‘पेड न्यूज़’ के बाद ‘पेड लिटरेचर’ ! हिंदुस्तान ने एक ‘साहित्यसेवी’ पर छापा पूरा पेज !

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क्या आप साहित्यसेवी मुकेश सिंह को जानते हैं ?

इस सवाल का जवाब साहित्य से वाक़ई जुड़े लोग आमतौर पर ‘ना’ में ही देंगे। लेकिन हिंदुस्तान अख़बार के लखनऊ संस्करण ने उन पर आज यानी 24 जुलाई को पूरा एक पन्ना ही रंग दिया है। हिंदी अख़बारों में इन दिनों जिस तरह साहित्य और साहित्यकार उपेक्षित हैं, उसे देखते हुए एक साहित्यसेवी पर इतनी सामग्री चौंकाने वाली है। पेज नंबर 7 पर छपे इस लेख से पता चलता है कि मुकेश सिंह  उत्तर प्रदेश के बैसवारा क्षेत्र से आते हैं और वहाँ पर साहित्यसेवा में जुटे हैं। इसके प्रमाण बतौर ‘कवि सम्मेलन करवाने’ से लेकर कुछ कवियों की रचनाओं के प्रकाशन की जानकारी दी गई  है।

लेख में बैसवारे की तमाम चर्चा के बावजूद वहाँ के किसी साहित्यकार की एक भी तस्वीर नहीं छापी गई है, जबकि मुकेश सिंह को सम्मानित किए जाने की तमाम तस्वीरों के अलावा उनकी गिटार बजाते हुए एक तस्वीर भी छापी गई। अब चूँकि वे कवि सम्मेलन कराते हैं इसलिए मंचों पर अक्सर दिखने वाले कुछ कवियों ने उनकी सहज ही तारीफ़ की है, जिसे सज-धज के साथ छापा गया है।

इस पन्ने  को देखकर या पढ़कर कोई भी पाठक भ्रमित हो सकता है। पेज नंबर सात पर कहीं भी इस बात की घोषणा नहीं है कि यह दरअसल विज्ञापन है और इस लेख को किसी और ने नहीं स्वयं मुकेश सिंह ने लिखा है। इस बात की जानकारी पहले पन्ने पर बहुत छोटे हर्फ़ों में दी गई है जिस पर आम तौर पर ध्यान नहीं जएगा।


पहले पन्ने पर छपी सूचना को देखने के लिए मैग्नीफ़ाइंग ग्लास का सहारा लेना पड़ेगा–

 

आख़िर इसे पेड न्यूज़ की तर्ज़ पर ‘पेड लिटरेचर’ क्यों ना कहा जाए ?  जो चाहे पैसा देकर अपने ‘साहित्यसेवी’ ही नहीं ‘साहित्यकार’ होने का ऐलान करवा दे। एक पेज ही क्यों पूरा अख़बार अपने नाम से रँगवा ले। बरसों पहले, पेड न्यूज़ के शुरुआती हल्ले के समय  हिंदुस्तान ने बनारस में एक ऐसे प्रत्याशी की जीत को पक्का बताते हुए पहले पन्ने पर बैनर छापा था जिसे लोग ठीक से जानते तक नहीं थे, अब पेड लिटरेचर की शुरुआत के साथ भी उसका नाम नत्थी हो गया है। पत्रकारिता के इतिहास में यह अख़बार यूँ भी याद किया जाएगा।


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