मई दिवस: अपने साथ हुए अन्‍याय पर जो न बोल सके, न लिख सके! मीडिया मजदूरों की दास्‍तान

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मजदूर दिवस पर मीडिया के मजदूरों की चर्चा शायद ही कहीं होती हो। आम तौर से बाहरी दुनिया के लिए पत्रकार और मीडियाकर्मी बहुत पैसा कमाने वाले प्राणियों में गिने जाते हैं, साथ ही उन्‍हें सामाजिक रसूख के मामले में भी भारी माना जाता है। चूंकि मीडिया मजदूरों की खबरें आम लोगों तक नहीं पहुंच पाती हैं, तो ऐसी धारणा कायम रहती है जबकि हर महीने कोई न कोई पत्रकार लाइन ऑफ ड्यूटी में मारा जाता है या फिर खुदकुशी कर लेता है।

डीबी डिजिटल से छंटनी

यह मीडिया का दुर्भाग्‍य ही है कि जिस दिन पूरी दुनिया मई दिवस मना रही है उस दिन भोपाल के मीडिया से एक त्रासद खबर आयी है। दैनिक भास्कर समूह के डिजिटल विंग ‘डीबी डिजिटल’ से 25 लोगों की छंटनी कर दी गई है। ये सभी लोग मध्‍य प्रदेश और गुजरात से निकाले गए हैं। ये लोग फेसबुक विंग में कार्यरत थे। इनमें से कुछ लोग 36 दिन पहले टीम का हिस्‍सा बने थे तो कुछ लोग लगातार दस साल से कंपनी की सेवा में थे।

पत्रकारों की मानें तो डीबी डिजिटल के राष्ट्रीय संपादक नवनीत गुर्जन ने सबको अचानक बुलाया और सेवा समाप्त किए जाने की घोषणा कर दी। सभी को डेढ़ महीने की सेलरी दी जाएगी। सोशल मीडिया की इस टीम के प्रमुख अनुज खरे हैं। इसके अलावा तकरीबन 15-16 लोगों की टीम को नवनीत गुर्जर की टीम में ट्रांसफर कर दिया गया है। इस तरह अनुज खरे की टीम तकरीबन खत्म कर दी गई है। यह छंटनी एमडी सुधीर अग्रवाल के विदेश दौरे से लौटते ही की गई है। छंटनी की जद्दोजहद तकरीबन 15 दिन से चल रही थी।

अब तक छंटनी आदि का संकट अखबारों और टीवी तक सीमित था। पिछले पांच साल में डिजिटल और सोशल की बुलंदी ने यहां भी प्रबंधन को वैसा ही आततायी बना दिया है। जिनकी नौकरियां बची हुई हैं, उनकी जिंदगी किसी नर्क से कम नहीं है। राजस्‍थान पत्रिका समूह के नोएडा स्थित पत्रिका डॉट कॉम में काम करने वालों का जो हाल है, कारखानों में शारीरिक काम करने वाले मजदूरों से भी गया-गुज़रा है। विडंबना यह है कि कोई मीडिया मजदूर अपने नाम से न तो अपने शोषण की दास्‍तान लिख सकता है, न दूसरे के लिखे में अपना नाम डाल सकता है। जो बचा खुचा है, वो भी चले जाने का खतरा होता है।

पत्रिका डॉट कॉम के कुछ कर्मचारियों ने नाम न छापने की शर्त पर मीडियाविजिल को अपनी काम करने की दुरूह स्थितियों पर एक लंबा मेल भेजा है जिसके आधार पर नीचे की कहानी है।

पत्रिका डॉट कॉम: जयपुर का पैदा किया नर्क 

पत्रिका ने लगभग तीन साल पहले नोएडा में निक्स ऑफिस खोला, लेकिन कर्मचारियों की सुविधा के लिये आवश्यक अंग एचआर रखा ही नहीं गया। एडमिन के पद पर दो लोगों को रख कर एचआर होने का भ्रम दिया गया, जो तकरीबन हर समस्या पर हाथ खड़े करते हुए कहता है- इसमें हम कुछ नहीं कर सकते, ऊपर का मामला है। ऊपर यानी जयपुर स्थित हेड ऑफिस, जहां से कोई कभी नोएडा के कर्मचारियों की खोज-खबर लेने नहीं आता। ऊपर से सिर्फ फरमान आते हैं, नीचे से कभी कोई बात ऊपर जाने-कहने की गुंजाइश नहीं।

