पहला पन्ना: येदुरप्पा का इस्तीफ़ा आंतरिक कलह का नतीजा, पर छुपा गये अख़बार 


कहने की जरूरत नहीं है कर्नाटक का मामला भाजपा का आंतरिक मामला है और इस्तीफा मांगा गया होगा इसलिए दिया है। उसके अपने मकसद या कारण होंगे जो आज के ज्यादातर शीर्षक से पता नहीं चल रहा है और पार्टी ने घोषित तो नहीं ही किया है। कुछ दिनों में स्पष्ट होगा या शायद न भी हो। कर्नाटक की यह खबर दिल्ली के तीन बड़े अखबारों में लीड है तो इसका कारण यह हो सकता है कि सत्तारूढ़ पार्टी की राजनीति अभी सबसे महत्वपूर्ण है। भले उसमें सूचना कुछ न हो। 


संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
मीडिया Published On :


आज के अखबारों में पहले पन्ने पर तीन खबरें जरूर हैं। कर्नाटक के मुख्यमंत्री, बीएस येदुरप्पा का इस्तीफा, असम और मिजोरम की सीमा पर हिंसा और ममता बनर्जी ने पेगासुस मामले की जांच के आदेश दिए। हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया और द हिन्दू में येदुरप्पा के इस्तीफे की खबर लीड है। इंडियन एक्सप्रेस ने असम की हिंसा को लीड बनाया है लेकिन टेलीग्राफ में पेगासुस की खबर लीड है। आज इन तीनों खबरों को लीड बनाने और नहीं बनाने के कारणों या तर्कों की चर्चा करूंगा। कहने की जरूरत नहीं है कर्नाटक का मामला भाजपा का आंतरिक मामला है और इस्तीफा मांगा गया होगा इसलिए दिया है। उसके अपने मकसद या कारण होंगे जो आज के ज्यादातर शीर्षक से पता नहीं चल रहा है और पार्टी ने घोषित तो नहीं ही किया है। कुछ दिनों में स्पष्ट होगा या शायद न भी हो। कर्नाटक की यह खबर दिल्ली के तीन बड़े अखबारों में लीड है तो इसका कारण यह हो सकता है कि सत्तारूढ़ पार्टी की राजनीति अभी सबसे महत्वपूर्ण है। भले उसमें सूचना कुछ न हो। 

इंडियन एक्सप्रेस ने असम और मिजोरम सीमा पर हिंसा को महत्व दिया है और लीड बनाया है। पेगासुस मामले की जांच करवाने का ममता बनर्जी का आदेश द टेलीग्राफ में लीड है। पहली नजर में बंगाल का मामला, बंगाल का अखबार और बंगाल की खबर लीड माना जा सकता है। लेकिन इन दिनों टेलीग्राफ इंटरनेट पर कम नहीं पढ़ा जाता है इसलिए इसमें पेगासुस मामले की जांच कराने के आदेश से संबंधित खबर देश भर के लिए महत्वपूर्ण है। पेगासुस का मामला राष्ट्रीय नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर का है और कई देशों ने जब जांच के आदेश दे दिए हैं और भारत में सिर्फ एक राज्य सरकार ने इस मामले की जांच के आदेश दिए हैं और केंद्र सरकार इसकी जरूरत नहीं समझ रही है तो यह मामला अपने आप में गंभीर है। इस लिहाज से मुझे द टेलीग्राफ का चयन सबसे अच्छा लगता है। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस ने सुदूर असम-मिजोरम हिंसा को क्यों प्रमुखता दी?  

खबर से पता चलता कि सीमा से संबंधित यह विवाद वर्षों पुराना है। अगर वाकई ऐसा है तो सरकार (रें) क्या कर रही हैं? वर्षों पुराने इस विवाद को निपटाने की कोशिश क्यों नहीं हो रही है और प्रधानमंत्री रोज 18 घंटे काम करने का प्रचार तो करते हैं पर यह क्यों नहीं बताते हैं कि रोज 18 घंटे वे क्या काम करते हैं? दूसरा सवाल है कि वर्षों पुराना यह विवाद अब क्यों उभर गया। मुझे लगता है कि कितने मरे से ज्यादा महत्वपूर्ण खबर यह है कि विवाद अब क्यों उभरा और उसके लिए कौन जिम्मेदार है। पर ऐसी खबरें आजकल नहीं होती हैं। चुनाव में घुस कर मारने का दावा और जीतने के बाद अंतरराष्ट्रीय सीमा के साथ-साथ राज्यों की सीमा पर भी टकराव प्रशासनिक दक्षता में घनघोर कमी का मामला है। अखबारों की प्रस्तुति इस लिहाज से नहीं है। हिन्सा के एक सामान्य मामले की तरह प्रस्तुत किया गया है। यही नहीं, दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों का ट्वीटर पर लड़ना भी कोई अच्छी स्थिति नहीं है। राजनीतिक लिहाज से अनुभवी होने के कारण या देश की बदनामी से बचने के लिए इसे रोकना किसका काम है या यह किसकी नाकामी है? यह सब खबरों में क्यों नहीं है? । 

अगर शीर्षक का बात करूं तो आज सबसे ज्यादा खेल येदुरप्पा के इस्तीफे की खबर में है। 

 

