Home समाज तीन दशक बाद रामायण की वापसी उर्फ़ “आध्यात्मिक लॉकडाउन” का पहला दिन!

तीन दशक बाद रामायण की वापसी उर्फ़ “आध्यात्मिक लॉकडाउन” का पहला दिन!

राजगोपाल ने अपनी किताब में बताया था कि कैसे आरएसएस और जनसंघ ने रामायण के जरिये राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए जनसमर्थन इकट्ठा किया था. “वर्ष 1987-1988 में 18 महीनों तक चले इस सीरियल ने विशुद्ध रूप से भारत की राजनीति पर असर डाला. हर रविवार को 45 मिनट तक प्रसारित होने वाले रामायण ने भारत के हिंदुओं की 'चेतना' को जगाने का काम किया,” अरविंद राजगोपाल ने अपनी किताब में लिखा है.

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कोरोना के चक्कर में देशव्यापी लॉकडाउन न हुआ रहता तो आज गेंदे के फूल की माला टीवी पर पहनायी जाती. फिलहाल चमेली, अक्षत और रोली से रामायण धारावाहिक की दोबारा प्राण प्रतिष्ठा कर दी गयी है. आखिर रामानंद सागर का बनाया सीरियल रामायण ही था जिसने इस देश में नये-नये आये टीवी को मंदिर का साक्षात रूप दे दिया था और इस सीरियल के अभिनेताओं को भगवान बनाकर कैलेंडर के रूप में घर घर में टांग दिया था.

दशकों बाद दूरदर्शन पर रामायण के प्रसारण की वापसी लीला सिन्हा के घर में आस्था के पागलपन का पुनर्जागरण है, तो गजेंद्र प्रसाद की पुरानी इच्छा का सरकार ने सम्मान किया है.

गजेंद्र प्रसाद लंबे समय तक रेलवे में पार्सल बाबू रहकर रिटायर हुए हैं. वे रामायण के प्रसारण पर बेहद खुश दिखते हैं. वे कहते हैं, “रामायण को तो बंद होना ही नहीं चाहिए था. कुछ कार्यक्रम ऐसे होते हैं जिसे समाज के हित में जारी रखना चाहिए।”

मीडियाविजिल ने रामायण के पुनर्प्रसारण के पहले दिन आम लोगों सहित तमाम उन जानकारों से बात कर के जानने की कोशिश की कि वैश्विक आपदा की इस घड़ी में रामायण और महाभारत का दोबारा प्रसारण क्यों किया जा रहा है। कौन है इस फैसले के पीछे? इस निर्णय के पीछे की राजनीति क्या है?

“जनता” की मांग पर…

रामायण के पुनर्प्रसारण के उत्साह में शनिवार को प्रकाश जावडे़कर ने ट्वीट करते हुए पूछा, “मैं रामायण देख रहा हूं. क्या आप भी?”

दरअसल, वे जिस हिंदू मध्यमवर्गीय दर्शक को संबोधित कर रहे थे, संभव है वह अपने घरों में कैद रामायण ही देख रहा हो लेकिन ठीक उसी समय टीवी पर हज़ारों मजदूरों की पैदल ही दिल्ली से यूपी और बिहार के गांवों की तरफ लौटने की दर्दनाक खबरें भी आ रही थीं. लोग ट्विटर पर सरकार से मजदूरों की मदद की दरख्वास्त कर रहे थे, लेकिन भक्तिभाव में डूबे जावडे़कर शायद यह नहीं देख पा रहे थे.

बाद में ट्विटर पर अपनी थू-थू देख प्रकाश जावडे़कर ने ट्वीट डिलीट कर दिया. थोड़े ही देर में एक नयी तस्वीर डाली जिसमें वे एक अधिकारी के साथ कोरोना संबंधित मीटिंग का दावा करते दिखे.

कोरोना के चलते देश में जब 20 लाशें बिछ चुकी थीं और महामारी अपने तीसरे स्टेज की दहलीज पर खड़ी थी, तब शुक्रवार को सूचना व प्रसारण मंत्री ने ट्वीट कर के बताया, “जनता की मांग पर कल शनिवार 28 मार्च से रामायण का दोबारा दूरदर्शन के नेशनल चैनल पर प्रसारण शुरू होगा. पहला एपिसोड सुबह 9.00 बजे और दूसरा एपिसोड रात 9.00 प्रसारित होगा.”

