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देश की मिट्टी से बनी टाइल्स, टाइल्स से बनेगा देश! सिरेमिक गया भाड़ में…

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आजकल के एक विकट देशभक्त एक्टर टीवी पर टाइल्स बनाने वाली एक कम्पनी के विज्ञापन में देश का हवाला देते हुए कहते हैं कि इस ब्राण्ड की टाइल्स देश की मिट्टी से बनी है और इसी टाइल्स से वे देश बना रहे हैं। विज्ञापन देख कर मुझे पुराने ज़माने के एक और विकट देशभक्त हीरो की याद आती है जिन्होंने हमें बताया था कि देश की धरती सोना-हीरे-मोती उगलती है। मैं उनका बड़ा एहसानमंद होता अगर वे यह भी बता देते कि वह सारा माल जाता कहाँ है।

खैर! इन चालिस-पचास सालो में देश की धरती हीरे-मोती और सोना-चाँदी उगलने से आगे बढ़ कर टाइल्स भी उगलने लगी है। देश की मिट्टी से बने ये टाइल्स एक ख़ास कम्पनी बनाती है और उस कम्पनी के टाइल्स लगा कर आप महज़ अपना घर, बाथरूम या किचन नहीं बनाते हैं, देश बनाते हैं। जिसने अपने बाथरूम में इस कम्पनी की टाइल्स नहीं लगवाई उसका बाथरूम देश के किसी काम का नहीं। और उसमें नहाना-धोना भी बेकार। बल्कि अपने बाथरूम में इस कम्पनी की टाइल्स नहीं लगवाने वाले देश के दुश्मन हैं। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि टाइल्स घूस, कमीशन, चोरी या ग़बन के पैसे से ख़रीदे गए हैं। बल्कि इससे देश ज़्यादा तेज़ी से बनेगा। और अगर हत्या की सुपारी का पैसा हो तो कहना ही क्या! देश उछल कर सीधे चाँद पर पहुँच जाएगा।

बहुत समय पहले नमक बनाने वाली एक कम्पनी का विज्ञापन बताता था कि उस कम्पनी का नमक देश का नमक है। यानी देश को खाने की चाहे जो रेसिपी अपनाएँ नमक इसी कम्पनी का हो तो स्वाद चोखा होगा। (वैसे कम्पनी के मालिक यह भी कह सकते थे कि देश उनका नमक है जिसे वह रोज़ चुटकी भर खाकर उस पर अहसान करते हैं।)

उस विज्ञापन में एक छोटा बच्चा स्कूल से किसी दूसरे बच्चे की पेन्सिल चुरा लाता है। माँ उसे वह नमक अमरूद पर छिड़क कर खिलाती है और पेन्सिल लौटाने की प्रेरणा देती है। नमक काम कर जाता है और बच्चा अगले दिन पेन्सिल वापस कर देता है!

मुझे पक्का यकीन है कि कम्पनी के मालिक खुद अपनी कम्पनी का नमक भूल कर भी नहीं खाते होंगे। शायद दूसरी कम्पनियों के मालिक भी वह नमक नहीं खाते होंगे। अगर कहीं गलती से खा लिया तो कम्पनी मज़दूरों के नाम करने दौड़ पड़ेंगे। जिन किसानों या आदिवासियों की ज़मीनों पर कम्पनी खड़ी है उनको वाजिब मुआवज़ा देने के लिए उनकी आत्मा कसमसाने लगेगी। अगर यह सब होने लगे तो देश का बड़ा नुकसान हो जाएगा।

ग़ौरतलब है कि नमक या टाइल्स बनाना और उसे खाना या अपने बाथरूम में लगाना तो देश हित में होता है लेकिन मज़दूर को उसका पूरा हक़ या किसानों व आदिवासियों को उनकी ज़मीन का वाजिब मुआवज़ा मिलना देश हित में नहीं होता। इसी लिए मज़दूरों, दलितों, किसानों, आदिवासियों आदि के हक़ और मालिकाने की बाते करने वालों को राष्ट्रद्रोही और अर्बन नक्सल कहा जाता है। राष्ट्रभक्त सरकारों को जाँच करवानी चाहिए कि इन बदमाशों का नमक कहाँ से आता है और इनके बाथरूम में कौन सी टाइल्स लगी हुई हैं।

देश का हवाला देने से छोटी से छोटी चीज़ बड़ी और महान हो जाती है।

अपने घर का कूड़ा पड़ोसियों के दरवाज़े रख देने वाले अगर यह कह दें कि वे यह काम देश के लिए कर रहे हैं तो पड़ोसी माइन्ड नहीं करेगा। बल्कि देशभक्ति के उबाल में आकर शायद पूरे मोहल्ले का कूड़ा अपने दरवाज़े डालने का मैसेज वाट्सएप पर वायरल कर दे (मुनादी पिटवाने का ज़माना तो अब रहा नहीं)।

बेरोज़गार नौजवानों को सरकार देश सेवा करने को कह रही है। यह सुनते ही नौजवान रोज़गार की चिन्ता छोड़ देश सेवा करने में जुट जा रहे हैं। कोई ज़रा-सी भी समझदारी की बात कर दे तो ये फ़ौरन उस पर चढ़ाई कर देते हैं। देश के नाम पर।

इस देश में एक वर्ग ऐसा है जो हर काम देश के लिए ही करता है। इसमें नेता, अफ़सर, उद्योगपति, सैन्य अधिकारी वगैरह प्रमुखता से शामिल हैं। कुछ कलाकार और साहित्यकार भी देश के नाम पर ही जीते हैं। ये लोग शौचालय भी देश के लिए जाते हैं। खाना भी देश के लिए खाते हैं। देश को इनका एहसान मानना चाहिए और इनसे दब कर रहना चाहिए। नहीं दबने वालों पर देश हित में धारा 144 लगा दी जाती है।

देश के लिए ठगी से लेकर हत्या तक हो रही है। मुझे डर है कि अगर देश न रहा तो इन देश-सेवकों के जीवन में क्या बचेगा। ये किसके हित के लिए सोएँगे और जगेंगे? किसके लिए संसद में जाएँगे, सरकार चलाएँगे, कम्पनियाँ बनाएँगे, बारूद उड़ाएँगे?

दुख की बात है कि देश की एक बड़ी आबादी हमारे जैसे अहमकों की है जो देश के नाम पर कुछ नहीं करते। चौबीस घण्टे बस अपनी दाल-रोटी और कबाब-बिरयानी की पड़ी रहती है।

ऐसे निकम्मे लोग चाहे देश के काम न आते हों लेकिन देश सबके काम आता है। नमक बेचने के भी, टाइल्स बेचने के भी, बेरोज़गारी और देशभक्ति बेचने के भी। सबके काम। आप बस यह तय कीजिए कि आपको क्या काम लेना है!

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