पहला पन्ना: नागरिकों पर अत्याचार की ख़बर नहीं देता प्रचारक मीडिया


आज द टेलीग्राफ ने जनहित की खबर दी है और बताया है कि सत्तारूढ़ पार्टी कैसे आम लोगों को या अपने विरोधियों को परेशान कर रही है। विनोद दुआ के मामले में सुप्रीम कोर्ट से फैसला आने के बावजूद नागरिकों के खिलाफ राजद्रोह के मामले बनाए जा रहे हैं और भाजपा नेता एफआईआर करवा कर लोगों को परेशान करने से बाज नहीं आ रहे हैं। अभिव्यक्ति की आजादी और सरकार का विरोध करने वालों के खिलाफ जबरन कार्रवाई के दोनों मामलों को टेलीग्राफ ने लीड बनाया है। ये खबरें किसी और अखबार में नहीं है।


संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
मीडिया Published On :


आज मैंने जितिन प्रसाद के भाजपा में शामिल होने पर छपी खबरों की तुलना मुकुल राय के भाजपा छोड़कर वापस तृणमूल में जाने की खबर से करने के बारे में सोचा था। लेकिन अखबारों में आकार-प्रकार और प्रस्तुति के लिहाज से मुकुल राय के भाजपा छोड़ने को भी उतना ही महत्व दिया गया है। इंडियन एक्सप्रेस ने भाजपा को हुए राजनीति नुकसान की भरपाई करने की कोशिश में एक्सप्लेन्ड के तहत बताया है कि यह तो होना ही थी। भाजपा उन्हें ‘भाव’ नहीं दे रही थी। इस विशेष खबर पर तीन बाईलाइन हैं और अंदर चाहे जो कहा गया हो यही शीर्षक या बात जितिन प्रसाद के लिए भी कही जा सकती थी। पर जर्नलिज्म ऑफ करेज के नाम पर पबलिसिटी फॉर अ पार्टी में यही होता है। मैं इसके विस्तार में जाने की जरूरत नहीं समझता। ऐसा करने के लिए तथ्यों की नहीं, विचारधारा की जरूरत है।

आज द टेलीग्राफ ने जनहित की खबर दी है और बताया है कि सत्तारूढ़ पार्टी कैसे आम लोगों को या अपने विरोधियों को परेशान कर रही है। विनोद दुआ के मामले में सुप्रीम कोर्ट से फैसला आने के बावजूद नागरिकों के खिलाफ राजद्रोह के मामले बनाए जा रहे हैं और भाजपा नेता एफआईआर करवा कर लोगों को परेशान करने से बाज नहीं आ रहे हैं। अभिव्यक्ति की आजादी और सरकार का विरोध करने वालों के खिलाफ जबरन कार्रवाई के दोनों मामलों को टेलीग्राफ ने लीड बनाया है। ये खबरें किसी और अखबार में नहीं है। इसलिए आज सबसे
पहले इसी की चर्चा करता हूं।

टेलीग्राफ की इस खबर का शीर्षक है, “वह जो कार्टून से डरता है।” खबर में अंदर लिखा है कि (कल की घटनाओं के बाद) राहुल गांधी ने किसी का नाम लिए बगैर ट्वीट किया, “वह हर चीज से डरता (ते हैं) है – सत्य, सवाल, कार्टून …।” अखबार ने आगे लिखा है, समकालीन भारत में जो कुछ हो रहा है वह इतना साफ है कि  “वह” कौन है, समझने के लिए किसी संकेत या इशारे की जरूरत नहीं है। इसके बाद बताया गया है कि लक्ष्यद्वीप में रहने वाली फिल्म निर्माता आयशा सुल्ताना के खिलाफ राजद्रोह का आरोप लगा है। जाने-माने कार्टूनिस्ट मंजुल के खिलाफ सरकार ने ट्वीटर से शिकायत की है और ट्वीटर ने कार्टूनिस्ट से स्पष्टीकरण मांगा है। यह सब सार्वजनिक होने के बाद एक मीडिया संस्थान ने उनके साथ किए गए करार को रद्द कर दिया है। किसी ने लिखा है कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।