इस घोषणा के थोड़े ही देर बाद यह भी बताया कि डीडी भारती पर महाभारत का भी दोबारा प्रसारण शुरू किया जा रहा है.

‘जनता की मांग’ बताकर दोनों ही धारावाहिकों को टीवी पर पेश कर दिया गया. वैसे जनता ने रामायण की मांग किस माध्यम पर की? कितने लोगों ने की? यह सब प्रकाश जावड़ेकर ने बताने की जरूरत नहीं समझी, हालांकि इसका जवाब सुदर्शन न्यूज़ के एडिटर-इन-चीफ़ सुरेश चव्हाणके ने दिया.

मीडियाविजिल से बात करते हुए चव्हाणके ने कहा, “रामायण के प्रसारण के मुद्दे पर मैंने सरकार से बात की थी. अन्य लोगों ने भी सूचना व प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से बात की जिनमें एक मैं भी था.”

चव्हाणके ने दावा किया कि उनके समर्थकों ने ट्विटर पर रामायण के प्रसारण के समर्थन में ट्विटर ट्रेंड भी चलाया था. उन्होंने बताया कि रामायण के प्रसारण के संबंध में उनकी बात रामानंद सागर के परिवार से भी हुई थी.

मीडिया आलोचक और द हूट की संस्थापक संपादक सैवंती नैनन के अनुसार, “मुझे नहीं पता कि कितने लोगों ने सरकार से रामायण के प्रसारण की अपील की थी, लेकिन सरकार के लिए रामायण के प्रसारण का यह मुफ़ीद वक्त है. रामायण और राम मंदिर के निर्माण के कॉकटेल से वे लोगों के दिमागों पर लॉकडाउन को हावी नहीं होने देना चाहते. लॉकडाउन के कारण बढ़ी परेशानियों और खत्म होते अवसरों को सरकार रामायण के जरिये लोगों के दिलो-दिमाग से ओझल करने की कोशिश करेगी.”

सम्प्रेषण की दक्खिनी कला

ऑप्टिक्स की राजनीति कब किसे चकमा दे जाए, कोई नहीं जानता. जिस अखिल भारतीय थाली पीटन आयोजन को “मास हिस्टीरिया” बताया जा रहा था, वह भाजपा और आरएसएस की सत्ता के लिए सफल प्रयोग था. वे बखूबी जानते हैं कि एक आम भारतीय मास हिस्टीरिया का हिस्सा होते हुए भी मास हिस्टीरिया को नहीं समझ पाता. न ही उससे बहुत ज्यादा फर्क पड़ता है. उसकी प्राथमिकताएं अलग हैं.

जनता कर्फ्यू के दिन अपनी छत पर लगातार पंद्रह मिनट तक घर के कोने-कोने में घंटी बजाकर कोरोना वायरस के प्रकोप को दूर भगाकर गजेंद्र प्रसाद (71) ने राष्ट्र-हित में अपना योगदान दिया है. वे कहते हैं, “यह एक अभूतपूर्व मौका है जब समूचा देश एक होकर खड़ा है. यह मोदी जी के बिना संभव नहीं था.”

इसके विपरीत गया के डोभी थानाक्षेत्र में संतोष कुमार का परिवार परेशान है कि उनके बड़े भाई का परिवार दिल्ली में फंस गया है. उनके लौटने का कोई साधन नहीं है. थाली संतोष के घर भी बजी थी. थाली क्यों बजाने को बोला गया था? जवाब में संतोष कहते हैं, “मोदीजी बोले थे थाली बजाने. कोरोना वायरस भागता है उससे.”

प्रधानमंत्री के संबोधन के अनुसार थाली और घंटी बजाकर डॉक्टरों, सफाईकर्मियों, मीडियाकर्मियों व उन सभी लोगों का शुक्रिया अदा करना था जो कोरोना आपदा की घड़ी में भी अग्रिम पंक्ति में डटे रहकर जनता की सेवा कर रहे हैं. संतोष और गजेंद्र दोनों को एक ही तरह का संदेश मिला, पीएम के कहे से एकदम अलग.

