पुलित्ज़र पुरस्कार- जानिए पुलित्ज़र पाने वाले भारतीय फोटो जर्नलिस्ट्स और उनके संघर्ष को

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कोरोना वायरस के चलते पूरे देश में 24 मार्च से लॉकडाउन की स्थिति है पर कश्मीर पिछलेसाल के अगस्त महीने से ही लॉकडाउन की स्थिति में चल रहा था। कश्मीर का लॉकडाउन पूरी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में, वहां की सरकारों द्वारा, वायरस से बचाव के लिए,लागू किये गए लॉकडाउन से नितांत भिन्न प्रकृति का रहा है। चप्पे-चप्पे पर फ़ौज. इंटरनेट और टेलीफोन सुविधाएँ बंद। कश्मीर के अलग-अलग इलाकों में धारा 370 हटाने के विरोध में प्रदर्शन होने लगे। सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया, मगर दुनिया को पता ही नहीं चल पा रहा था कि आखिर कश्मीर में हो क्या रहा है। लेकिन एसोसिएटिड प्रेस के तीन प्रेस-फोटोग्राफर्स यासीन दार, मुख्तार खान और चन्नी आनंद ने कश्मीर के हालात से दुनिया को रूबरू कराने के रास्ते तलाश कर ही लिए। इन तीनों फोटोग्राफर्स को वर्ष 2020 के पुलित्जर पुरूस्कार से सम्मानित किया गया है।

दार यासीन

1973 में कश्मीर में पैदा हुए यासीन कम्प्युटर-सांइस में स्नातक हैं। यासीन ने इससे पूर्व अफगानिस्तान में अफगान –युद्ध, युद्ध से पीड़ित अफगानियों और अफगान शरणार्थियों के अतिरिक्त मयंमार के रोहिंग्या मुस्लिमों पर हुई हिंसा और शरणार्थी संकट पर भी महत्वपूर्ण काम किया है। अनेक अन्तर्राष्ट्रीय पुरुस्कारों के अतिरिक्त उन्हें भारत के सबसे प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका पुरूस्कार से दो बार सम्मानित किया जा चुका है।

मुख्तार खान

मुख्तार खान पिछले लगभग दो दशक से कश्मीर में फोटो पत्रकारिता कर रहे हैं। 2005 में उनके द्वारा, कश्मीर में आये भीषण भूकम्प की खींची गई तस्वीरें काफी चर्चित हुई थीं।

चन्नी आनंद

चन्नी भी लगभग दो दशक से जम्मू में फोटो-पत्रकारिता कर रहे हैं। उनकी पत्रकारिता मुख्यतौर पर सामाजिक मुद्दों, प्राकृतिक आपदाओं, सुरक्षाबलों और आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ों पर केन्द्रित रही है।

कश्मीर लॉकडाउन के दौरान इन तीनों का संघर्ष

कश्मीर में पूर्णतया लॉकडाउन और कर्फ्यू की स्थिति थी। मुख्य-मार्ग फ़ौज द्वारा बंद करदिए गये थे, परन्तु ये तीनों टेढ़े-मेढ़े रास्तों से छिपते-छिपाते कश्मीर की तस्वीर को अपनेकैमरों में कैद कर रहे थे। कई बार इन्हें अपने कैमरे सब्जियों के थैले में छुपाने पड़ते तोकभी अजनबियों के घरों पर पनाह लेनी पड़ती। “यह सब करना चूहे और बिल्ली के खेल जैसा था, पर हमने भी ठान लिया था कि हम खामोश नहीं रहेंगें”, यासीन ने पुरस्कार की घोषणा के बाद प्रेस को बताया, “कई बार हमें सुरक्षाबलों और आन्दोलनकारियों, दोनों के ही अविश्वास का सामना करना पड़ता था। कई बार कई-कई दिनों तक हमारे घरवालों को ही नहीं पता होता था कि हम कहाँ हैं।” इन्टरनेट बंद था और अब सवाल यह था कि इन तस्वीरों को दिल्ली स्थित एसोसिएटिड प्रेस के दफ्तर में कैसे पहुंचाया जाए?

पुलित्ज़र के लिए चुनी गई, एसोसिएटेड प्रेस की फोटोग्राफ्स में से एक

यासीन और मुख्तार श्रीनगर में रहते हैं और चन्नी जम्मू में। यासीन बताते हैं कि 1990 में भी जब कश्मीर के हालात काफी गंभीर हो गये थे और पूरी संचार व्यवस्था बंद कर दी गई थी, तो उनके एक पत्रकार रिश्तेदार ने अपनी रिपोर्ट और फोटो दिल्ली में दस्ती भिजवाये थे। इसी फार्मूले का इस्तेमाल इन तीनों फोटोग्राफरों ने भी किया। ये तीनों मेमोरी-कार्ड या पेन ड्राइव में फोटो डालकर एयरपोर्ट पहुँचते और दिल्ली जाने वाले यात्रियों से निवेदन करते कि इसे वे दिल्ली पहंचा दें। काफी यात्री डरकर मना भी कर देते लेकिन कुछ मान भी जाते। यासीन बताते हैं कि अधिकाँश मेमोरी-कार्ड और पेन-ड्राइव एसोसिएटिड प्रेस के पास पहुँच गये। मुख्तार के अनुसार काम बहुत मुश्किल था पर जैसे तैसे हमने कर ही लिया।

चन्नी, पुरूस्कार मिलने पर स्वयं को अवाक पाते हैं और बताते हैं कि पुलित्ज़र की घोषणा के बाद एकाएक उन्हें इस पर विश्वास ही नहीं हुआ। यासीन कहते हैं, “प्रोफेशनल होने के साथ-साथ हमारी व्यक्तिगत भावनाएं भी इस सारे कामसे जुड़ी थीं. यह सिर्फ उन लोगों की कहानी नहीं है जिनके हमने फोटो खींचें हैं, यह हमारी कहानी भी है।”


ये स्टोरी मीडिया विजिल के लिए लेखक-अनुवादक-सामाजिक कार्यकर्ता  कुमार मुकेश ने की है।

 

 


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