90% विकलांग साईबाबा को जेल में कंबल तक नहीं मिलता, ज़िंदगी ख़तरे में!

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मार्च में गढ़चिरौली, महाराष्ट्र की एक अदालत ने दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक प्रो. जी.एन.साईबाबा को दस साल क़ैद की सज़ा सुनाई थी। एक कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाने वाले साईबाबा 90 फ़ीसदी तक विकलांग हैं और उनका सारा समय व्हील चेयर पर बीतता है। उन पर आरोप है कि उन्होंने माओवादियों की मदद की और राज्य के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ा। 90 फ़ीसदी तक विकलांग और तमाम बीमारियों से घिरे साईबाबा किस तरह राज्य के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ सकते हैं, इस पर बहुत सी बात हो सकती है लेकिन कोई फ़ायदा नहीं। फ़ैसला तो ऊपरी अदालतें ही करेंगी। लेकिन जिस संविधान और क़ानून के नाम पर उन्हें सज़ा दी गई है, उसी का निर्देश है कि जेलों में क़ैदियों को मनुष्य मानकर रखा जाए। सज़ा का मतलब मानवीय गरिमा से च्युत करना नहीं है। जेल मैनु्अल क़ैदियों की सुविधाओं की व्यवस्था करने का स्पष्ट निर्देश देता है। लेकिन बीमार साईबाबा जेल में एक कंबल तक को तरस रहे हैं और उन्हें लगता है कि इस ठंड में वे ज़िंदा नहीं बचेंगे। यह बात उन्होंने अपनी पत्नी को संबोधित एक पत्र में कही है। यह पत्र जनज्‍वार डॉट कॉम पर प्रकाशित हुआ है। वहां से साभार यह पत्र हम यहाँ छाप रहे हैं। यह पत्र बताता है कि भारतीय जेल व्यवस्था सभ्यता की सामान्य कसौटियों पर भी खरा नहीं उतरती। पढ़िए साईबाबा का यह पत्र… 

(संपादक)


प्रिय वसंता

मुझे दस्तक दे रही सर्दियों के बारे में सोचकर ही डर लग रहा है। पहले से ही मुझे लगातार बुखार बना हुआ, परेशान हूं मैं बुखार से। मेरे पास सर्दी से बचाव के लिए एक कंबल तक नहीं है। न ही मेरे पास स्वेटर या जैकेट पहनने के लिए है, जिससे कि मैं ठंड से अपना बचाव कर सकूं। जैसे—जैसे ठंड दस्तक दे रही है मेरे पैरों में और बाएं हाथ में लगातार दर्द बढ़ता जा रहा है।

नवंबर से शुरू होने वाली सर्दी के दौरान मेरे लिए यहां सर्वाइव करना लगभग असंभव जैसा है। मैं यहां उस की तरह जी रहा हूं, जो अपनी अंतिम सांसों के लिए संघर्ष कर रहा हो। मैंने यहां किसी तरह ये 8 महीने बिताए हैं। लेकिन मुझे नहीं लगता कि ठंड में मैं यहां जीवित रह पाऊँगा। इस बात का मुझे पूरा यकीन है। मुझे नहीं लगता कि मुझे और ज्यादा अपने स्वास्थ्य के बारे में लिखने की जरूरत है।

कृृपया किसी भी तरह इस महीने के आखिर तक या इससे पहले किसी वरिष्ठ वकील को मेरे केस को देखने के लिए फाइनल करो। मिस्टर गाडलिंग को मेरी जमानत अर्जी नवंबर के पहले हफ्ते या अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में ही तैयार करने को कहो। तुम्हें पता है कि अगर मेरी जमानत नहीं हुई तो मेरी स्वास्थ्य की स्थिति आउट आॅफ कंट्रोल हो जाएगी। इसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं होउंगा। अब मैं इस बारे में आगे से तुम्हें कुछ और नहीं कहूंगा।

तुम्हें मेरी स्थिति के बारे में रेबेका जी और नंदिता नारायण से बात करनी चाहिए। इस बारे में प्रोफेसर हरगोपाल और अन्य लोगों से भी बात करो। उन्हें पूरी स्थिति समझाओ। प्लीज जल्दी कुछ करो। मैं बहुत डिप्रेस्ड हूं। इस निराशा में मुझे लगता है कि मेरी हालत एक ऐसे भिखारी की तरह हो गई है जो बिल्कुल बेसहारा है। लेकिन आप में से कोई भी एक इंच नहीं चल रहा है, कोई भी मेरी स्थिति को समझ नहीं पा रहा है।

मुझे लगता है कि कोई भी मेरी स्थिति नहीं समझ पा रहा है। नहीं समझ पा रहा है कि एक 90 प्रतिशत विकलांग व्यक्ति कैसे इस स्थिति में एक हाथ से संघर्ष कर रहा है, जो कई बीमारियों से पीड़ित है। कोई भी मेरी ज़िंदगी की परवाह नहीं करता है। यह सिर्फ एक आपराधिक लापरवाही है, एक कठोर रवैया है।

तुम अपना भी ध्यान रखो। तुम्हारा स्वास्थ्य मेरा और पूरे परिवार का स्वास्थ्य है। इस वक्त तुम्हारे अलावा कोई दूसरा तुम्हारा ख्याल रखने वाला नहीं है।

जब तक मैं नहीं हूं, तब तक तुम्हें बिना किसी लापरवाही के अपनी खुद ही देखभाल करनी होगी।

बहुत सारा प्यार

तुम्हारा
साई


स्‍पष्‍टीकरण: पत्र के पहले लिखे संपादकीय इंट्रो में हमने इस पत्र का श्रेय सामाजिक कार्यकर्ता शीबा असलम फ़हमी को दिया था। दरअसल, यह पत्र सबसे पहले जनज्‍वार डॉट कॉम ने प्रकाशित किया था जिसे शीबा असलम फहमी ने अपनी फेसबुक दीवार पर पेस्ट दिया। चूँकि उन्होंने जनज्वार का नाम नहीं दिया था, या उन्हें इसका पता नहीं था, इसलिए भ्रम पैदा हुआ कि पत्र उनकी मार्फत जारी हुआ है। जनज्‍वार की संपादक प्रेमा नेगी ने इस संबंध में एक टिप्‍पणी अपने फेसबुक दीवार पर की है जिसे यहां पढ़ा जा सकता है। इस टिप्‍पणी को पढ़ने के बाद हमने इंट्रो में वाजिब बदलाव कर के ”जनज्‍वार से साभार” लिख दिया है। इसे संपादकीय चूक माना जाए।


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