलाने की जरूरत महसूस नहीं हो रही है। 

इन सबके बावजूद टाइम्स ऑफ इंडिया में छात्रों को जमानत मिलने के बावजूद नहीं छोड़ने की सरकारी कोशिशों की खबर पहले पन्ने पर नहीं है जबकि द टेलीग्राफ ने इसका शीर्षक लगाया है, केंद्र जमानत रोकने के लिए कितना उत्सुक है उसका सबूत यह रहा। द टेलीग्राफ ने आज टीके की खुराक का अंतराल बढ़ाने पर एक खबर को लीड बनाया है जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया में कुम्भ के दौरान फर्जी टेस्ट करने वाली फर्म के फर्जी होने से संबंधित खबर लीड है। कुल मिलाकर, अखबारों में सरकार के खिलाफ खबरें नहीं के बराबर छपती हैं। हालांकि, तब भी मामले कम नहीं हैं। पर सरकार है कि उसपर कोई असर ही नहीं होता है। मंदिर के नाम पर महंगी जमीन खरीदने का आरोप लगा तो बताया जा रहा है कि ‘वो’ और महंगी जमीन खरीद सकते हैं। पर घपले या सरकारी राजस्व के नुकसान से उन्हें कोई मतलब नहीं है और ना ही कोई विस्तृत खबर है जो सभी अनुत्तरित सवालों के जवाब तलाशती लगे।

ट्वीटरमय मनमानी की इन खबरों के बीच आज इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर उल्लेखनीय है। रिश्वत मामला : अदालत ने पुलिस से केरल भाजपा प्रमुख के खिलाफ केस दायर करने के लिए कहा। यह राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र वायनाड की खबर है और केरल चुनाव होने के बाद से चर्चा में है। इसे लेकर केरल भाजपा में आपसी सिर फुटौव्वल भी है लेकिन खबर पहले पन्ने पर मुश्किल से होती है। आज भी सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में है। इस खबर के अनुसार केरल भाजपा अध्यक्ष पर पैसे देकर समर्थन खरीदने, चुनाव लड़ाने और नामांकन वापस लेने जैसे आरोप हैं। बाकी बचे पैसों की बंदरबांट और फर्जी लूट जैसे आरोप भी हैं। यह सब कई महीनों से चल रहा है। खबरें भी छपती रही हैं लेकिन मामला पहले पन्ने तक कम आ रहा है। भाजपा राज में भाजपाइयों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने के मामलों की तो अब गिनती भी नहीं है।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।


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