चैनलों के शब्दकोश में सुहेल सेठ ने जोड़ा एक वर्जित शब्द, NDTV फिर भी पावन गाय!

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समाचार चैनलों की भाषा में बुनियादी बदलाव के लिए आगे से 30 मार्च 2016 को याद किया जाएगा, जब क्रिकेट मैच पर चर्चा के दौरान सेलिब्रिटी सुहेल सेठ ने बिना किसी हिचक के सबके सामने ऑन एयर ”बकचोद” शब्द का इस्तेमाल किया। इस शब्द को दोबारा लिखने का हमारा आशय इस खबर के बहाने लोकप्रियता बटोरने का बिलकुल नहीं है। यह केवल टीवी समाचार के इतिहास में एक तारीख के तौर पर दर्ज होने के लिए लिखा जा रहा है। अफ़सोस की बात यह है कि जिस चैनल पर यह प्रोग्राम ऑन एयर हुआ, उसे टीवी जगत में पावन गाय का दरजा प्राप्त है।

31 मार्च, 2016 को भारत और वेस्टइंडीज़ के बीच टी-20 के सेमीफाइनल का मैच होना था। ठीक एक दिन पहले 30 मार्च को एनडीटीवी अंग्रेज़ी ने एक हलकी-फुलकी और तकरीबन हास्यास्पद किस्म की पैनल परिचर्चा रखी जिसमें कुछ नौजवान दर्शक भी थे। पैनल में सुहेल सेठ थे और उनके साथ तन्मय भट्ट थे, जो एआइबी नाम के एक फूहड़ कॉमेडी शो के जनक माने जाते हैं। ज़ाहिर है, न तो भट्ट का और न ही सेठ का क्रिकेट से कोई लेना-देना है। बावजूद इसके दोनों ने ही परिचर्चा में इस तरह की बातें कहीं जैसे कि वे 1 अप्रैल  को अप्रैल फूल दिवस जैसी बातें कर रहे हों।

नीचे दिए गए आधे मिनट के वीडियो को पूरा सुनें, सुहेल सेठ को अंत तक सुनें। आखिरी पंक्ति में वे कहते हैं, ”दिस इज़ ऑल इंडिया एफेक्टिवनेस, नॉट ऑल इंडिया बकचोद”। उनका इशारा बेशक भट्ट की ओर था, लेकिन वे चाहते तो एआइबी भी कह सकते थे। बात उतनी ही आसानी से दर्शकों तक पहुंचती। उन्होंने न केवल यह वर्जित शब्द राष्ट्रीय टेलीविजन पर कहा, बल्कि उसके साथ उनकी अश्लील भंगिमा और प्रतिक्रिया में ऐंकर के दोगुने उत्साह को भी देखिए। फिर तय करिए कि क्या परिवार के साथ बैठकर क्रिकेट पर कोई परिचर्चा आप आगे से देख सकने की स्थिति में होंगे।

यह दलील बहुत पुरानी है कि जब गाली-गलौज और अश्‍लील शब्द हमारे समाज का हिस्सा हैं, तो जन माध्यमों में उनके होने पर आपत्ति क्यों हो। काशीनाथ सिंह के उपन्यास ”काशी का अस्‍सी” से लेकर उस पर बनी फिल्म और ब्लॉग के शुरुआती दिनों में यह बहस खूब हुई थी। इसके बावजूद एक बुनियादी बात पर सभी के बीच सहमति है कि मीडिया/पत्रकारिता चूंकि एक ऐसी विधा है जिसमें सामाजिक जिम्मेदारी और जवाबदेही का तत्व अंतर्निहित है, इसलिए इसकी भाषा मर्यादित होनी चाहिए और एक कदम आगे बढ़कर समाज की भाषा को दुरुस्त करना भी इसकी जिम्मेदारी होनी चाहिए। क्या किसी कॉमेडी शो में मौज लेने के दौरान भी इस बात का ख्याल नहीं रखा जाना चाहिए?


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