  1. टाइम्स ऑफ इंडिया –कई दिनों के सस्पेंस के बाद बीएस येदुरप्पा ने आखिरकार कर्नाटक के मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दिया उपशीर्षक है – मैं सक्रिय राजनीति से रिटायर नहीं हो रहा हूं। इसके साथ एक औऱ खबर का शीर्षक है, प्रधानमंत्री को 10 जुलाई को भेजी एक चिट्ठी में इस्तीफे की पेशकश की थी। इस खबर के अनुसार, यह दिलचस्प है कि दोनों लोग एक दशक में पहली बार मिले थे और यह मुलाकात तब हुई जब उन्होंने इस्तीफे की पेशकश की। खबर के अनुसार येदुरप्पा आषाढ़ में पद छोड़ना नहीं चाहते थे और 15 अगस्त तक बने रहना चाहते थे। लेकिन उनसे 26 जुलाई से पहले इस्तीफा मांगा गया था। अब यह सब क्यों, कैसे और किसलिए हुआ इसके बिना खबर का क्या मतलब पर वह बताया नहीं गया है। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा है कि राष्ट्रीय नेताओं ने उन्हें दो महीने तक मंत्रिमंडल विस्तार करने नहीं दिया। खबर के अनुसार मुख्यमंत्री ने कहा है कि वे 75 साल से ऊपर का होने पर पद देने के अपवाद के लिए वे पीएम, मोदी, शाह और नड्डा के आभारी है और गवर्नर  बनना नहीं चाहते हैं ना बनाए जाने पर स्वीकार करेंगे। वे सक्रिय राजनीति से रिटायर नहीं हो रहे हैं। ऐसे में उनसे इस्तीफा लिए जाने का कारण समझ में आए या कहीं छपा हो तो मुझे भी बताइए
  2. इंडियन एक्सप्रेस-येदुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया: किसी ने बहलाया फुसलाया नहीं। भावनात्मक भाषण में येदुरप्पा ने पार्टी के निर्माण में अपने प्रयासों को याद किया पर अखबार बता रहा है कि उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर तो नहीं ही किया गया, बहलाया फुसलाया भी नहीं गया। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर से पता चल रहा है कि किसी पंडित ने भी नहीं कहा होगा। ऐसे में लाख टके का सवाल है, येदुरप्पा ने इस्तीफा क्यों दिया? इंडियन एक्सप्रेस की खबर से इसे समझने की कोशिश में आपको उसकी एक और खबर से कुछ मदद मिले तो जान लीजिए कि, इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर है, उत्तराधिकारी की तलाश में येदुरप्पा की चलेगी। अगर ऐसा ही है तो उत्तराधिकारी चुने बिना आषाढ़ में उन्होंने इस्तीफा बिना मांगे, बिना फुसलाए क्यों दे दिया – यह किसी पहेली से कम नहीं है
  3. हिन्दुस्तान टाइम्स –खबर बताती है कि पार्टी में बढ़ते असंतोष के कारण मुख्यमंत्री ने सोमवार को इस्तीफा दे दिया। आप जानते हैं कि दक्षिण भारत में कर्नाटक अकेला ऐसा राज्य है जहां डबल इंजन की सरकार थी। यह सरकार कैसे बनी थी वह सब किसी से छिपा नहीं है। फिर भी इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर में पार्टी में असंतोष के कारण इस्तीफा दिए जाने की सीधी-सपाट खबर देने की बजाय खबर ऐसे लिखी गई है जैसे पहले बुझाई जा रही हो।
  4. द हिन्दू –येदुरप्पा ने हार स्वीकारी, कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री को लेकर सस्पेंस बना। मुझे लगता है कि यही खबर है और स्थिति का सबसे सटीक वर्णन यही है। अखबार ने इस शीर्षक के साथ उपशीर्षक लगाया है, 78 साल के दिग्गज ने स्वेच्छा से इस्तीफा दिया; उत्तराधिकारी के नाम का खुलासा पार्टी करेगी। इसमें स्वेच्छा से इनवर्टेड कॉमा में है और इससे अगर कुछ स्पष्ट न हो तो हो जाता है। नेतृत्व इसपर कार्रवाई करेगा। लेकिन इस्तीफा लिया ही क्यों? अखबार इसे क्यों नहीं बता रहे हैं या पार्टी क्यों नहीं स्वीकार कर रही है। 

 

कल की खास बात 

मैंने कल यानी सोमवार, 27 जुलाई को यह कॉलम नहीं लिखा और इस दिन द टेलीग्राफ की लीड के अनुसार पेगासुस का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है। केरल से राज्यसभा सदस्य और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के जॉन ब्रिटास ने अदालत की निगरानी में जांच की मांग की है। कांग्रेस और शिवसेना ने इसकी तुलना हिरोशिमा पर बम गिराने से की है। दूसरी ओर, जासूसी पर सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष जेपी नड्डा की मानें तो मामला आधारहीन और मुद्दाहीन है। यह खबर भी कल ही छपी थी। इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत के नागरिकों और इनमें पत्रकार से लेकर मंत्री और जज तक शामिल हैं तो बहुत बड़ी घटना है। पेगासस से जासूसी चूंकि फोन टैप करने जैसी मामूली बात नहीं है इसलिए इसकी जांच करवाना स्वाभाविक जरूरत है। पर अब चूंकि इस बात की संभावना लग रही है कि यह जासूसी सरकार ही करवा रही है। ऐसे में जांच नहीं करवाना तो समझ में आता है लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष का यह कहना कि यह मामला आधारहीन और मुद्दाहीन है कुछ ज्यादा ही है। ऐसे में मंदिर और 370 हटवाने के लिए भाजपा का समर्थन करने वालों को चाहिए कि वे पहले भाजपा को ठीक से जान-समझ लें। मंदिर की जरूरत और 370 का नफा नुकसान समझना वैसे भी मुश्किल है। 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।


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