पहले पन्ना: पेगासुस जासूसी कांड पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल और मीडिया का फटा पर्दा!  


द टेलीग्राफ का शीर्षक देखिए। मुख्य मुद्दा यही है कि सरकार ने पेगासुस मॉल वेयर खरीदा कि नहीं। और इसपर सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया। उसी को अखबार ने अपने खास अंदाज में बताया है जो बाकी अखबारों ने बताया तो नहीं ही है, एक हद तक छिपाने की भी कोशिश की है। पेगासुस के साथ अभी तक जो बातें साफ हो चुकी हैं उससे सरकार को जवाब हां-नहीं में ही देना है। नहीं कहकर वह ज्यादा फसेंगी और हां कहकर तो फंसेगी ही। इसलिए अखबारों की कोशिश यही रही है कि मामले को किसी तरह छिपा लिया जाए। आप जानते हैं कि पेगासुस कह चुका है कि वह अपना मालवेयर सिर्फ सरकारों को बेचता है। भारत में पेगासुस से लोगों की जासूसी हुई है। तो निश्चित रूप से भारत सरकार की अनुमति से हुई है और भारत सरकार किसी दूसरी एजेंसी को अनुमति क्यों देगी (जो बता न सके) इसलिए जासूसी खुद करवाई हो सकती है।


संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
मीडिया Published On :


 

आज उन खबरों की चर्चा जो नहीं छपती हैं

टीम राहुल से कोई अलग हो तो पहले पन्ने पर और बाकी

सुष्मिता देव कांग्रेस छोड़ें तो तीन कॉलम, रीता बहुगुणा का घर जलाने वाला भाजपा में, तो ख़बर नहीं!

आज इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर तीन कॉलम की एक खबर है, “टीम राहुल को एक और नुकसान: असमी चेहरा सुष्मिता देव टीएमसी में गईं”। खबर के अनुसार, सुष्मिता देव अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की प्रेसिडेंट और असम में कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में एक हैं। सोमवार को वे कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गईं। इसके साथ अखबार ने याद दिलाया है कि देव कांग्रेस की चौथी बड़ी युवा नेता हैं और टीम राहुल के प्रमुख सदस्यों में एक हैं। यह खबर द हिन्दू और टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर नहीं है। द हिन्दू में पहले पन्ने पर प्रमुखता से बताया गया है कि सुष्मिता देव कांद्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में गईं। यह सूचना मास्टहेड के नीचे की पट्टी में है यानी महत्वपूर्ण खबर है। अंदर यह चार कॉलम में है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह सिंगल कॉलम की खबर है और शीर्षक है, कांग्रेस छोड़ने के एक दिन बाद सुष्मिता देव तृणमूल में शामिल हुईं। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर सिंगल कॉलम में है, पूर्व सांसद सुष्मिता देव कांग्रेस छोड़कर तृणमूल से जुड़ीं। सुष्मिता देव कांग्रेस नेता दिवंगत संतोष मोहन देव की बेटी हैं और सांसद रह चुकी हैं। 

इंडियन एक्सप्रेस ने इस खबर को जो महत्व दिया है उससे मुझे याद आया कि कांग्रेस नेता हेमवती नंदन बहुगुणा की बेटी रीता जोशी बहुगुणा आजकल भाजपा में हैं। इलाहाबाद से पार्टी की सांसद हैं। हाल में खबर आई थी कि रीता बहुगुणा का घर जलाने वाले जितेन्द्र सिंह बबलू को भाजपा में शामिल कर लिया गया है। ज़ी न्यूज की एक खबर के अनुसार, बाहुबली नेता जितेन्द्र सिंह बसपा के विधायक रह चुके हैं। अयोध्या जिले की बीकापुर सीट से 2007 में विधायक थे। 2009 में बबलू तब चर्चा में आए थे जब उनपर रीता बहुगुणा जोशी का घर जलाने का आरोप लगा था। उस समय बबलू पर मुकदमा भी दर्ज हुआ था। गिरफ्तार भी हुए थे। घर जलाने के उनके अपने कारण रहे होंगे। मैं अभी उसकी चर्चा नहीं कर रहा हूं। 

आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति काफी समय से खराब चल रही है। रीता बहुगुणा जोशी का घर जब जलाया गया तब वे कांग्रेस में थीं और मेरी याद सही हो तो प्रदेश अध्यक्ष भी। ऐसे नेता का घर जला दिया गया और कार्रवाई क्या हुई पता नहीं। बाद में वे भाजपा में शामिल हो गईं यह निश्चित रूप से बड़ी खबर रही होगी। लेकिन 2017 से राज्य में भाजपा की सरकार है आग लगाने के मामले में कार्रवाई की कोई खबर मेरी जानकारी में नहीं है। सवाल उठता है कि कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने का क्या लाभ रीता बहुगुणा जोशी को मिला? आप मान सकते हैं कि लोक सभा चुनाव में जीत नरेन्द्र मोदी के चौकीदार अभियान के असर से मिली होगी। उनका अपना प्रभाव होता तो घर कौन जला पाता? लेकिन अभी वह मुद्दा नहीं है। लेकिन सुष्मिता देव का कांग्रेस छोड़कर तृणमूल में शामिल होना मुद्दा है। 