संप्रेषण की इस कला को वर्तमान सरकार समझती है. अखिल भारतीय स्तर पर ध्वनि संप्रेषण के अद्भुत अभ्यास से उसने भारतीय जनमानस के मन और मिज़ाज को भांपा. उसने पाया कि हां, सब कुछ उसके कंट्रोल में है. यह ठीक ऐसा है कि पहले एक कंपनी ऑडिएंस सर्वे करती है. अब प्रॉडक्ट प्लेसमेंट की बारी है. भाजपा और आरएसएस ने अपने अनेक उत्पादों में से एक, सर्वाधिक लोकप्रिय धार्मिक धारावाहिकों को मार्केट में प्लेस कर दिया.

भाजपा और आरएसएस की राजनीति के लिए कोरोना वायरस का लॉकडाउन अपने एजेंडे को विस्तार देने का अवसर लेकर आया है. उसके लिए यह मैसेज टेस्टिंग के प्रयोग का बेहतरीन अवसर है. बीते दिनों ही यह भी खबर आयी कि कोरोना पीड़ितों को क्वारेंटाइन में प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों का संकलन दिया जा रहा है. प्रसार भारती के एक अधिकारी ने बताया कि पहले भी प्रधानमंत्रियों के भाषणों का संकलन इस तरह के मौकों पर दिया जाता रहा है. इसमें कुछ भी नया नहीं है.

“प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों के संकलन को लोग काफी पसंद करते हैं. उनकी लोकप्रियता ऐसी है कि लोग उसे कीमत देकर भी खरीदना चाहते हैं,” अधिकारी ने कहा.

आध्यात्मिक लॉकडाउन पार्ट-2?

अस्सी का दशक अपनी ढलान के साथ भारतीय जनचेतना में भयानक परिवर्तन कर रहा था. उसका मुख्य कारक मंदिर-मंडल की राजनीति तो थी ही. भारत की अर्थव्यवस्था में भी आमूलचूल बदलाव की तैयारी की जा रही थी. इन सभी मोर्चों पर सरकारों और राजनीतिक दलों को व्यापक जनसमर्थन की जरूरत थी. और रामायण, जनमत निर्मित करने का सशक्त जरिया बन गया.

रामायण और हिंदुत्व की राजनीति के संबंध में सुरेश चव्हाणके ने मीडियाविजिल से एक रोचक बात साझा की. उन्होंने कहा, “हमारे देश में रामायण की वजह से आध्यात्मिक लॉकडाउन हुआ है. आज लोग कोरोना वायरस के डर से, सरकार की अपील पर अपने-अपने घरों में बंद हैं. एक वक्त जब रामायण टीवी पर आता था तो ट्रेनें रुक जाया करती थीं. घरों में काम रुक जाया करता था. सड़कें सुनसान हो जाया करती थीं.”

चव्हाणके के अनुसार, रामायण के प्रसारण को किसी तरह की राजनीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए.

चव्हाणके की बातों से मीडिया समीक्षक शैलजा बाजपेयी इनकार नहीं करतीं. वर्ष 1988 में रामायण के प्रसारण के खत्म होने के एक सप्ताह बाद ही शैलजा ने लिखा था, “न पहले कभी ऐसा हुआ था और शायद न भविष्य में ऐसा कुछ होगा. कन्याकुमारी से कश्मीर और गुजरात से गोरखपुर तक करोड़ों लोग एक साथ बैठकर एक धारावाहिक को देख रहे हों. यह अद्भुत था.”

बहुचर्चित किताब “पॉलिटिक्स ऑफ्टर टेलीविज़न” के लेखक अरविंद राजगोपाल ने भी अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि जब ये रामायण टीवी पर आता था तब बसें रुक जाती थीं क्योंकि लोग सड़कों पर टीवी की तलाश में उतर जाते थे. सड़कें खाली होती थीं. दुकान बंद हो जाते थे. कई घरों में तो सीरियल शुरू होने से पहले लोग पूजा करने लग जाते थे क्योंकि उनके लिए रामायण के 45 मिनट बहुत अहम होते थे.”

