पहला पन्ना: पीट-पीटकर राष्ट्रगान गवाने वाले पुलिस वालों की पहचान 8 महीने बाद हुई, पर ख़बर?

संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
मीडिया Published On :


आज कई अखबारों में खबर है कि कलकत्ता हाईकोर्ट में विधानसभा चुनाव के बाद बंगाल की हिंसा की जांच कराने के आदेश दिए हैं और यह जांच सीबीआई तथा एसआईटी करेगी। यह खबर दिल्ली के अखबारों में द हिन्दू, इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड है, टाइम्स ऑफ इंडिया में सिंगल कॉलम में है और द टेलीग्राफ (जो कोलकाता का अखबार है) में भी यह खबर सिंगल कॉलम में है। बंगाल में चुनाव हारने के बाद पश्चिम बंगाल में हिंसा का मुद्दा केंद्र सरकार की राजनीति का भाग है और यह कोई छिपा हुआ मामला नहीं है। अगर सीबीआई जांच का आदेश हाईकोर्ट ने दिया भी है तो यह दिल्ली के तीन अखबारों में लीड और कोलकाता के अखबार में सिंगल कॉलम होना इसकी राजनीति बताता है। दिलचस्प यह है कि इसके लिए किए गए उपायों पर अखबारों ने रोशनी नहीं डाली है।

इंडियन एक्सप्रेस ने यह जरूर एक्सप्लेन (स्पष्ट) किया है कि हाईकोर्ट के फैसले से युद्ध गंभीर होगा और भाजपा ने इस फैसले पर खुशी जताई है तो राज्य सरकार के पास इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प है। इसलिए भी यह इतनी बड़ी खबर नहीं है जितनी बना दी गई है। इंडियन एक्सप्रेस ने इसके साथ ही छापा है कि देश में टीकाकरण की रफ्तार बहुत धीमी है। एक तरफ मुफ्त टीकाकरण के लिए मोदी जी को बधाई का विज्ञापन और टीकाकरण की रफ्तार बहुत कम होने की खबर न छपने या कम छपने का अहसास होने के बावजूद बंगाल में हिंसा की जांच करवाने के हाईकोर्ट के आदेश को लीड बनाना इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता है जिसे वह जर्नलिज्म ऑफ करेज कहता है। आज के अखबारों में कई ऐसी खबरें हैं जिससे नरेन्द्र मोदी या भाजपा की सरकार बनने पर आने वाले ‘अच्छे दिन’ का पता चलता है। यह ठीक है कि अच्छे दिन आएंगे कहा गया था, आ गए यह किसी ने नहीं कहा पर जो दिन चल रहे हैं उसमें सिस्टम व्यक्ति पर दाग लगाकर मरने के लिए छोड़ देता है और मरने वाले के परिवार को इसे खत्म करने के लिए अदालत की शरण लेनी पड़ती है।

ऐसी हालत में अखबार क्या खबर देते हैं और क्या नहीं यह सबको पता है लेकिन अखबार वालों (और सिस्टम) की बेशर्मी है कि कम होने का नाम नहीं ले रही है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने आज बंगाल चुनाव हिन्सा की जांच की खबर के साथ एक खबर छापी है, शासनादेश से आगे जाने के लिए दो जजों ने एनएचआरसी की आलोचना की। इस खबर के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की कथित चुनावी हिन्सा पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सिफारिशें और टिप्पणियां कानून की नजर में उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर, गैर जरूरी थीं। पांच सदस्यों वाली कलकत्ता हाई कोर्ट की पीठ के दो सदस्यों ने यह बात कही है। अकेले हिन्दुस्तान टाइम्स ने इस खबर को हाईकोर्ट के आदेश की मूल खबर के साथ छापा है और इसका विस्तार अंदर होने की सूचना दी।

यह सब तब है जब दुनिया जानती है (अगर मेरी याद्दाश्त सही है) कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से रिटायर जज अरुण मिश्र को बनाया है जो अपने फैसलों के कारण सरकार के प्रिय माने जाते रहे हैं और उन्हें आयोग का अध्यक्ष बनाने के लिए सरकार ने बाकायदा नियम बदले, पद खाली रखा और पूरे सिस्टम ने मिलकर उन्हें इस पद पर बैठाया है। अब अगर उनकी सिफारिश पर हाईकोर्ट ने जांच के आदेश दिए हैं तो उसका मतलब चाहे जो हो, दो जजों की टिप्पणी का महत्व आदेश से कम नहीं है। पर किसी अखबार ने इसे नहीं छापकर सरकार की अच्छी सेवा की है। सरकार ने इसकी कीमत कैसे चुकाई है यह सबको पता है। अनुचित और अनैतिक है इसमें कोई शक नहीं है। राजनीति तो है ही फिर भी खबर नहीं होना अखबारों का निरर्थक होना साबित करता है। स्थिति यह है कि तालिबान पर सरकार का रुख पता नहीं है और दूतावास बंद करने में जल्दबाजी की गई पर खबरें सिर्फ टेलीग्राफ में हैं। अखबार सूत्रों के हवाले से खबरें दे रहे हैं। आज के अखबारों में और भी कई खबरें हैं जो सरकार के काम-काज, दशा-दिशा को रेखांकित करती हैं।

 

द टेलीग्राफ

  1. दिल्ली ने तालिबान पर सवाल का जवाब नहीं दिया
  2. राष्ट्रगान गवाने वाले पुलिसियों की पहचान दंगे के लंबे समय बाद हुई

 

