अर्णब के भंडाफोड़ से ‘आहत संपादकों’ को नक़वी जी ने डाँटा, कहा सच का साथ दो !

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आपने मीडिया विजिल की यह स्टोरी तो पढ़ी ही होगी कि एडिटर्स गिल्ड के पूर्व अध्यक्ष राजदीप सरदेसाई ने रिपब्लिक टीवी के अगिया बैताल ऐंकर अर्णव गोस्वामी को फेंकू कहा। वजह अर्णव का यह दावा था कि उन्होंने गुजरात दंगा कवर किया था और उनकी गाड़ी पर हमला हुआ था। उस समय एनडीटीवी (जो तब स्टार न्यूज़ के नाम से पर्दे पर था ) में अर्णव के बॉस राजदीप सरदेसाई थे। उन्होंने अर्णव के इस दावे के वीडियो को ट्वीट करके लिखा कि अर्णव दंगा कवर करने भेजे ही नहीं गए थे। राजदीप के बयान के पक्ष में एनडीटीवी के कई पूर्व पत्रकारों ने भी गवाही दी जो 2002 में गुजरात गए थे।

राजदीप के इस सार्वजनिक पोल-खोल के बाद अर्णव गोस्वामी का सोशल मीडिया में काफ़ी मज़ाक उड़ रहा है। तरह-तरह की तस्वीरें बन रह हैं जिनमें अर्णव कभी हिटलर के साथ दिख रहे हैं तो कभी नेताजी सुभाष की जगह ख़ुद आज़ाद हिंद फ़ौज का मुआयना कर रहे हैं। 1857 की क्रांति में भी अर्णव को शामिल बताया जा रहा है।

ज़ाहिर है, इतना बड़ा झूठ पकड़ जाना किसी संपादक के लिए शर्म से डूब मरने की बात है। अर्णव चुप हैं जिसकी उनसे उम्मीद नहीं की जाती। इस फेंकूगीरी का कोई बचाव हो भी नहीं सकता। लेकिन हैरानी की बात है कि टीवी संपादकों की संस्था ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) के कुछ सदस्य बिलबिलाए हुए हैं। पिछले दिनों हुए चुनाव में अर्णव गोस्वामी बीईए के उपाध्यक्ष चुने गए थे। क़ायदे से तो उपाध्यक्ष के कारनामे से बीईए को असहज होना चाहिए था, लेकिन कुछ सदस्य उल्टा अर्णव की जगहँसाई से बुरा मान गए। वे चाहते थे कि बीईए इसमें हस्तक्षेप करे।

पिछले दिनों ज़ी न्यूज़ ने एनबीएसए के उस आदेश को ठेंगा दिखा दिया था जिसमें विज्ञानी और शायर गौहर रज़ा को देशद्रोही बताने के लिए एक लाख रुपये जुर्माना देने और स्क्रीन पर माफ़ीनामा प्रसारित करने को कहा गया था। लेकिन बीईए के किसी पदाधिकारी या सदस्य ने चूँ नहीं की। टीवी के पर्दे पर अंधविश्वास, अज्ञान, कुत्सा परोसने को भी वे ‘संपादकीय अधिकार’ के दायरे में रखते हैं। लेकिन अर्णव पर राजदीप की ट्विटर टिप्पणी (जो महज़ एक तथ्य रखा जाना था) से ये बुरी तरह आहत हैं। इन्हें अचानक इलहाम हुआ कि एक संपादक को दूसरे संपादक के कारनामों का पर्दाफ़ाश नहीं करना चाहिए।

यह मसला तब और गंभीर हो गया जब इंडिया टुडे ने मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए ऐलान कर दिया कि 20 सितंबर को रात 10 बजे बहस कराएगा कि क्या अर्णब गोस्वामी सबसे बड़े झुट्ठे हैं ? माना जा सकता है कि इसके पीछे व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता वजह रही होगी। इस कार्यक्रम के प्रचार के लिए चैनल के मैनेजिंग एडिटर राहुल कँवल ने ट्वीट भी किए। (हाँलाकि यह 10.30 पर प्रसारित हुआ और बहस में राजदीप शामिल नहीं हुए।)

लेकिन ‘आहत संपादकों’ ने इस पर गहरी चिंता जताते हुए बीईए के मंच के इस्तेमाल की कोशिश की । मीडिया विजिल के पास बीईए सदस्यों के बीच इस संबंध में हुए ईमेल संवाद की कॉपी है जिसका निचोड़ पेश किया जा रहा है-

‘सर्वप्रथम आहत संपादक’ का सेहरा तमाम चैनलों में बड़ी भूमिका निभा चुके विनोद कापड़ी के सिर बँधा। उन्होंने बीईए के सदस्यों को मेल करके पूछा कि आख़िर इस तरह कीचड़ उछालने से किसका भला होगा। उन्होंने दुख जताया कि इस अर्णव के वीडियो पर कुछ लोग शो भी प्लान कर रहे हैं। उन्होंने लिखा कि टीवी संपादक अरसे से एक दूसरे को जानते हैं। मिल बैठकर बात कर लें, नहीं तो एक दूसरे को मारने के बाद कौन बचेगा ? विनोद कापड़ी ने आग्रह किया कि इस मुद्दे पर बीईए सदस्यों को मिलना चाहिए।

