चिन्मयानंद और चिदंबरम: दोनों केस में अख़बारों की रिपोर्टिंग अलग क्यों ?

संजय कुमार सिंह संजय कुमार सिंह
मीडिया Published On :


दो पूर्व गृहमंत्रियों, चिन्मयानंद और चिदंबरम में एक छोटे हैं एक बड़े। छोटे शायद उम्र में भी छोटे हों पद में भी चिन्मयानंद पूर्व गृह राज्य मंत्री हैं और चिदंबरम गृहमंत्री के साथ पूर्व वित्त मंत्री भी रहे हैं। चिन्मयानंद और चिदंबरम दोनों के खिलाफ मामले चल रहे हैं। दोनों जेल में हैं। चिन्मयानंद भाजपा नेता हैं और मामला उत्तर प्रदेश में है जहां भाजपा की ही सरकार है। इसलिए तकनीकी रूप से जेल में हैं। प्रधानमंत्री के शब्दों में कहूं तो उनका मामला ‘डबल इंजन की सरकार’ देख रही है। चिदंबरम के खिलाफ मामला ईडी और सीबीआई देख रही है। दोनों केंद्र सरकार के नियंत्रण में और नियंत्रण ऐसा जबरदस्त कि राकेश अस्थाना के खिलाफ एफआईआर होने पर भी कार्रवाई नहीं हुई और जांच अधिकारी ने ही छुट्टी मांग ली। पर वह अलग मामला है। अभी चिन्मयानंद और चिदंबरम ही।

चिदंबरम के बारे में आज के अखबारों में खबर है। मैं नवोदय टाइम्स की खबर का उल्लेख कर रहा हूं। शीर्षक है, “चिदंबरम की जमानत अर्जी पर हाईकोर्ट का फैसला सुरक्षित”। एजेंसी की यह खबर इंटरनेट पर नहीं मिली। इसलिए अखबार से देखकर टाइप कर रहा हूं। इसके मुताबिक अदालत में पी चिदंबरम की ओर से कहा गया है, “मैं कभी इंद्राणी मुखर्जी से नहीं मिला। लॉगबुक में आगंतुकों के प्रवेश की जानकारी होगी। मैं लॉगबुक को मानूंगा।” खबर में आगे लिखा है, (सीबीआई की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार) मेहता ने कहा कि चिदंबरम ने इंद्राणी से मुलाकात की थी और जांच के दौरान उन्हें पता चला कि वित्त मंत्री के दफ्तर का आगंतुक रजिस्टर उपलब्ध नहीं है तथा उसे हटा दिया गया है।

इसमें, “तथा उसे हटा दिया गया है” आरोप ही है। मुझे नहीं लगता कि रजिस्टर को संभाल कर रखने की जिम्मेदारी चिदंबरम की है। इसका दोनों मतलब है, चिदंबरम को पता था इसलिए हटा दिया गया और सामान्य तौर पर पुराना रजिस्टर उपलब्ध नहीं है। अब इसमें आपको कौन सही लगता है यह बिल्कुल निजी सोच और समझ का मामला है पर तथ्य यही है कि चिदंबरम को पैसे देने का आरोप लगाने वाली (जो खुद अपनी बेटी की हत्या के आरोप में जेल में हैं और निर्दोष होने की उनकी मौखिक दलीलों को अदालत ने उनके मामले में नहीं माना हे) इंद्राणी मुखर्जी के चिदंबरम से मिलने के सबूत नहीं हैं। यह अदालत में स्वीकार किया गया लगता है।

दूसरी ओर, चिन्मयानंद पर उनके संस्थान में पढ़ने वाली छात्रा ने बलात्कार का आरोप लगाया है। एफआईआर में क्या दर्ज और क्या नहीं मैं नहीं जानता पर एक इंटरव्यू में उसने कहा है और यह शीर्षक है, “तड़के मालिश, दोपहर में ‘सेक्स’ के लिए बुलाता था चिन्मयानंद, भयावह क्षणों को याद कर कांपी पीड़िता” इसमें उसने कहा है, “चिन्मयानंद जब भी आश्रम में होता था तो दो बार उसे बुलाता था। सुबह 6 बजे वह मसाज कराने के बाद क्लासेज खत्म होने पर 2.30 बजे दोबारा बुलाता था। इसी दौरान उसने कई बार उसका रेप किया। उसने मना किया तो हाथ भी उठाया। वीडियो वायरल करने की धमकी दी। वह डर की वजह से अक्सर उसके बुलावे पर चली जाती थी। हॉस्टल के बाहर चिन्मयानंद के गनर उसे दोनों वक्त लेने आते थे। बकौल पीड़िता, ‘मैंने चिन्मयानंद को बोला कि आप अपने आदमी मत भेजा करो। हॉस्टल में सब गलत मतलब निकालते हैं। मैं खुद आ जाऊंगी आपके पास।’ (/hindi.theprint.in से कॉपी/पेस्ट।)

इंद्राणी मुखर्जी के आरोप के मुकाबले यह आरोप बहुत गंभीर है। इसकी पुष्टि चिन्मयानंद के आदमियों से हो सकती है। मुझे नहीं पता की गई कि नहीं और जांच कैसे हो रही है। पर चिदंबरम को कैसे गिरफ्तार किया गया आप जानते हैं और चिन्मयानंद को कितनी छूट मिली यह किसी से छिपा नहीं है। और यह सब मीडिया की रिपोर्ट से स्पष्ट है। मैं नहीं जानता इसमें क्या सही है और क्या गलत। या सब सब सही है अथवा सब गलत। पर मेरा मानना है कि अदालत में चल रहे ऐसे हाईप्रोफाइल और चर्चित मामलों में जांच एजेंसियां चुनिन्दा ‘लीक’ से प्रभावित पक्ष की छवि बनाने और बिगाड़ने का काम करती आई हैं। दूसरी ओर, इससे अदालत और न्याय व्यवस्था की छवि खराब हो रही है। निष्पक्षता पर उंगली उठाने जैसी स्थिति बन रही है। इसपर किसी का ध्यान नहीं है। अदालतों को अपनी छवि बनाने के लिए आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए और इसका आसान उपाय अपनाना अनुचित होगा कि रिपोर्टिंग रोक दी जाए। मामला इतना पारदर्शी और निष्पक्ष होना चाहिए कि देश की न्याय व्यवस्था की साख बनी रहे।


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