Times Now, आप लोग एक दिन टीवी माध्यम की हत्या कर डालोगे!

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विनीत कुमार

टाइम्स नाउ, आज आपके शो से पहले मैं ये नहीं जानता था कि गोपाल कृष्ण पहले चायनीज गांधी हुए और फिर तालिबानी गांधी. मैंने जब आपके पैनलिस्ट की जुबान से ये सुना तो हैरान रह गया. वैचारिक असहमति को कोई इस तरह भी व्यक्त कर सकता है?

हम रोजमर्रा की बहस में अक्सर कहा करते हैं- टीवी में कुछ बचा नहीं है. मन करता है देखना छोड़ दें. लेकिन एक टीवी छात्र के लिए ये सुविधा नहीं है. उसे सीएनएन, अल जजीरा, बीबीसी वर्ल्ड, फ्रांस फोर से लेकर इंडिया टीवी, जी न्यूज सुदर्शन, टाइम्स नाउ और अब रिपब्लिक भी. मेरे भीतर तो वो आदिम सदिच्‍छा अभी भी बची हुई है जो कि जॉन फिस्के और बिल्बर श्रैम को पढ़ते हुए पनपी है कि टीवी से एक बेहतर कल संभव है.

ये खतरा मोल लेते हुए कि गोपाल गांधी को तालिबानी गांधी कहे जाने पर असहमत होने की स्थिति में मुझे भी याकूब मेनन के पक्ष का मान लिया जाएगा, मुझे ये कहना बेहद ज़रूरी लगता है कि शो के एंकर को पलटकर ये जवाब ज़रूर पूछना चाहिए था कि गांधी और उनके आदर्शों से जुड़ा व्यक्ति यदि हिंसा का विरोध करता है (फांसी न्याय प्रक्रिया का हिस्सा होते हुए भी मानवीय स्तर पर सोचें तो हिंसा है) तो इस बात पर उन्हें तालिबानी बोलना कहां तक सही है? आप अपने पैनलिस्ट को इस बात पर रोक सकते थे और बहस को व्यापक संदर्भ में ले जा सकते थे. इससे कुछ नहीं तो दर्शक की समझ साफ हो पाती कि फांसी का विरोध करना और याकूब मेनन या किसी फांसी की सजा के लिए मुकर्रर अपराधी के साथ खड़ा होना दो अलग-अलग चीजें हैं.

जीवन में कई बार ऐसी स्थिति आती है जब व्यक्ति आदर्श स्थिति और वस्तुस्थिति के बीच उलझकर रह जाता है. ऐसे में एक माध्यम को चाहिए कि वो दर्शकों के बीच ऐसा स्पेस ज़रूर बचाकर रखे कि कोई चाहे तो वस्तुस्थिति के बजाय आदर्श स्थिति के साथ जा सके. वो कह सके कि याकूब मेनन को सजा मिलना ज़रूरी था लेकिन मैं फांसी के खिलाफ हूं. दोनों को पर्यायवाची बनाने का मतलब देश की बड़ी, उदार और मनुष्यता के करीब की विचारधारा को रिड्यूस करके देखना है.

ये बहुत संभव है कि गोपाल कृष्ण गांधी उपराष्ट्रपति बनने क्या, उसकी उम्मीदवारी की भी योग्यता न रखते हों. चयन के बाद एक तबका आपकी इस बहस को भी भूल जाए लेकिन उसकी इस धारणा को तो मजबूती ही मिलेगी ये आदमी देश के हित में सोचनेवाला नहीं रहा है? कल को ये समझ इस रूप में विकसित होगी कि गांधी ने देश का भला नहीं किया? आपकी ये लापरवाही कैसे एक प्रोपेगेंडा की जमीन तैयार करती है, स्टूडियो में बैठकर आप शायद नहीं सोचते होंगे लेकिन आपलोगों को देख-सुनकर देश के लाखों दर्शक बहुत कुछ उसी हिसाब से सोचने लगते हैं. ऐसे में किसी न किसी रूप में आपके हिस्से गुनाह दर्ज हो जाता है.

 


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