द टेलीग्राफ ने दोनों खबरों को एक साथ छापा है। कार्टूनिस्ट मंजुल वाली खबर का शीर्षक है, कार्टूनिस्ट के खिलाफ कार्रवाई। दूसरी का शीर्षक है, जैव-हथियार कहने के लिए राजद्रोह की एफआईआर। बैंगलोर डेटलाइन से छपी इस खबर में बताया गया है कि एक टेलीविजन चर्चा में “जैव हथियार” कहने के लिए आयशा के खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज कराया गया है। उन्हें 20 जून को पुलिस के समक्ष पेश होना है। टेलीविजन चैनल पर उन्होंने क्या कहा और सुनने वाले या शिकायत करने वाले ने क्या समझा उससे अलग मामला यह है कि किसी को जैव हथियार कहना ना तो असंसदीय है और ना गाली। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर सूचना की तरह छापा है और इसमें बताया है कि उसने अपनी फेसबुक पोस्ट में कहा कि उसने लक्ष्यद्वीप के प्रशासक (और भाजपा नेता) प्रफुल खोडा की तुलना जैव हथियार से की थी। प्रफुल खोडा लक्ष्यद्वीप के प्रशासक के रूप में क्या कर रहे हैं वह सब भी दिल्ली के अखबारों में नहीं के बराबर छपी है। इसलिए जैव हथियार कहा जाना
भारी लग सकता है पर बेशक अच्छी तुलना है।

चुनाव जीतने में व्यस्त सरकार चुनाव जीतने के लिए क्या कर रही है इसका प्रचार करने वाले दिल्ली के अखबार जो खबरें नहीं छापते हैं उनके लिए सोशल मीडिया और वेब पत्रिकाएं बिल्कुल जरूरी हैं। नहीं तो ज्यादातर टेलीविजन चैनल अक्सर सरकार की आरती उतारते रहते हैं। नागरिकों को यह नहीं बताते कि सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं और नागरिकों के साथ कैसा बर्ताव कर रही है। आपको याद होगा, अमेरिका
स्थित एक डिजिटल फॉरेंसिक कंपनी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जनवरी, 2018 में महाराष्ट्र के भीमा- कोरेगांव कस्बे की हिंसा के कुछ दिनों बाद सामाजिक कार्यकर्ता रोना विल्सन के कंप्यूटर में उन्हें “फँसाने वाली” 22 फाइलें प्लांट की गई थीं। 15 नवंबर 2018 से इन फाइलों को प्रमुख साक्ष्य मानकर पुणे पुलिस और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा इनका हवाला दिया जा रहा है। विल्सन और 15 अन्य लोगों, जिनमें वकील, शैक्षणिक और कला जगत के लोग शामिल हैं, पर भारत सरकार के खिलाफ साजिश रचने के आरोप लगाकर जेलों में डाल दिया गया है (सिवाय वरवरा राव के जो फिलहाल जमानत पर हैं)। फिलहाल ये लोग बिना मुकदमे की सुनवाई के ही दो सालों से अधिक समय से जेल में हैं। (पंकज चतुर्वेदी की फेसबुक पोस्ट, 21अप्रैल 2021)।

इस रिपोर्ट के बावजूद मामला अदालत में है और “निर्दोष” जेल में। ऐसी सरकार ने हमें  ‘न्याय दिलाने’ के लिए सोशल मीडिया और सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्‍थानों के लिए दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 बनाए हैं और इसकी आड़ में भी नागरिकों को परेशान किया जा रहा है। बात इतनी ही नहीं है इसी कानून की आड़ में यही सरकार अपने प्रवक्ता संबित पात्रा का बचाव कर चुकी है और पूरी बेशर्मी से मनमानी कर रही है। लेकिन अखबार खबर नहीं देते। सेंट्रल विस्टा परियोजना के बारे में किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि देश को आर्थिक रूप से बर्बादी के कगार पर पहुंचाने वाली सरकार इतनी महंगी परियोजना टाल क्यों नहीं रही है। बहुप्रचारित पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था और 200 स्मार्ट सिटी की योजना अब भुला दी गई है लेकिन सेंट्रल विस्टा का काम पूरी तेजी से चल रहा है पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाकर। उसमें 50 प्रतिशत टैक्स है तब भी।

अखबारों का काम ऐसी खबरें देना है जिससे सरकार जो कर रही है वह समझ में आए। बेशक इसमे पुरानी खबरें और उनका फॉलोअप देना शामिल है पर ज्यादातर अखबारों ने यह सब करना लगभग छोड़ दिया है। कुछ कट्टर हिन्दू किस्म के अखबार तो सरकार की कार्रवाइयों के समर्थन में रिपोर्ट से लेकर मंत्रियों के लेख तक छापते रहते हैं। आज नहीं छपने वाली खबरों की चर्चा हो रही है तो आइए आपको सेंट्रल विस्टा परियोजना से संबंधित कुछ तथ्य बता दें जो हैं तो पुराने लेकिन मुख्यमंत्री नरेंन्द्र मोदी से लगाव का कारण समझने में सहायक होंगे। इस पर thecritic.co.uk में कपिल कोमीरेड्डी ने एक विस्तृत टिप्पणी लिखी है। पेश हैं उसकी खास बातें।