यहां कर्मचारियों को किसी तरह की सुविधा नहीं है। पीएलआई के नाम पर मनचाहे पैसे काटना, अप्रेजल लगने पर भी गोल-माल करके बढ़ोतरी न के बराबर देना, नई भर्ती होने पर दस्तावेज न देना, मांगने पर सैलरी स्लिप भी बड़ी मुश्किल से देना, मनमाने ढंग से दीवाली का बोनस मार लेना, इस संस्थान की पहचान है। यहां ऐसे भी कर्मचारी हैं जिनके पास कोई प्रमाण नहीं कि वे पत्रिका के कर्मचारी हैं जबकि उन्‍हें काम करते हुए साल भर हो चुका है।

इकलौती सुविधा के नाम पर आने-जाने के लिए एक कैब हुआ करती थी, अब वह भी बन्द कर दी गई है। ड्राइवर रखने और पेट्रोल का खर्चा बचाने के उद्देश्य से ऐसा किया गया। इससे कर्मचारियों को तमाम मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है।

सबसे करीबी परिवहन केंद्र नोएडा के सेक्टर 18 या बोटैनिकल गार्डन के मेट्रो स्टेशन से इस ऑफिस की दूरी 14 किलोमीटर से ज़्यादा है। इतनी दूर ऑफिस होने पर लोग यहां जॉइन करने से हिचकते हैं पर नौकरी पर रखते समय बताया जाता है कि उन्‍हें कैब की सुविधा दी जाएगी, तो मन बना लेते हैं। एक कर्मचारी बताते हैं कि महीने भीर पहले तक ड्राइवर समेत 7 सीटर एक कैब हुआ करती थी। हाल ही में उसको बंद कर दिया गया है। उसमें भी 10-10 लोग भर कर बड़ी मुश्किल से सेक्टर 18 के मेट्रो स्टेशन से आया-जाया करते थे। शिफ्ट चेंज होने पर कर्मचारी को बहुत असुविधा होती थी, क्योंकि दूसरी शिफ्ट में एडजस्ट होना मुश्किल था। आए दिन कैब खराब भी हो जाया करती थी, जिससे कर्मचारियों को बहुत परेशान होना पड़ता था। करीब डेढ़ महीने पहले अचानक फरमान सुना दिया गया कि अब कैब की सुविधा नहीं दी जाएगी और नोएडा में नई शुरू हुई मेट्रो की एक्वा लाइन से या बस से आने जाने का सुझाव दिया गया।

एक कर्मचारी ने बताया- “ऑफिस के मुताबिक पहले आप 10-15 मिनट पैदल चल कर सेक्टर 142 के मेट्रो स्टेशन पहुंचें। वहां से 30 रुपए खर्च करके सेक्टर 52 पहुंचें। वहां उतर कर ई-रिक्शे से इलेक्ट्रॉनिक सिटी मेट्रो स्टेशन जाएं। वहां से मेट्रो लेकर बोटैनिकल गार्डेन पहुंचें, फिर गंतव्य के हिसाब से आगे का सफर तय करें। लौटने में भी यही हिसाब। बस से जाना है तो पहले करीब 15 मिनट पैदल चल कर, फ्लाई ओवर पार कर रास्ते में आती-जाती बस पकड़ें। बैठने की जगह शायद ही मिले। इसमें एक तरफ के 16 या थोड़ी सुविधा चाहते हैं तो 32 रुपए खर्च करें। यानी आने-जाने का रोज का कम से कम 70 रुपए का ज़्यादा खर्च, मतलब महीने का तकरीबन 2100 रुपए। कैब की अनुपस्थिति में आने-जाने का समय भी 30 से 45 मिनट ज़्यादा लगता। अब ऑफिस हमें इसके पैसे तो देता नहीं, जो हम लोग पिसते रहें।”

कैब बन्द करने पर महिला कर्मचारियों ने आवाज़ उठायी थी। सुरक्षा के लिहाज से उन्हें आने-जाने में काफी दिक्कत होने वाली थी। बवाल मचने पर अगले 15 दिनों तक कैब बहाल की गई, यह कह कर कि बदले में कोई व्यवस्था की जाएगी। 31 मार्च को कैब बन्द कर दी गई। ऐसा नहीं कि बदले में व्यवस्था नहीं की गई। पर व्यवस्था के हाल देखिए- कहा गया कि सभी चार-चार लोगों का ग्रुप बना लें और ओला/उबर करके आएं-जाएं। जो पैसा होगा, दे दिया जाएगा, मगर हर कैब में चार लोग होने ज़रूरी हैं। अब यहां से शुरू हुई सिर-फुटव्वल।