राजगोपाल ने अपनी किताब में बताया था कि कैसे आरएसएस और जनसंघ ने रामायण के जरिये राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए जनसमर्थन इकट्ठा किया था. “वर्ष 1987-1988 में 18 महीनों तक चले इस सीरियल ने विशुद्ध रूप से भारत की राजनीति पर असर डाला. हर रविवार को 45 मिनट तक प्रसारित होने वाले रामायण ने भारत के हिंदुओं की ‘चेतना’ को जगाने का काम किया,” अरविंद राजगोपाल ने अपनी किताब में लिखा है.

गौर करने की बात है कि राम जन्मभूमि विवाद के फैसले के बाद रामायण के प्रसारण का यह पहला मौका है. इसका असर भारतीय जनमानस पर क्या होगा, जबकि समाज में बड़े स्तर पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हो चुका है? रामायण के प्रसारण से ज्यादा धार्मिक और उन्मादी दोनों कंटेंट हमारे टीवी चैनलों पर दिन-रात प्रसारित होते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने मीडियाविजिल से बातचीत करते हुए कहा कि कोरोना वायरस के लॉकडाउन के बीच रामायण का प्रसारण सरकार की प्राथमिकताओं का उदाहरण है. उन्होंने क्वारेंटाइन में गये लोगों को बांटे जा रहे प्रधानमंत्री के भाषणों के संकलन में बारे में कहा, “यह सरासर दीवानापन है.”

आरएसएस के असम प्रांत प्रचारक गौरांगजी के अनुसार, भारत में पैदा हुआ हर व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का हो, उसके चरित्र निर्माण में रामायण का रोल है. यह दुर्भाग्य है कि रामायण के पुन: प्रसारण में 25 साल लग गये.

गौरांग और सुरेश चव्हाणके दोनों ही रामायण के प्रसारण को राजनीति से परे रखने की बात पर ज़ोर देते हैं. वे मानते हैं कि रामायण ने राम मंदिर आंदोलन को लोगों की भावनाओं से जोड़ने का काम किया था.. पर रामायण का राम मंदिर आंदोलन से संबंधित होना महज एक संयोग था।”

यह भी एक तथ्य है कि सरकारी प्रसारक दूरदर्शन पर रामायण के प्रसारण की अनुमति कांग्रेस की सरकार के दौरान दी गयी थी. वर्ष 2004 में आउटलुक में अरविंद राजगोपाल ने लिखा था, “पब्लिक ब्रॉडकास्टर दूरदर्शन के लिए वर्ष 1987 तक धार्मिक कार्यक्रमों के प्रसारण से जुड़े नियम होते थे. भारत के सेकुलर चरित्र के कारण  बतौर सरकारी संस्थान दूरदर्शन इस नियम को मानने के लिए बाध्य था. दूरदर्शन के जरिये किसी विशेष समुदाय के लिए खास कार्यक्रम प्रसारित नहीं किये जा सकते थे.” राजगोपाल का मानना है कि इस सीरियल को बढ़ावा कांग्रेस सरकार ने दिया लेकिन इसका फायदा बीजेपी ने उठाया.

सैवंती नैनन रामायण के प्रसारण का दूसरा पक्ष उकेरती हैं, “डांवाडोल अर्थव्यवस्था के बीच दक्षिणपंथी राजनीति वापस धर्म को अपनी राजनीति का ध्रुव बना रही है. उदाहरण के लिए देखिए कि राष्ट्रीय स्तर पर लॉकडाउन के बावजूद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में राम मंदिर संबंधित कार्यक्रमों को नहीं टाला. प्रश्न यह है कि क्या यह धर्म की अफ़ीम कारगर होगी? यह 1987 का नहीं, 2020 का भारत है. बेरोजगारी की त्रासदी से जूझती युवा पीढ़ी नौकरियों की तालाश में है. वह नौकरियों की जगह शायद ही धर्मांधता को तवज्जो दे।”


रोहिण कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं और मीडियाविजिल के लिए नियमित रूप से लिखते हैं

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