मुद्दा यह भी है कि कांग्रेस नेता के घर में आग लगाने वाले बाहुबली बसपा नेता को भाजपा में शामिल कर लिया गया। वह भी तब जब जिसका घर जलाया गया था वह पार्टी की माननीय सांसद हैं। यह भारतीय राजनीति की दशा है और कानून व्यवस्था का पालन करने वाले सिस्टम का हाल। कहने की जरूरत नहीं है कि 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले रीता बहुगुणा जोशी को भाजपा में शामिल करवाया गया था बाद में वे सांसद बनीं और अब 2022 के चुनाव से पहले बबलू सिंह को भाजपा में शामिल करा लिया गया। साफ है कि भारतीय राजनीति में कोई किसी पार्टी के लिए अछूत नहीं है। जो जहां जाना चाहे उसका वहीं स्वागत है। कोई आदर्श, कोई विचारधारा या डर अथवा शर्म का कोई मामला नहीं है। अब आप बताइए, खबर कौन सी बड़ी है? सुष्मिता देव का तृणमूल में जाना या बाहुबली कहे जाने वाले बसपा नेता जिनपर भाजपा सांसद और पूर्व में एक पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष का घर जलाने का आरोप है – उसे उसी पार्टी में (वही पार्टी सत्तारूढ़ है तब भी) शामिल कर लेना? आपने यह खबर किसी अखबार में पहले पन्ने पर पढ़ी थी? या आपको इस मामले की जानकारी थी? मुझे भी नहीं पता था कि रीता बहुगुणा जोशी की मांग पर या उनके विरोध करने पर जितेन्द्र सिंह को फिर पार्टी से निकाल दिया गया है। 

ऐसा नहीं है कि जितेन्द्र सिंह को भाजपा में शामिल किए जाने का विरोध नहीं हुआ या कोई चर्चा ही नहीं हुई इसलिए खबर नहीं छपी और सुष्मिता देव का मामला बहुत चर्चा में है। 10 अगस्त की ज़ी न्यूज की ही खबर है, पार्टी के प्रदेश मीडिया सह प्रभारी हिमांशु दुबे ने बताया कि प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने पूर्व विधायक जितेंद्र सिंह बब्लू की पार्टी से सदस्यता निरस्त कर दी है। पहले की खबर के अनुसार इन्हीं ने बब्लू को पार्टी में शामिल किया था। मैंने यह खबर नहीं पढ़ी थी, क्या आपको पता था कि भाजपा ने जितेन्द्र सिंह को क्यों सदस्य बनाया, उसकी क्यों आलोचना हुई और क्यों निकालना पड़ा? क्या यह खबर किसी अखबार में पहले पन्ने पर छपी? क्या कम महत्वपूर्ण या सूचनाप्रद है? और जब यह खबर पहले पन्ने पर नहीं छपी तो सुष्मिता देव का कांग्रेस छोड़ना चाहे जितना महत्वपूर्ण हो, तृणमूल कांग्रेस में शामिल होना क्यों महत्वपूर्ण है कि खबर आज छपी है, कल नहीं छपी कि उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। मेरा मानना है कि यह मीडिया की राजनीति और भाजपा के हेडलाइन मैनेजमेंट का प्रभाव है।

यही नहीं, उत्तर प्रदेश भाजपा ने चार अगस्त को जिसे पार्टी में एंट्री दी उसे 10 अगस्त को निकाल दिया। क्या यह पार्टी की कार्यशैली का उदाहरण नहीं है? क्या यह साधारण सी खबर है? क्या इस खबर को वैसा महत्व मिला जैसा मिलना चाहिए था। अगर जितन्द्र सिंह को भाजपा में शामिल करना ही था तो क्या रीता जोशी से बात करके उनसे सहमति लेकर ऐसा नहीं किया जाना चाहिए था? दोनों में मेल-मिलाप या क्लीन चिट दिलाने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए थी? एक योग्यकार्यकर्ता से पार्टी यूं ही नहीं चूक गई क्योंकि मामले को ठीक से हैंडल नहीं किया। क्या इस मामले को ठीक से हैंडल नहीं करने के लिए पार्टी नेताओं की खिंचाई या आलोचना नहीं होनी चाहिए जैसे राहुल गांधी की अक्सर होती है। पर क्या आपने ऐसी कोई आलोचना कभी कहीं देखी। जितेन्द्र सिंह को भाजपा में शामिल कर लिए जाने के बाद क्या रीता बहुगुणा को एतराज नहीं करने के लिए मनाना इतना मुश्किल रहा होगा और अगर था तो शामिल ही क्यों किया गया। यह पार्टी की आंतरिक गुटबाजी की ओर इशारा नहीं करती है। इसपर आपने कोई खबर पढ़ी? वैसे तो खबरों की ऐसी चर्चा का कोई मतलब नहीं है और किसी खबर के छपने या नहीं छपने के सौ कारण हो सकते हैं। पर आजकल यह चर्चा इसलिए जरूरी है कि अखबारों में कांग्रेस का विरोध तो होता है, भाजपा का विरोध नहीं होता है। 

