क्या बिक गया एनडीटीवी ? एक्सप्रेस के मुताबिक़ स्पाइस जेट वाले अजय सिंह मालिक होंगे !

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राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से चलने वाला लगभग इकलौता न्यूज़ चैनल जो अंधविश्वास नहीं परोस रहा था, ना दंगाई उन्माद को हवा दे रहा था… जो टीआरपी के गणित के उलट अधनंगे किसानों, लुटते मज़ूदरों और पिटते बेरोज़गारों की बात उठा रहा था… जो महंगाई और पेट्रोल क़ीमतों की बढ़ती क़ीमतों के पीछे हो रही ऐयारी का राज़ खोल रहा था… जो टीआरपी रेस में फ़िसड्डी था, लेकिन महाबली सरकार की आँख में सबसे ज़्यादा गड़ता था.. वह एनडीटीवी, पूँजी के चक्रव्यूह में फँसकर खेत रहा।

जी हाँ, एनडीटीवी का सौद हो गया है। इसके संस्थापक डॉ.प्रणय रॉय और उनकी पत्नी राधिका रॉय के पास अब इस चैनल के महज़ 20 फ़ीसदी शेयर रह जाएँगे। इंडियन एक्सप्रेस में आज छपी ख़बर के मुताबिक चैनल के असल मालिक होंगे अजय सिंह जिन्होंने 600 करोड़ में सौदा पटा लिया है। जल्दी ही वे चैनल का मालिक बन जाएँगे। वे एनडीटीवी पर चढ़ी क़रीब 400 करोड़ की देनदारी भी संभालेंगे। उनके पास 40 फ़ीसदी शेयर होंगे। चैनल का एडीटिरोयिल कंट्रोल भी उनके पास होगा। यानी वे तय करेंगे कि चैनल में क्या दिखाया जाएगा, क्या नहीं।

और वे क्या तय करेंगे, यह जानने के पहले आपको अजय सिंह को जान लेना चाहिए। अजय सिंह 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी के पक्ष में विराट प्रचार योजना बनाने वाली कोर टीम में थे। 2015 में अजय सिंह हवाई जहाज उड़ाने वाली कंपनी स्पाइस जेट के मालिक बने थे। यह हैसियत उन्होंने लंबे सफ़र के बाद हासिल की थी वरना कभी वे बीजेपी के एक सामान्य सेवक भर थे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान वे ताक़तवर केंद्रीय मंत्री प्रमोद महाजन के ओएसडी बने थे। कहा जाता है कि महाजन के विश्वस्त बतौर वे उनका लंबा-चौड़ा काम देखते थे। लेकिन जब प्रमोद महाजन की हत्या हो गई तो अजय सिंह अपना काम देखने लगे।

एक्सप्रेस के मुताबिक सौदे की सारी शर्तें तय हो गई हैं। बस कुछ दिन की बात है फिर एनडीटीवी पर नया रंग चढ़ जाएगा। हाँलाकि उसने यह भी लिखा है कि स्पाइस जेट के अधिकारियों ने सौदे का खंडन किया है, जबकि एनडीटीवी ने इस सिलसिले में भेजे गए मेल का जवाब नहीं दिया है।

याद होगा कि  5 जून को जब प्रणय रॉय के घर पर छापा पड़ा था तो इसे ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला’ बताते हुए पत्रकार सड़क पर उतर आए थे। लगता है मोदी सरकार ने इससे सबक़ लिया और ‘अभिव्यक्ति का ज़रिया’ बनने वाली मशीन का मुँह ही घुमा दिया गया। यानी एनडीटीवी बना रहेगा, लेकिन गोदी में रहेगा। एक तरह से ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’ करने वाले चैनलों की सूची में एक नाम और दर्ज हो जाएगा।

आज़ाद पत्रकारिता के लिए यह वाक़ई बुरा दौर है। जिन्हें मुख्यधारा मीडिया कहा जाता है, वह सरकार से जवाब लेने के बजाय, उसके पक्ष में अभियान चला रहा है। उसके निशाने पर सत्ता नहीं, सत्ता को आँख दिखाने वाले हैं।  नत्थी पत्रकारिता का ऐसा मंज़र इतिहास में कभी नहीं रहा। पूँजी के प्रेतों का मीडिया पर एकाधिकार हो गया है और वे लोकतंत्र को लाश बनाने में जुटे हैं। एनडीटीवी एक अपवाद की झलक देता था, तो उसके भी पर कतर दिए गए।

एक्सप्रेस की मानें तो इस सौदे में डॉ.प्रणय रॉय को क़रीब सौ करोड़ रुपये नक़द मिलेंगे। एनडीटीवी जैसे प्रयोग के लिए उन्हें पर्याप्त सराहना मिल चुकी है और अब यह मुआवज़ा भी कम नहीं है। उम्मीद है कि वे क़र्ज़ के दुश्चक्र से मुक्त होकर अब चैन से जी पाएँगे।

बहरहाल, इस घटना से यह तय हो गया है  कि कॉरपोरेट पूँजी से जनपक्षधर पत्रकारिता नहीं हो सकती।

.बर्बरीक

 

पुनश्च : वैसे एनडीटीवी के सौदे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की जैसी साख है और जिस भरोसे से उसने सौदे का डिटेल छापा है, उसके बाद संदेह की गुंजाइश नहीं रह जाती। बहरहाल, ख़बर ग़लत साबित हुई तो ख़ुशी होगी – संपादक 

 



 


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