पढ़िए दिल्ली नगर निगम के चुनाव में फर्जीवाड़े की कहानी, एक आम मतदाता की जुबानी

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अहमर खान

दिल्ली में नगर निगम चुनाव के नतीजे आ चुके है. चुनाव में हार और जीत को लेकर राजनीतिक पार्टियों के भीतर और बाहर आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा है. कुछ राजनीतिक पार्टियाँ इस चुनाव में ईवीएम की विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़ा कर रही है. लेकिन इससे इतर भी एक मामला ऐसा है जहाँ सीधे सीधे चुनाव अधिकारी और पूरे मतदान केंद्र की भूमिका संदिग्ध नज़र आती है.

दिल्ली नगर निगम के अंतर्गत आने वाले वार्ड नंबर 083-N, सिविल लाइन्स में जब मैं वोट करने गया तो पता चला मेरे सीरियल नंबर पर पहले से ही किसी ने वोट डाला हुआ है. मेरी वोटिंग स्लिप देख कर पहले तो चुनाव अधिकारी चौंक गया, फिर काफी देर तक अपनी लिस्ट को पलटता रहा. लिस्ट में मेरे नाम को क्रास किया जा चुका था. चुनाव अधिकारी का कहना था कि आपका वोट डाला जा चुका है. मगर उसकी वोटिंग लिस्ट में मेरा नाम और तस्वीर एकदम साफ़ नज़र आ रही थी.

पहली नज़र में ये मामला मुझे तकनीकी गलती का लगा मुझे लगा कि शायद मेरे नाम को गलती से क्रास कर दिया गया हो. मैंने चुनाव अधिकारी को उनका वोटिंग रजिस्टर चेक करने के लिए कहा. रजिस्टर चेक करते समय मैं भी बराबर रजिस्टर पर निगाह लगाये हुए था. अचानक मेरा सीरियल नंबर रजिस्टर में मैच कर गया. मेरे सीरियल नंबर पर किसी ने वोट डाला हुआ था. चुनाव अधिकारी ने मामला पोलिंग एजेंट पर डालने की कोशिश की और उनको डांटने के अंदाज़ में कहा कि ये आप लोगो की गलती है. मैंने चुनाव अधिकारी को याद दिलाया कि इस पोलिंग बूथ पर सही मतदान सुनिश्चित करना उनकी ज़िम्मेदारी है, इस मामले में थोड़ा और ज़िम्मेदार बने क्यूंकि वो इससे बच नहीं सकते. इसके लिए हर प्रकार से केवल और केवल वही ज़िम्मेदार है.

कोई रास्ता न सूझते हुए देख चुनाव अधिकारी ने कहा कि आप अपने परिवार में से किसी सदस्य का वोट दाल दीजिये. ये वाक्य चुनाव अधिकारी की बेशर्मी और होने वाले मतदान की अविश्वसनीयता दोनों को ज़ाहिर करता था. मैंने किसी और का वोट डालने से इंकार किया और चुनाव अधिकारी को किसी भी सूरत में केवल और केवल अपना ही वोट डालने का फैसला सुनाया. इसके साथ ही मैंने इस सारे वाकिये की लिखित जवाब भी उनसे माँगा. अब बहस का कोई विकल्प नहीं था. मतदान रजिस्टर में एक बार फिर से मेरे वोट के सीरियल नंबर को दर्ज किया गया और मैंने अपने नाम से अपना वोट डाला.

लेकिन ये सारा मामला मेरे लिए चौकने वाला और मतदान की विश्वसनीयता को गिराने वाला था. मैंने इस मामले वहीँ ख़त्म न करते हुए मौके पर मौजूद उच्च अधिकारीयों से संपर्क किया. मौके पर मौजूद महिला उच्चअधिकारी पहली नज़र में चुनाव अधिकारी को लीड करती नज़र आई जब जाते ही उन्होंने मामला के बारे में पूछा और बिना उनका जवाब सुने प्रश्नवाचक शैली में जवाब भी उनको समझा दिया कि “क्या ये typographical एरर है”. ज़ाहिर है अब किसी नए जवाब की कोई उम्मीद नहीं थी. लेकिन मैंने महिला अधिकारी से इस मामले का लिखित जवाब माँगा और मेरी शिकायत दर्ज करने की मांग को दोहराया. लेकिन महिला अधिकारी काम का लगातार हवाला देते हुए लिखित जवाब देने से बचती रही.

आख़िरकार मैंने उनको चेताते हुए कहा कि अगर आप मेरी शिकायत दर्ज नहीं करेंगी तो मैं चुनाव आयोग की वेबसाइट से जाकर अपनी शिकायत दर्ज करवाऊंगा. ये बात चुनाव अधिकारी के लिए अप्रत्याशित थी, लेकिन खुद को सँभालते हुए उन्होंने मेरे फ़ोन नंबर माँगा और मतदान के बाद मुझे फ़ोन करके बुलाने सारा मामला साफ़ करने की बात कही. मैंने अपना फ़ोन नंबर चुनाव अधिकारी को दिया, लेकिन जैसा अपेक्षित था उनका कोई फ़ोन मुझे नहीं आया. अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हुए मैंने अपना पक्ष लिखते हुए चुनाव आयोग को इस संबंध में शिकायत दर्ज करवाई है जिसके जवाब देने की अवधि दो दिन है. मगर दो दिन बीत जाने के बाद भी अभी तक कोई जवाब नहीं आया है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में फ़र्ज़ी मतदान को लेकर किसी कार्यवाही की अपेक्षा करना आज भी मज़ाक नहीं तो और क्या है?


कवर तस्वीर प्रतीकात्मक है और इंडिया टुडे से साभार है 


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