‘हिंदुस्तान’ में अप्रेज़ल नहीं हुआ तो होने लगा विलुप्त चीते का शिकार !

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हिंदी के कथित ‘राष्ट्रीय’ अख़बार हिंदुस्तान के कुएँ में लगता है भाँग पड़ गई है। यही वजह है कि उसके पन्नों पर चीते जैसे जंगली जानवर आज भी चहलकदमी करते नज़र आते हैं जो अरसा पहले भारत में विलुप्त घोषित कर दिए गए

इसी दो वजह हो सकती है। एक तो यह कि इस बार अप्रेज़ल ना होने से हिंदुस्तान के पत्रकारों ही नहीं संपादकों का भी काम में मन नहीं लग रहा है। या फिर कम वेतन के लालच में संपादकों ने हिंदुस्तान को ऐसा ‘यंगिस्तान’ बना दिया है जिसमें जनरल नॉलेज की अपेक्षा रखना ज़्यादती है।

वैसे अप्रेज़ल वाला मामला पत्रकारों की गंभीर होती जा रही स्थिति का बयान है। ख़बर है कि ‘कॉरपोरेट कंपनी’ बनने के बाद यह पहला साल है जब हिंदुस्तान में पत्रकारों का अप्रेज़ल नहीं हुआ। ‘अप्रेज़ल’ ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत कर्मचारियों के साल भर के कामकाज का मूल्याँकन होता है। कर्मचारी भी अपने काम का मूल्यांकन करता है। तमाम मुद्दों पर उसे अंक दिए जाते हैं जिसके आधार पर यह तय किया जाता है कि उसका वेतन कितना बढ़ाया जाए या उसे पदोन्नति दी जाए या नहीं। (हालाँकि तिलिस्म यह है कि इस जटिल कवायद के बाद मलाई उन्हीं के हाथ लगती है जिन पर संपादकों का हाथ होता है ! )

हिंदुस्तान में आमतौर पर जनवरी से एप्रेज़ल की प्रक्रिया शुरु हो जाती है और मार्च तक इसे पूरा कर लिया जाता है। अप्रैल से वेतन बढ़ा दिया जाता है यानी मई में मिलने वाली तनख़्वाह हथेली गरम कर देती है। लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। इक्का-दुक्का बार पहले भी ऐसा हुआ कि वेतन में बढ़ोतरी नहीं हुई, लेकिन अप्रेज़ल ही ना हुआ हो, यह पहली बार हुआ है।

लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि हिंदुस्तान के पत्रकार चीता टहलाने लगें। कुछ दिन पहले मेरठ में जिस पूर्व सैन्य अफ़सर के शिकारी बेटे के घर वन्य जीवों की खालें, माँस और हथियार वगैरह मिले, उससे जुड़ी ख़बर में हिंदुस्तान के बरेली संस्करण में यही हुआ।

कभी हिंदुस्तान अख़बार में काम कर चुके पत्रकार पंकज मिश्र ने इस पर जो लिखा है, उसे आप नीचे पढ़ सकते हैं–

भारत के जंगलों से 1947 में ही चीते विलुप्त हो गए थे। 1952 में भारत सरकार ने इसे विलुप्त प्रजाति में शामिल भी कर लिया। 125 वर्ष में सिर्फ चीता ही ऐसा पशु है, जिसे विलुप्त घोषित किया गया। यह तथ्य है। छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में 1947 में महाराज रामानुज प्रताप सिंह ने चीते का शिकार किया था, उसके बाद कभी कोई चीता भारत मे नहीं देखा गया। बॉम्बे नेचरल हिस्ट्री सोसाइटी में यह दर्ज है।

अब हिंदुस्तान जैसे अखबार की 04 मई को बरेली संस्करण में पेज 2 पर प्रकाशित खबर पर गौर करें। इनकी खबर के मुताबिक चीते अभी भारत के जंगलों में हैं और उनका शिकार भी हो रहा है।

अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि रिपोर्टर और संपादक कितनी जानकारी रखते हैं।

 

हिंदुस्तान वाले चाहें तो यह ख़बर पढ़कर जान सकते हैं कि चीता भारत से लुप्त हो चुका है।

 


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