मीडिया का खेल: अमेरिकी पिट्ठू थे तो इन्क़लाबी, लड़े तो आतंकवादी हुए तालिबान!


“इस्लामिक आतंकवाद” आज आमतौर पर इस्तेमाल होने वाला टर्म है। ये शब्द समूह एक हथियार है जिससे एक विशेष छवि निर्मित की जाती है। पहले तो ये समझना जरूरी है कि इस्लाम एक धर्म के रूप आपके लिए अच्छा या बुरा हो सकता है लेकिन इसका आतंकवाद से कोई लेना देना नहीं है। अब आप जब बार बार इस शब्द को पढ़ते हैं तो धीरे धीरे हर उस इंसान को आतंकवादी मानने लगते हैं जो इस्लाम को फॉलो करता है। भारत सहित दुनिया के बहुत से देशों में मुसलमानों पर हमले को इस छवि निर्माण का नतीजा समझ सकते हैं।


सलमान अरशद सलमान अरशद
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एक समय था जब युद्ध सिर्फ हथियारों से ही लड़े जाते थे लेकिन अब लड़ने के दो ऐसे तरीक़े ईजाद हो गए हैं जिन पर इस रूप में हमारा ध्यान नहीं जाता कि ये भी हथियार हैं।

सूचना आज के दौर में एक हथियार है। (हलांकि सूचना का इस्तेमाल कई और रूपों में भी हो रहा है) आपको निश्चित सूचना देकर या आपसे ज़रूरी सूचनाओं को छिपाकर इस हथियार का इस्तेमाल किया जाता है।

दूसरा हथियार है मनोवैज्ञानिक रूप से व्यक्ति, समाज या देश को दबाव में रखना। इसके लिए सूचनाओं का निश्चित प्रारूप में इस्तेमाल किया जाता है।

कुछ उदाहरण लेकर इसे समझने की कोशिश करते हैं। पिछली एक सदी में अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने लगभग एक करोड़ लोगों की हत्या की है। आज भी वो दुनिया का स्वयंभू चौधरी है। लेकिन क़ातिल के रूप में गालियां स्टालिन और माओ को दी जाती हैं। दरअसल मीडिया ने अमेरिकी क़त्लेआम को “शांति और लोकतंत्र” के हित में दिखाया है। ये बात हलांकि आसानी से स्वीकार्य तो नहीं होगी पर सच तो यही है कि हमारा सोचना बहुत हद तक मीडिया से नियंत्रित है।

तालिबान को अब तक हमें एक आतंकवादी संगठन के रूप में दिखाया गया है, हमने ये भी देखा कि 20 साल से अफगानिस्तान की धरती पर अमेरिकी सेना डटी हुई थी, आप शायद भूले नहीं होंगे कि सोवियत संघ के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए अमेरिका ने तालिबान को खड़ा किया था। यानी तालिबान जब सोवियत संघ से लड़ रहे थे, हीरो थे। लेकिन तालिबान जब अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए उपयोगी नहीं रहे आतंकवादी बना दिये गए। अब जब चीन अमेरिकी साम्रज्यवाद को चुनौती दे रहा है तो फिर से अमेरिकी और ब्रिटिश साम्रज्यवादी “आतंक” के पर्याय तालिबान को अफगानिस्तान सौंप रहे हैं। बहुत मुमकिन है कि तालिबान से चीन को लेकर कोई सौदेबाजी हुई हो। आने वाले कुछ सालों में फिर से तालिबान आतंकवादी से अगर देशभक्त जंगजू बना दिये जायें तो हैरान मत होइएगा। और ये सब होगा सूचना के विशेष इस्तेमाल के ज़रिए।

सूचना को एक हथियार के रूप में आज सभी देश और राजनीतिक समूह इस्तेमाल कर रहे हैं लेकिन आम जनता के रूप में हमारी नज़र इस पर कम होती है।

सूचना के निश्चित पैटर्न मनोवैज्ञानिक हथियार या टूल के रूप में कैसे इस्तेमाल होते हैं, इसे देशी उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं।

