अख़बारनामा: परीक्षण को राजनीतिक मामला बताकर भी एक्सप्रेस लहालोट !

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 अख़बार नहीं मानता कि जाँच में कुछ होगा

संजय कुमार सिंह

अचानक राष्ट्र को संबोधित करने की घोषणा और फिर यह बताना कि अब हम सैटेलाइट को भी मार गिरा सकते हैं – आचार संहिता लागू होने के बाद एक अलग तरह का नाटक है। खास कर वर्ल्ड थियटर डे के मौके पर। इसीलिए, बुधवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एलान के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट किया, ‘बहुत अच्छे डीआरडीओ, हमें आपके काम पर गर्व है। मैं प्रधानमंत्री को वर्ल्ड थिएटर डे की बधाई देना चाहूंगा।’ देश भर में इस घोषणा को अलग-अलग ढंग से लिया गया है और इस मूल खबर की सभी अखबारों की प्रस्तुति अलग हो सकती है, होनी चाहिए। पर उसमें मुझे ज्यादा उम्मीद नहीं है। मेरा मानना है आचार संहिता लागू होने के बाद यह घोषणा अगर जरूरी ही थी और उपलब्धि मान भी ली जाए तो प्रधानमंत्री को करने की कोई जरूरत नहीं थी।

यह उपलब्धि रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की है। इसलिए, आचार संहिता लागू होने और प्रधानमंत्री के इस आश्वासन के बाद कि, आपका ये चौकीदार पूरी तरह चौकन्ना है – यह घोषणा डीआरडीओ को ही करनी चाहिए थी। इसलिए, प्रधानमंत्री की इस घोषणा का विरोध होना ही था। हुआ भी। उन्होंने घोषणा की तो उनके पास अपने तर्क होंगे ही। ऐसे में सबकी नजर चुनाव आयोग पर थी। चुनाव के समय चुनाव आयोग का निष्पक्ष होना ही नहीं, निष्पक्ष दिखाई देना भी जरूरी है। ऐसे में बाद में आई यह खबर, कि चुनाव आयोग प्रधानमंत्री द्वारा घोषणा किए जाने की जांच करेगा – चुनाव आयोग की निष्पक्षता और चुनाव की पवित्रता दिखाने-बताने के लिए भी जरूरी है। आज यह देखना दिलचस्प होगा कि मुख्य खबर के शीर्षक के साथ अखबारों ने प्रधानमंत्री द्वारा घोषणा किए जाने की जांच के चुनाव आयोग के फैसले को कैसे छापा है।

वैसे तो सबको पता है इसमें कुछ खास नहीं हो सकता है फिर भी खबर तो खबर है। जब हम संपादकीय आजादी और विवेक के उपयोग अथवा दुरुपयोग की चर्चा करते हों तो हमारा विषय यही है। कोलकाता के द टेलीग्राफ ने इसे सात कॉलम में छापा है और मुख्य शीर्षक है मिशन डेसपरेशन यानी मिशान निराशा या हताशा। अखबार ने उपशीर्षक के जरिए पिछली बार की तरह एटीएम पर नहीं भेज कर सैटेलाइट के बारे में बताने के लिए प्रधानमंत्री का शुक्रिया अदा किया है। यही नहीं, अखबार ने यह भी लिखा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने टकराव के समय उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन को ‘रॉकेट मैन’ और ‘लिटिल रॉकेट मैन’ कहा था। यह पता नहीं चला है कि ट्रम्प यह खिताब किम से लेकर अपने ‘सच्चे मित्र’ मोदी को देंगे कि नहीं।

किम जोंग उन की फोटो के साथ अखबार ने लिखा है कि कार्यवाहक अमेरिकी रक्षा मंत्री पैट्रिक शनाहन ने एंटी सैटेलाइट (ए-सैट) हथियारों का परीक्षण करने पर विचार कर रहे भिन्न राष्ट्रों को चेतावनी दी है कि अंतरिक्ष में कचरा न करें। उनका संदर्भ अंतरिक्ष में रह जाने वाले मलबे से था। टेलीग्राफ ने इस तरह याद दिलाया है कि अमेरिका अंतरिक्ष में कचरा नहीं फैलाने की बात पहले कर चुका है फिर भी भारत ने वही किया है। इस संदर्भ में टेलीग्राफ ने पहले पन्ने पर ही एक और खबर छापी है, “क्रो बट गिव क्रेडिट टू प्रीडेसर्स टू” यानी शोर मचाइए पर पूर्ववर्ती को भी श्रेय दीजिए। इस तरह अब आपको इस खबर का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व तथा संदर्भ मालूम है। फिर भी हमारे अखबार इसे सामान्य सूचना, प्रशंसा से अलग रूप में नहीं छापने वाले पूरी बात खबर से समझ में आ जाए यह तो शायद ही कभी होता हो।

हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर लीड है और शीर्षक सूचनात्मक ही। उपशीर्षक है – प्रधानमंत्री ने औचक संबोधन किया, विपक्ष की शिकायत के बाद चुनाव आयोग जांच करेगा। टाइम्स ऑफ इंडिया ने मुख्य खबर को सात कॉलम के शीर्षक के साथ छापा है। मुख्य शीर्षक के अलावा फ्लैग शीर्षक और दो कॉलम में इंट्रो है, क्षमता कम से कम 2012 से थी, मोदी ने दो साल पहले सहमति दी। मुख्य खबर के साथ सिंगल कॉलम की चार छोटी-छोटी खबरें हैं। इनमें एक खबर थोड़ी लंबी है। चार छोटी खबरों में एक के जरिए बताया गया है कि चुनाव आयोग इस बात की जांच करेगा कि मोदी ने आचार संहिता का उल्लंघन किया कि नहीं। सिंगल कॉलम की दूसरी लंबी वाली खबर में बताया गया है कि अंतरिक्ष में इस परीक्षण से जमीन पर सरकार और विपक्ष में इसके समय को लेकर युद्ध छिड़ गया।

इंडियन एक्सप्रेस ने इस खबर को छह कॉलम में छापा है। दो कॉलम में (जी हां, ऊपर) विज्ञापन है। इस मुख्य खबर के साथ पहले पन्ने पर दो और खबरें हैं। एक के साथ रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण की फोटो है और उनका कहा शीर्षक है, “यह निर्णय 2014 में लिया गया था …. कोई भी देश इसे न तो साझा करेगा ना बेचेगा, यह हमारा अपना है”। दूसरी खबर अरुण जेटली की फोटो के साथ है। शीर्षक है, “जेटली ने कहा, कल के युद्ध की तैयारी है; दिल्ली नियमों को आकार देने में सहायता कर सकता है”। दो कॉलम और तीन कॉलम की इन दोनों खबरों के बीच में, लीड के नीचे चार कॉलम की खबर, प्रधानमंत्री की दो कॉलम की फोटो के साथ है। शीर्षक है, “विपक्ष ने शिकायत की, चुनाव आयोग ने जांच के लिए पैनल बनाया पर संभावना है कि पीएम का संबोधन किसी प्रभाव से बच जाएगा”।

इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर ही एक और खबर है जो कल के परीक्षण को पोखरन की बराबरी में रखती है। शीर्षक से पता चलता है कि यह क्षमता भारत के पास पहले से थी पर कल की जांच क्यों प्रमुख है। उपशीर्षक, डीआरडीओ में अनुसंधान और विकास के पूर्व प्रमुख के हवाले से है, परीक्षण का निर्णय राजनीतिक है, विज्ञान का मामला नहीं। जाहिर है, राजनीतिक मामला चुनाव के समय इस तरह पेश किया जाना अनैतिक है। पर अखबार की खबरें और कार्रवाई की संभावना नहीं जैसी खबरें सरकार की पीठ ठोंकती लग रही है। मुझे अभी भी यह परीक्षण चुनाव के लिहाज से अनैतिक लग रहा है। यह काम पहले भी किया जा सकता था और अगर अभी किया जाना गलत नहीं है तो ऐन मतदान के दिन या मतदान शुरू होने से पहले भी किया जा सकता था। क्या तब भी इसी तरह बचाव किया जा सकता था। आचार संहिता लागू होने का समय निर्धारित है और इसका पालन होना चाहिए।

यहां एक बात और महत्वपूर्ण है। अखबारों और मीडिया का काम है जनमत बनाना, आपको सूचना देना और इसतरह आपको ज्ञान वान बनाना। अखबार आपको बता रहे हैं कि अजहर मसूद को वैश्विक आंतकवादी घोषित करने में चीन भारत का साथ नहीं दे रहा है। झूला झुलाने के बावजूद। झुला झुलाया गया था यह भी आपको प्रशंसा में ही बताया गया था इसके कूटनीतिक प्रभावों की चर्चा अपवादस्वरूप कहीं हुई हो तो अलग बात है। आज टेलीग्राफ ने बताया है कि अमेरिका ने अंतरिक्ष में कचरा नहीं करने की अपील की थी या चेतावनी दी थी। भारत ने इसके बावजूद अंतरिक्ष में कचरा किया। एक तरफ भारत अमेरिका की बात नहीं मान रहा है दूसरी ओर, चीन से अपेक्षा कर रहा है कि वह अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने में सहयोग करे। इसके साथ अखबार आपको यह भी बता रहे हैं कि भारत ने (कांग्रेस के शासन में) एक ही बार यह कोशिश की थी और भाजपा के शासन में लगातार कर रहा है। मैंने पहले भी लिखा था इसका मतलब यह हो सकता है कि कांग्रेस को बात समझ में आ गई हो और भाजपा उसका राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश में है। आज भी अमेरिका की सलाह नहीं मानना और राजनीतिक निर्णय को चुनाव के समय जनता को बताना चुनावी लाभ लेने की कोशिश है पर अखबार आपको पूरी बात नहीं बता रहे हैं या उसमें मिलावट कर दे रहे हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। जनसत्ता में रहते हुए लंबे समय तक सबकी ख़बर लेते रहे और सबको ख़बर देते रहे। )


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