1. उस समय भाजपा समर्थित शिवसेना के मनोहर जोशी (2002) में लोकसभा के अध्यक्ष थे। उन्हें यह यकीन था कि संसद भवन अभिशप्त है। बारहवीं लोक सभा के अध्यक्ष गन्ती मोहन चन्द्र बालायोगी का 3 मार्च 2002 को आंध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी जिले, के कैकालुर में एक हेलीकाप्टर दुर्घटना में निधन हो गया था। इससे पहले 27 जुलाई 2002 को दिल का दौरा पड़ने से उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के अध्यक्ष कृष्णकांत का निधन हो गया था। इससे आठ महीने पहले आतंकवादी संसद के चौखट तक पहुंच गए थे और उन्हें रोकने में दर्जन भर से ज्यादा सुरक्षाकर्मी मारे गए थे। बीच में कुछ सांसदों की भी मौत हुई थी।

2. मनोहर जोशी ने अधिवक्ता और वास्तु विशेषज्ञ अश्विनी कुमार बंसल को सुधार के उपाय सुझाने के लिए कहा। निरीक्षण के दौरान बंसल को नकारात्मक कंपन और ऊर्जा का अहसास हुआ। लोकसभा अध्यक्ष को एक गोपनीय पत्र में उन्होंने कहा कि यह गोल बिल्डिंग है जो देश की राजनीति के लिए बुरी है। विदेशियों का बनाया, गोल मतलब शून्य और हिन्दुत्व से कोई निष्ठा न होने जैसी बातें भी थीं।

3. कई सांसदों और उनके बच्चों की अचानक मृत्यु को भवन के बुरे भविष्य का सबूत बताया गया और चार भारतीय प्रधानमंत्रियों के अस्वाभाविक निधन को भी बिल्डिंग के दोष का कारण बताया गया। उन्होंने सलाह दी थी कि संसद भवन को तुरंत खाली कर दिया जाए, एक संग्रहालय में बदल दिया जाए और संसद को तत्काल पास के कनवेंशन सेंटर में स्थानांतरित कर दिया
जाए।

4. 2012 में कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार ने इस पर फिर काम शुरू किया। इस बार बहाना पुरानी बिल्डिंग और उसका प्रभाव आदि था। वहां से निकलने के लिए सुरक्षा को कारण बताया गया पर यह योजना किसी समिति के रूप में मर गई।

5. नरेन्द्र मोदी ने इसकी फिर से शुरुआत की। वे खुद को न सिर्फ प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं बल्कि नए भारत का पितामह भी मानते हैं। उन्होंने इसके लिए 2 बिलियन पौंड से ज्यादा आवंटित कर दिए गए हैं जबकि स्वास्थ्य से संबंधित आपात आवश्यकताओं के लिए आवंटन 1.6
बिलियन पौंड ही है। यह एक अजीब विडंबना है कि अनजान मोदी खुद वही काम कर रहे हैं जो अंग्रेजों ने सत्ता के शिखर पर होते हुए किया था।

अब आप समझ सकते हैं कि पूर्व नौकरशाहों ने अपनी चिट्ठी में जब लिख दिया कि इस प्रोजेक्ट को ऐसे समय में भी स्थगित नहीं करने का कारण यह माना जा रहा है कि बिल्डिंग अभिशप्त है तो केंद्रीय मंत्री ने अपने पूर्व साथियों और नौकरशाहों को पढ़े लिखे मूर्ख कहा।  इस पर 10 जून 2021 को द टेलीग्राफ में खबर छपी है। जब आप इस मामले में पूरी रपट पढ़ेंगे तो समझ में आएगा कि सरकार की प्रतिक्रिया इतनी सख्त क्यों थी और सरकार वास्तु आदि की बात नहीं मानती है यह किसी सिख मंत्री से कहलवाने का भी कोई कारण है क्या?

द क्रिटीक की यह ख़बर पूरी यहाँ पढ़ें।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और प्रसिद्ध अनुवादक हैं।


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