विनोद कापड़ी के इस दु:ख में न्यूज़ नेशन के अजय कुमार ने भी अपने आँसू मिलाए। उन्होंने एक दूसरे पर कीचड़ उछालने को बेहद हानिकारक क़रार देते हुए कहा कि अगर इसे रोकने के लिए जल्द कार्रवाई नहीं की गई तो विनोद कापड़ी की आशंका सच साबित होगी।

वरिष्ठ टीवी संपादक शैलेश कुमार ने भी विनोद कापड़ी के प्रस्ताव से सहमति जताई।

बीईए महासचिव अजित अंजुम ने विनोद कापड़ी तथा अन्य ‘आहत संपादकों ‘से सहमति जताते हुए कहा कि संपादकों को एक दूसरे को भंडाफोड़ नहीं करना चाहिए। उन्होंने लिखा कि किसी संपादक के ख़िलाफ़ स्टोरी करने से कुछ हासिल नहीं होगा। अजित अंजुम ने सलाह दी कि बीईए की बैठक बुलाकर मसले का कोई हल निकाला जाए।

साफ़ है कि उपाध्यक्ष अर्णव की शान में हुई गुस्ताख़ी को महासचिव समेत कुछ सदस्य बीईए की चिंता के दायरे में मानते हुए कार्यवाही करना चाहते थे। लेकिन बीईए के कुछ सदस्यों ने उलट सवाल खड़ा कर दिया।

कई चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके प्रशांत टंडन ने आश्चर्य जताया कि यह बीईए के लिए मुद्दा कैसे हो सकता है। उन्होंने कहा कि ऐंकरों का एक दूसरे के ख़िलाफ़ बोलना कोई नई बात नहीं है। पर्दे पर अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन बीईए ने कभी इस पर बात नहीं की। अगर बात करनी है तो पुराने मामलों को लेते हुए एक प्रामाणिक दस्तावेज़ तैयार कर लिया जाए।

बीईए के पूर्व महासचिव एन.के.सिंह ने भी साफ़ कहा कि किसी संपादक पर मानहानि का मुकदमा हो तो बीईए कदम उठाता है, लेकिन इस तरह के मामलों में उसके मंच का इस्तेमाल नहीं हो सकता। उन्होंने याद दिलाया कि संपादक इस तरह की हरक़त पहले से करते आए हैं।

इस मुद्दे पर सबसे सख़्त लहज़ा, लंबे समय तक ‘आज तक’ की कमान संभाल चुके वाले वरिष्ठ पत्रकार क़मर वहीद नक़वी का रहा। उन्होंने हैरानी जताई कि कुछ वरिष्ठ पत्रकार बीईए सदस्यों के मामले में बताने नहीं ‘छिपाने’ की हिमायत कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बात इस पर होनी चाहिए कि जो ख़बर की जा रही है, वह सही तथ्यों पर आधारित है या नहीं। अगर ख़बर सही है तो उसका प्रसारण क्यों नहीं होना चाहिए ? उन्होंने पूछा कि कई बार पत्रकारों के ख़िलाफ़ मामले आते हैं, क्या उन्हें इसलिए प्रकाशित या प्रसारित नहीं करना चाहिए कि पत्रकार समुदाय की प्रतिष्ठा गिरेगी ?

ऐसा नहीं कि नक़वी जी ने कोई ऐसा सवाल उठा दिया जो ‘रहस्य’ था। उन्होंने तो बुनियादी बात उठाई। लेकिन लगता है कि ‘आहत संपादक’ पत्रकारिता के बुनियादी पाठ भी भूल चुके हैं ? वे बीईए को ‘गैंग’ समझ बैठे !

कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘उपाध्यक्ष’ अर्णव गोस्वामी, अपना झूठ पकड़े जाने पर बीईए के सहारे अपना बचाव करना चाहते हैं। क्या वे चाहते हैं कि बीईए कोई प्रस्ताव पारित करे कि उसके किसी सदस्य के ख़िलाफ़ कोई स्टोरी ना प्रसारित की जाए और इस सिद्धांत की आड़ में उनके कारनामों पर भी सवाल ना उठे ! और उन्होंने आहत होने वाले संपादकों को साधा। इंडिया टुडे के अर्णब के झूठ पर शो करने के ऐलान के बाद नज़र आई ऐसी सक्रियता का और क्या मतलब है ? क्या ये ‘आहत जन’ अर्णब की ज़ुबान से भी आहत हुए हैं, जिसमें आए दिन “लुटियन दिल्ली” के पत्रकारों को “राष्ट्रद्रोही” तक क़रार दिया जाता है।

ख़ैर अर्णब ऐसा कर सकते हैं….लेकिन बीईए के सदस्य उनकी बंदूक को अपना कंधा क्यों थमा रहे हैं ?..क्या यह महज़ संयोग है या कुछ और ? मसलन एक ताक़तवर संपादक के साथ रिश्ता मज़बूत करने की इच्छा..!…क्या इससे बीईए की प्रतिष्ठा नहीं गिरेगी ?..वैसे, प्रतिष्ठा पहले से सवालों के घेरे में है। ये संयोग नहीं कि कई प्रतिष्ठित टीवी संपादक, बीईए से दूरी बनाए हुए हैं..!

(यह तस्वीर बीईए के नए पदाधिकारियों के हालिया चुनाव के बाद की है। बाएँ से दूसरे महासचिव अजित अंजुम और तीसरे अध्यक्ष सुप्रिय प्रसाद हैं।)

 

.बर्बरीक



 

 


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