 

पेगासुस मामले की अखबारों में प्रस्तुति 

आज की एक और दिलचस्प खबर है पेगासुस मामले में कल सुप्रीम कोर्ट में जो हुआ उसकी प्रस्तुति। पहले शीर्षक देख लीजिए। 1) टाइम्स ऑफ इंडिया : सरकार ने पेगासुस के आरोप से इनकार किया, सुप्रीम कोर्ट के पैनल से जांच के लिए तैयार 2) हिन्दुस्तान टाइम्स : नैरेटिव दूर करने के लिए पेगासुस पर जांच पैनल तैयार करने के लिए तैयार : सरकार 3) इंडियन एक्सप्रेस : सरकार ने कहा, पेगासुस का इस्तेमाल हुआ या नहीं हुआ जैसा आसान (मामला) नहीं है, गलत चर्चा को खत्म करने के लिए पैनल बनाने की पेशकश 4) द हिन्दू : सरकार ने जासूसी के आरोप खारिज किए। पांचवां शीर्षक द टेलीग्राफ का है। उसपर आने से इन चार सुर्खियों को समझ लीजिए। 

टाइम्स ऑफ इंडिया के शीर्षक से लगता है कि सरकार दूध की धुली है, उसे किसी जांच का कोई डर नहीं है और वह सुप्रीमकोर्ट के पैनल से जांच के लिए तैयार है। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक भी ऐसा ही है। नैरेटिव दूर करने के लिए पेगासुस पर जांच पैनल तैयार करने के लिए तैयार : सरकार – से लगता है कि सरकार की चिन्ता सिर्फ पेगासुस से जुड़ा नैरोटिव ही है और उसे ठीक करना बहुत आसान है। उससे पूछा गया हो कि वह उसे ठीक करना चाहती है कि नहीं तो उसने कहा है कि वह तैयार है। ऐसे मामलो में इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक हमेशा उलझा हुआ होता है।  सरकार ने कहा, पेगासुस का इस्तेमाल हुआ या नहीं हुआ जैसा आसान (मामला) नहीं है, गलत चर्चा को खत्म करने के लिए पैनल बनाने की पेशकश। इस शीर्षक को घुमा दिया गया है। बहुत सीधा सा सवाल है, जासूसी हुई कि नहीं, हुई तो किसी अनुमति से हुई और किसने की या करवाई। मामला तो हां या नहीं का ही है। और चर्चा को सरकार भले गलतकहे लेकिन वह निराधार नहीं है। द हिन्दू के शीर्षक में कुछ नया नहीं है और वही है जो अभी  तक छपता रहा है। इसलिए इसका कोई खास मतलब नहीं है। 

इन सबसे अलग, द टेलीग्राफ का शीर्षक देखिए। मुख्य मुद्दा यही है कि सरकार ने पेगासुस मॉल वेयर खरीदा कि नहीं। और इसपर सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया। उसी को अखबार ने अपने खास अंदाज में बताया है जो बाकी अखबारों ने बताया तो नहीं ही है, एक हद तक छिपाने की भी कोशिश की है। पेगासुस के साथ अभी तक जो बातें साफ हो चुकी हैं उससे सरकार को जवाब हां-नहीं में ही देना है। नहीं कहकर वह ज्यादा फसेंगी और हां कहकर तो फंसेगी ही। इसलिए अखबारों की कोशिश यही रही है कि मामले को किसी तरह छिपा लिया जाए। आप जानते हैं कि पेगासुस कह चुका है कि वह अपना मालवेयर सिर्फ सरकारों को बेचता है। भारत में पेगासुस से लोगों की जासूसी हुई है। तो निश्चित रूप से भारत सरकार की अनुमति से हुई है और भारत सरकार किसी दूसरी एजेंसी को अनुमति क्यों देगी (जो बता न सके) इसलिए जासूसी खुद करवाई हो सकती है। यही नहीं, कानूनन फोन टैप तो किया जा सकता है पर जासूसी नहीं हो सकती है और पेगासुस टैप करने का नहीं जासूसी का उपकरण है इसलिए दाल में काला नहीं, दाल ही काली है। मीडिया इसे कब तक बचा पाएगा यह समय ही बताएगा।  

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध पत्रकार हैं।


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