ग्रुप बनने के बाद बचे लोगों का न कोई ग्रुप बनाया गया, न उनके आने-जाने की कोई जिम्मेदारी ली गई, न खर्चा दिया गया। कुछ समय ऐसे चलने के बाद जैसे-तैसे लोगों ने अपनी शिफ्ट बदल-बदल कर ग्रुप बनाए लेकिन उसमें भी आपसी तनाव बढ़ने लगा। किसी के देरी से आने पर छोड़ कर निकल जाओ तो लड़ाई। पैसे कौन देगा के सवाल पर रोज मगजमारी। फिर खर्च हुए पैसे कब मिलेंगे, तय नहीं। पैसे कब मिलेंगे, पैसे कब मिलेंगे, यह सवाल संस्थान में पूरे वक्त गूंजता है। जवाब मिलता है, अभी ऊपर से पैसा आया नहीं। कभी हफ्ते भर बाद पैसा मिलता है, कभी 10 दिन बाद। कभी आता है, तो पहुंचते-पहुंचते खत्म हो जाता है और अगली आमद का इन्तज़ार करना पड़ता है। ओला-उबर का हर ड्राइवर ऑनलाइन पेमेंट भी नहीं लेता। हमेशा जेब में कैश रखना पड़ता है। इससे कर्मचारियों का बजट गड़बड़ाने लगा है।

कब किसने पैसे दिए, बिल किसके पास है, प्रिंट आउट निकालना, सबके नाम लिखना, पैसे मिलने पर बंटवारा करना, उसमें भी कई तरह के मनमुटाव होना अब रोज़ की बात है। डिजिटल विभाग के एक कर्मचारी बताते हैं- “हमारी पीएलआई खबरों की संख्या पर निर्भर करती है। जिस दिन कैब का हिसाब-किताब करना होता है। एक-दो खबरें कम हो जाती हैं, अगले दिन उसे कवर करना पड़ता है।”

परेशानी यहीं तक सीमित नहीं है। असली दिक्कत तब होती है, जब चार लोगों के ग्रुप में से एक या दो छुट्टी पर हों। अकेले हैं, फिर तो कोई पूछने वाला नहीं। अपने खर्च पर आइए-जाइए। कभी-कभी अचानक पता चलता है कि साथ जाने वाला कोई नहीं। पब्लिक ट्रांसपोर्ट से जाने में देरी होना आम है और एक मिनट भी देर से पहुंचने पर मेल डालना पड़ता है कि देरी क्यों हुई। अभी तक तीन लोगों के साथ आने पर खर्च दे दिया जाता था। पिछले कुछ दिनों से संस्थान की ओर से साफ फरमान जारी कर दिया गया है कि कैब में चार लोग नहीं आएंगे, तो पैसा नहीं मिलेगा। चार में से किसी एक का साप्ताहिक अवकाश या छुट्टी है, तो बाकी तीन ‘अब क्या करें’ वाली स्थिति में हक्के-बक्के रहते हैं। एडमिन से पूछने पर कह दिया जाता है कि पता कर लें कि आपकी शिफ्ट में आज कौन-कौन है, अगर उनके पास जगह हो तो उनके साथ आइए-जाइए।

एक ही बिल्डिंग के छठें तल पर डिजिटल विभाग के कर्मचारी बैठते हैं और नौवें तल पर प्रिंट विभाग के अलावा उत्तर-प्रदेश की डिजिटल टीम। दूसरे समूहों का शेड्यूल पता करना, उसमें अपने लिए जगह बनाना, काम छोड़-छोड़ कर साथ आने-जाने के लिए लोग ढूंढना, साथी न मिलने पर अपने खर्चे पर बस या  कैब में जाना और समय की बर्बादी से कर्मचारियों में तनाव बढ़ रहा है। ऑफिसर ग्रेड के कर्मचारियों के लिए कोई समस्या नहीं है। उन्होंने ऑफिस के आसपास ही 2 बीएचके, 3 बीएचके फ्लैट्स ले रखे हैं। अपने वाहन से आते-जाते हैं। सिरदर्द निचले दर्जे के कर्मचारियों के लिए है, जो दिल्ली में बमुश्किल रहने-खाने का खर्चा इस नौकरी से निकाल पाते हैं। कर्मचारियों के हर सवाल का एक ही जवाब है- जयपुर से आदेश है, हम क्या करें।


नोट: इस खबर में पत्रकारों का नाम उनकी सहमति से नहीं दिया गया है क्‍योंकि उनकी नौकरी पर खतरा आ जाने का संकट है


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