“इस्लामिक आतंकवाद” आज आमतौर पर इस्तेमाल होने वाला टर्म है। ये शब्द समूह एक हथियार है जिससे एक विशेष छवि निर्मित की जाती है। पहले तो ये समझना जरूरी है कि इस्लाम एक धर्म के रूप आपके लिए अच्छा या बुरा हो सकता है लेकिन इसका आतंकवाद से कोई लेना देना नहीं है। अब आप जब बार बार इस शब्द को पढ़ते हैं तो धीरे धीरे हर उस इंसान को आतंकवादी मानने लगते हैं जो इस्लाम को फॉलो करता है। भारत सहित दुनिया के बहुत से देशों में मुसलमानों पर हमले को इस छवि निर्माण का नतीजा समझ सकते हैं।

दुनिया में आतंकवाद के सैकड़ों वर्ज़न हैं, फिर एक समूह जो आज आतंकवादी है कल को स्वतंत्रता सेनानी भी बन सकता है या शासक भी। दुनिया भर के आतंकवादी समूहों में उर्दू अरबी नाम वाले लोगों की संख्या बहुत कम है, लेकिन आप मीडिया में सबसे ज़्यादा चर्चा इन्हीं की सुनेंगे।

आतंकवाद और हथियार उद्योग के गठजोड़ पर अलग से देखने की ज़रूरत है। इससे ही उन राजनीतिक ताकतों को भी समझा जा सकेगा जो आतंकवाद के टूल का इस्तेमाल करती हैं। ख़ैर, हम अपने विषय पर लौटते हैं।

बाबरी मस्जिद के लिए आप “विवादित ढाँचा” शब्द पढ़ते आ रहे हैं। विवाद के मद्देनजर ये मस्जिद हो सकती है या मंदिर हो सकता है, ढाँचा तो नहीं हो सकता। लेकिन मीडिया के ज़रिए आपको बताया गया कि ये मंदिर या मस्जिद नहीं बल्कि एक ढांचा है। अब अगर ये सिर्फ ढांचा है तो गिरा देने में भी क्या दिक्कत है।

मनोवैज्ञानिक युद्ध को समझने के लिए भारत में मुसलमानों की स्थिति एक बढ़िया उदाहरण है। आज़ाद भारत में मुसलमानों पर लगातार हमले हुए। लेकिन हमलों से पहले “छवि निर्माण” के हथियार का इस्तेमाल हुआ। मुसलमानों पर जो हमले कांग्रेसी हुकूमतों के दौर में हुए, उनके लिए मुसलमानों को पाकिस्तानपरस्त ठहराने की कोशिश की गई। “खाते हैं हिंदुस्तान का गाते हैं पाकिस्तान का” इसे खूब प्रचारित किया गया।

एक बार मुसलमानों की छवि पाकिस्तानपरस्त हो गई तो फिर हाशिमपुरा, मलियाना, मेरठ और भागलपुर जैसे क़त्लेआम अंजाम दिए गए और किसी गुनाहगार को कोई सज़ा नहीं हुई। ये अपने आप में कितनी हैरान करने वाली बात है कि सैकड़ों की तादात में लोगों को क़त्ल कर दिया जाए और क़ातिलों पर कोई कार्यवाही न हो। निश्चित रूप से सत्ता की भागीदारी के बिना ऐसा होना संभव नहीं है।

पिछले 30 सालों में मुसलमानों को देशद्रोही साबित किया गया और जनता के एक बड़े हिस्से ने इसे स्वीकार भी कर लिया। आतंकवादी कार्यवाहियां किसने की, ये कभी नहीं पता चलता, लेकिन मुसलमानों को आतंकवादी के रूप में गिरफ़्तार कर और मीडिया के जरिये प्रचारित कर जो छवि बनाई गई उससे भारत की सत्ता किसे हासिल होगी, ये तय होने लगा है। (हलांकि ये सूचना क्रांति का एक सकारात्मक पहलू है कि हम “सूचना” के ग़लत इस्तेमाल को समझ पा रहे हैं।)

ऐसे में सूचना के हथियार को समझने के लिए और ख़ुद को इस हथियार से ज़ख्मी होने से बचाने के लिए हम क्या करें?

मेरे हिसाब से जो सूचना हमें व्यापक जनसमुदाय के पक्ष में खड़ा करती है वही हमारे लिए सच है और जो इसके विपरीत है वो अस्वीकार्य।  मुझे नहीं लगता कि सूचनाओं के घटाटोप में “सच” के साथ खड़ा होने का इससे बेहतर कोई पैरामीटर हो सकता है।

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।


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