इनमें दूसरी वाली खबर कल इंडियन एक्सप्रेस में भी थी। वहां इस खबर को ऐसे पेश किया गया है जैसे दिल्ली पुलिस ने कोई बड़ा काम कर लिया हो। कहने की जरूरत नहीं है कि इस मामले का वीडियो मौजूद था और तब अपराधियों का पता लगाने में (जो पुलिस के ही थे) इतना समय लगा। कल्पना कीजिए कि वीडियो नहीं होता और अपराधी आम जनता में कोई होता तो क्या होता? यह देश की राजधानी की पुलिस का हाल है। पर खबर भारत रत्न देने के अंदाज में लिखी गई थी। मामला यह है कि  दिल्ली दंगे के दौरान पांच मुस्लिम युवकों को पीटने और उन्हें “अच्छी तरह से” राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर करने वाले पुलिसियों की पहचान करने का दावा दिल्ली पुलिस ने अब किया है। इन युवकों में से एक की मौत हो गई थी। इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि इनकी पहचान करने के लिए पुलिस ने क्या क्या किया जबकि बताना यह चाहिए था कि क्या नहीं किया। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार अदालत के आदेश के बाद इसमें आठ महीने लगे और अफसरों ने उन पुलिस वालों के नाम नहीं बताए। उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया है और अफसर ने उनकी पहचान में डेढ़ साल लगने पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। यह सब इंडियन एक्सप्रेस की खबर में पहले पन्ने पर तो नहीं था।

 

द हिन्दू

  1. बंगाल हिंसा की जांच सीबीआई, एसआईटी करेगी
  2. दिल्ली सरकार के बस घोटाले की जांच सीबीआई करेगी
  3. जाति आधारित जनगणना की मांग के लिए नीतिश तेजस्वी प्रधानमंत्री से मिलेंगे
  4. हाईकोर्ट ने अंतरधार्मिक दंपत्ति को गुजरात के कानून से बचाया
  5. आरएसएस से संबंधित किसान यूनियनें आंदोलन की योजना बना रही हैं

 

इंडियन एक्सप्रेस

  1. टीकाकरण की रफ्तार बेहद धीमी, भारत की रेटिंग जीडीपी भविष्यवाणी से कम
  2. दुबे मुठभेड़: उत्तर प्रदेश पुलिस को क्लीन चिट (मुझे तो यह भी कमाल की खबर लगती है। हालांकि सबको पता था इसलिए यह खबर ही नहीं है।)
  3. जम्मू कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन ने क्रिकेटर परवेज रसूल पर पिच रॉलर चुराने का आरोप लगाया। (इसमें एक भाजपा नेता का भी नाम है। पूरी खबर पढ़िए, दिलचस्प है।)

 

टाइम्स ऑफ इंडिया

  1. 90 प्रतिशत अक्षम खिलाड़ी को ट्रेन में सबसे ऊपर की बर्थ। पैरा एथलीट और सामाजिक कार्यकर्ता सुवर्णा राज के साथ ऐसा 2017 में भी हुआ था और तब भी रेल मंत्री ने आश्वासन दिया था। लगता है कुछ नहीं बदला है।
  2. जम्मू और कश्मीर में अपनी पार्टी के सदस्य की गोली मारकर हत्या
  3. गुजरात हाईकोर्ट ने लव जिहाद विरोधी कानून की छह धाराएं स्थगित कीं
  4. गिरफ्तारी आम कार्रवाई की तरह नहीं होनी चाहिए – सुप्रीम कोर्ट

 

हिन्दुस्तान टाइम्स

  1. स्टेन स्वामी पर लगे आरोपों के दाग खत्म करने की जरूरत। भले ही स्टेन स्वामी जमानत का इंतजार करते हुए मर गए लेकिन उनपर जो आरोप थे उसकी वजह से बड़े पैमाने पर घृणा का जो माहौल बना है उसे खत्म करने की आवश्यकता महसूस करते हुए उनके वकीलों ने मुंबई हाईकोर्ट में यह अपील दायर की है। इसमें कहा गया है कि उनके परिवार के लोगों का यह अधिकार है कि उनपर लगे दाग और उनके खिलाफ विद्वेष खत्म हों।
  2. मद्रास हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि दस्तावेज अंग्रेजी में दिए जाएं न कि हिन्दी में।

 

इन खबरों से सरकार की प्राथमिकताओं का भी पता चलता है। स्थिति यह है कि मद्रास हाईकोर्ट को कहना पड़ रहा है कि उसे हिन्दी में दस्तावेज न भेजे जाएं। कायदे से अनुवाद की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए यह बताने की जरूरत नहीं है। 70 साल में कुछ नहीं हुआ कहने वाले ने सात साल में ऐसी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं की हैं। मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि जो मांग की जा रही है वह हो नहीं रहा है जो हो रहा है उसका विरोध आरएसएस से संबद्ध यूनियन भी करने को मजबूर है लेकिन अखबार “सब चंगा सी” का माहौल बनाने में सेवा भाव से लगे हुए हैं। बिहार में नीतिश कुमार की सरकार भाजपा के सहयोग से चल रही है और मुख्यमंत्री वही मांग कर रहे हैं तो विपक्ष के नेता कर रहे हैं। अब केंद्र सरकार कितनी मजबूत या असहाय स्थिति में है यह आप तय कीजिए। इसके बावजूद अगर कोई राज्यों में किसी भी तरह सरकार बनाने को आतुर है तो वह प्रधानसेवक काम कितनी गंभीरता से कर रहा होगा वह आप समझ सकते हैं। इसका अनुमान उपरोक्त शीर्षकों से भी लगेगा देखिए और तय कीजिए कि अच्छे दिन के नाम पर आपको चौकीदारों ने क्या दिया है।

 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।


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